अन्तरिक्ष युद्ध : अमरीका रूस के नए लेज़र हथियारों से डरा हुआ है

अमरीका की सामरिक कमान के प्रमुख जनरल जॉन हाइटन ने कहा है कि रूस ऐसे मिसाइलों और लेज़र हथियारों का विकास कर रहा है, जो अन्तरिक्ष में तैनात अमरीकी उपग्रहों को नष्ट कर सकते हैं। हालाँकि सैन्य विश्लेषकों के अनुसार लेजर हथियारों वाला अन्तरिक्ष युद्ध अभी बहुत दूर की बात है।
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मास्को के बाहर तैनात मिसाइल नज़दीकी अन्तरिक्ष में स्थित लक्ष्यों को निशाना बना सकते हैं और यह कार्यक्रम रूस के सर्वाधिक गुप्त कार्यक्रमों में से एक है। स्रोत :Vladislav Belogrud/RIA Novosti

अमरीका की सामरिक कमान के प्रमुख जनरल जॉन हाइटन ने कहा है कि रूस अमरीकी उपग्रहों के विरुद्ध मिसाइलों और लेजर हथियारों का विकास कर रहा है।

जॉन हाइटन ने आगे कहा – हम नहीं चाहते कि अब अन्तरिक्ष भी लड़ाई का अखाड़ा बने। उनका इशारा विशेष रूप से चीन तथा रूस की ओर था, जो ऐसे परमाणु हथियार बना रहे हैं, जिनकी तैनाती अन्तरिक्ष से लेकर पृथ्वी की परिधि तक, कहीं भी की जा सकती है। इन हथियारों को ज़मीन से लेकर पृथ्वी की निचली कक्षाओं और भूस्थैतिक कक्षा तक तैनात किया जाएगा। जॉन हाइटन ने बताया कि अब पृथ्वी की परिधि पर तैनात अमरीकी उपग्रहों की स्थिति खतरे से ख़ाली नहीं है और अमरीका को अपने हितों की रक्षा के लिए जवाबी क़दम उठाने होंगे।

हालाँकि जनरल जॉन हाइटन ने यह नहीं बताया कि ये जवाबी क़दम क्या हो सकते हैं। जॉन हाइटन अमरीका की सामरिक परमाणु कमान के प्रमुख हैं। उल्लेखनीय है कि अमरीका की मिसाइल प्रतिरक्षा यूनिटें भी इसी कमान के अन्तर्गत आती हैं। इस तरह जॉन हाइटन के नीचे कुल मिलाकर कोई 1 लाख 84 हजार अमरीकी सैनिक काम करते हैं।

’जन्भूममि का शस्त्रागार’ नामक रूसी पत्रिका के प्रधान सम्पादक वीक्तर मुरख़ोवस्की की राय में जनरल जॉन हाइटन अमरीकी करदाताओं को रूस की ओर से एक नए ख़तरे का डर दिखाकर अमरीकी सैन्य परियोजनाओं के लिए उनसे और अधिक पैसे वसूलने का जुगाड़ कर रहे हैं।

रूस के लेजर हथियार

वीक्तर मुरखोवस्की ने कहा — वैसे पिछली सदी के आठवें दशक के मध्य में तत्कालीन सोवियत संघ ज़रूर लेजर हथियारों पर शोध और अनुसन्धान कर रहा था। उस समय तत्कालीन सोवियत संघ ने ए-60 नामक एक प्रायोगिक उड़न प्रयोगशाला भी बनाई थी, जिसमें एक मेगावाट क्षमता वाला लेजर लगा हुआ था। यह प्रयोगशाला आईएल-76 विमान में बनाई गई थी।

हालाँकि उस कार्यक्रम के कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आए और रूस के रक्षा मन्त्रालय ने पिछली सदी के अन्तिम दशक की शुरूआत में इस कार्यक्रम को बन्द कर दिया। पिछले दशक के मध्य में इस परियोजना को फिर से आरम्भ किया गया, किन्तु अभी तक हम यह नहीं जानते हैं कि इसके क्या परिणाम सामने आए हैं। वैसे भी इस अनुसन्धान को ’अत्यन्त गुप्त अनुसन्धान’ की श्रेणी में रखा गया है।

‘इज़्वेस्तिया’ नामक रूसी दैनिक समाचारपत्र के सैन्य विश्लेषक दिमित्री सफ़ोनफ़ ने बताया — लेजर हथियार जैसे हथियारों की मनुष्य ने अभी तक सिर्फ़ कल्पना ही की है और ये हथियार फिलहाल काल्पनिक वैज्ञानिक साहित्य में ही दिखाई देते हैं क्योंकि रूस और अमरीका के वैज्ञानिक आज तक उस ‘ईंधन’ की खोज नहीं कर पाए हैं, जिसका इस्तेमाल करके इन लेजर हथियारों को ज़मीन पर या अन्तरिक्ष में चलाया जा सके।

मिसाइल प्रणालियाँ

परन्तु यह बात भी सच है कि रूस और अमरीका, दोनों देशों के पास ऐसी आधुनिक मिसाइल प्रणालियाँ हैं, जो पृथ्वी की निचली कक्षाओं में स्थित लक्ष्यों को निशाना बना सकती हैं।

रूसी समाचार समिति ‘तास’ के सैन्य विश्लेषक वीक्तर लितोफ़किन ने रूस-भारत संवाद को बताया कि मस्क्वा (मास्को) के बाहर तैनात मिसाइल नज़दीकी अन्तरिक्ष में स्थित लक्ष्यों को निशाना बना सकते हैं और यह कार्यक्रम रूस के सर्वाधिक गुप्त कार्यक्रमों में से एक है।

2015 के आख़िरी महीनों में रूसी वैज्ञानिकों ने ऐसे ही एक नए मिसाइलरोधी हथियार का परीक्षण किया था। इस परीक्षण की वीडियो रिकार्डिंग का अधिकार सिर्फ़ सरकारी टेलीविजन चैनल ‘ज़्वेज़्दा’ को ही दिया गया था, जो रूस के रक्षा मन्त्रालय के साथ सीधे काम करता है।

वीक्तर लितोफ़किन ने कहा — यदि ज़रूरत पड़ी, तो रूसी तथा अमरीकी इंजीनियर अभी तक बनाए गए मिसाइलों या भविष्य में बनाए जाने वाले मिसाइलों में इस तरह के बदलाव कर सकेंगे कि ये मिसाइल पृथ्वी के नज़दीकी अन्तरिक्ष में स्थित लक्ष्यों को निशाना बना सकें। जैसे, रूसी कम्पनी ’अल्माज़-अन्तेय’ 2018 में एक नया अधुनातन मिसाइल एस-500 पेश करना चाहती है। यह नई हवाई रक्षा मिसाइल प्रणाली नज़दीकी अन्तरिक्ष में तैनात दुश्मन के लक्ष्यों को निशाना बना सकेगी।

अन्तरिक्ष का विसैन्यीकरण

अमरीकी जनरल जॉन हाइटन के बयान को सैन्य विश्लेषक अन्तरिक्ष का सैन्यीकरण आरम्भ करने की कोशिश मान रहे हैं।
रूसी समाचारपत्र ‘इज़्वेस्तिया’ के सैन्य विश्लेषक दिमित्री सफ़ोनफ़ ने कहा  —  रूस ने 1967 में ही बाह्य अन्तरिक्ष के विसैन्यीकरण सम्बन्धी एक सन्धि पर हस्ताक्षर करके उसका समर्थन किया था, जबकि अमरीका ने अभी तक ऐसा नहीं किया है।

विशेषज्ञों के अनुसार यह सन्धि दुनिया के देशों को परमाणु या अन्य किसी  भी प्रकार के व्यापक विनाश करने वाले हथियारों को अन्तरिक्ष में तैनात करने से रोकती है। हालाँकि इस सन्धि में पारम्परिक हथियारों को तैनात करने की अनुमति दी गई है।
अन्त में हम, बस, इतना ही कह सकते हैं कि यह बड़े सन्तोष की बात है कि 1967 की बाह्य अन्तरिक्ष का विसैन्यीकरण करने से जुड़ी सन्धि पर हस्ताक्षर करने वाले किसी भी देश ने, चाहे उसने इस सन्धि का समर्थन किया हो या न किया हो, अन्तरिक्ष में इस प्रकार के हथियारों को तैनात नहीं किया है।

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