भारत को हथियारों के प्रमुख सप्लायर रूस के बारे में सीआईए का नज़रिया

सीआईए द्वारा हाल ही में सार्वजनिक किए गए दस्तावेज़ो में इस बारे में सीआईए का नज़रिया सामने आया है कि रूस क्यों भारत को हथियारों की सप्लाई करने वाला उसका सबसे विश्वस्त सहयोगी बना हुआ है।
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भारत मिग-29 लड़ाकू विमान का पहला अन्तरराष्ट्रीय ग्राहक था। स्रोत :migavia.ru

अमरीका की केन्द्रीय गुप्तचर एजेन्सी यानी सीआईए ने भारत के सिलसिले में न जाने कितनी बार ग़लत अन्दाज़ लगाया है। लेकिन इस बार उसका अन्दाज़ा बिल्कुल सही और सटीक था। नवम्बर 1984 में सीआईए ने एक रिपोर्ट बनाई थी, जिसका शीर्षक था — ‘भारत की हवाई ताक़त : आधुनिकीकरण तथा क्षेत्रीय प्रभुत्व’। इस रिपोर्ट को हाल ही में सार्वजनिक किया गया है। इस रिपोर्ट में सीआईए का कहना है — भारत रूसी हथियारों को इसलिए प्राथमिकता देता है क्योंकि उसे विश्वास है कि ज़रूरत की घड़ी में रूस भारत को हथियारों की निर्बाध सप्लाई करेगा। इस रिपोर्ट में सीआईए ने आगे टिप्पणी की है — चूँकि रूस भारत के लिए हथियारों का एक विश्वसनीय सप्लायर है और इसके साथ-साथ वह भारत को कम मूल्य पर उन्नत तक्नोलौजी उपलब्ध कराता है, इसलिए भारत को हथियार बेचने के मामले में पश्चिमी देशों की तुलना में उसे काफ़ी वरीयता मिल जाती है।

हालाँकि सीआईए की यह रिपोर्ट 32 साल पुरानी है, लेकिन उसमें बताई गई ज़्यादातर बातें आज भी खरी हैं। रिपोर्ट में बताया गया है — भारत लड़ाकू विमान और उनसे जुड़े उपकरण ख़रीदने के मामले में रूस पर बहुत ज़्यादा निर्भर है। भारत सरकार के उच्चाधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से यह बात कही है कि पश्चिमी देशों की तुलना में रूस हथियारों का कहीं अधिक विश्वस्त सप्लायर है क्योंकि भारत और उसके पड़ोसी देशों के बीच हुई लड़ाइयों के समय सोवियत संघ हमेशा भारत के साथ खड़ा रहा है, जबकि पश्चिमी देशों ने ऐसा नहीं किया। सोवियत हथियारों की मज़बूती और उनके इस्तेमाल में सहज होने की वजह से भी भारतीय वायुसेना उन्हें पसन्द करती है।

सीआईए ने आगे यह भी टिप्पणी की है कि रूस ने भारत को भारत में ही मिग-27 तथा मिग-29 जैसे आधुनिक लड़ाकू विमानों का उत्पादन करने की इजाज़त दी और उनके उत्पादन के लिए तकनीकी सहायता भी उपलब्ध कराई।

दूसरे देशों से हथियार ख़रीदने की कोशिशें

सीआईए की इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि पिछली सदी के नौवें दशक के शुरुआती वर्षों से ही भारत दूसरे देशों से भी हथियार ख़रीदने की कोशिश करता रहा है। दरअसल तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी विपक्षी नेताओं और पश्चिमी देशों के इन आरोपों से परेशान थीं कि उनके शासनकाल में भारत ’सोवियत संघ का पिछलग्गू’ बन गया है।

सीआईए की रिपोर्ट के अनुसार — श्रीमती इन्दिरा गाँधी का मानना था कि भारत और रूस के बीच बेहद नज़दीकी रिश्ते दुनिया के लिए कोई बहुत अच्छा संदेश नहीं है। इससे विदेश नीति के मामले में उनकी सरकार के विकल्प सीमित हो सकते हैं और इससे निर्गुट देशों के बीच भारत की अग्रणी भूमिका पर भी बुरा असर पड़ेगा। इसके अलावा भारत की सेना हथियारों के मामले में रूस पर बहुत ज़्यादा निर्भर हो जाएगी। इन्दिरा गाँधी चाहती थीं कि पूर्व और पश्चिम के बीच होने वाली इस स्पर्धा से भारत को भरपूर लाभ मिले।

सीआईए को आशा थी कि इन्दिरा गाँधी के उत्तराधिकारी राजीव गाँधी भारत को रूस की इस जकड़ से बाहर निकालेंगे। हालाँकि रूसी हथियारों पर निर्भरता कम करके हथियार सप्लायरों का विविधीकरण करने के विकल्प राजीव के पास भी बहुत सीमित थे। सीआईए की रिपोर्ट के अनुसार — प्रमुख हथियार सप्लायर के रूप में रूस ने भारत में अपनी जड़ें काफी गहराई तक जमा ली हैं। ज़्यादातर हथियारों की सप्लाई के लिए रूस को दरकिनार करके पश्चिमी देशों से जुड़ने की प्रक्रिया काफी खर्चीली और समयसाध्य है, जिसे बरदाश्त करना भारत के बस में नहीं है। समाचारपत्रों में छपी ख़बरों के अनुसार, अनेक भारतीय अधिकारी भी यही मानते हैं कि दीर्घकालिक सैन्य सहायता के मामले में भारत पश्चिमी देशों पर निर्भर रहने का खतरा नहीं उठा सकता।

रूसी मिग बनाम अमरीकी फ़ाल्कन

वैसे सीआईए ने यह भी माना है कि भारत मुख्य रूप से रूसी हथियारों को इसलिए प्राथमिकता देता है क्योंकि रूसी हथियार बेहद अच्छे और श्रेष्ठ होते हैं। सीआईए ने मिग-29  (जिसे नेटो ‘फ़ुल्क्रम’ के नाम से पुकारता है) लड़ाकू विमान को रूसी सेना के ’हवा में छा जाने वाले तत्कालीन सर्वाधिक सक्षम लड़ाकू विमानों में से एक’ बताया है। सीआईए की रिपोर्ट के अनुसार — हमें विश्वास है कि फ़्रांसीसी मिराज-2000 लड़ाकू विमान की बजाय मिग-29 लड़ाकू विमान ख़रीदने के भारत के निर्णय के पीछे असली कारण यह है कि पश्चिमी यूरोप की हथियार उत्पादक कम्पनियों द्वारा भारत को अपने हथियार बेचने की कोशिशें तेज़ करने के जवाब में रूस ने भारत को अधुनातन तकनीक से लैस लड़ाकू विमान देने की इच्छा जताई है।

उल्लेखनीय है कि भारत मिग-29 लड़ाकू विमान का पहला अन्तरराष्ट्रीय ग्राहक था। भारतीय वायुसेना के पास इस समय 90 से भी ज़्यादा मिग-29 लड़ाकू विमान हैं, जिनमें से 45 विमान विमान-वाहक युद्धपोत पर तैनात है।

चूक गया अवसर

सीआईए की इस रिपोर्ट में पाकिस्तान की परमाणु क्षमता को निष्प्रभावी करने की भारत की सामर्थ्य पर भी विचार किया गया है। हालाँकि सीआईए के अनुसार, पिछली सदी के नौवें दशक में भारत के पास पाकिस्तान पर पहला हवाई हमला करने की क्षमता थी, जिससे ’पाकिस्तान के सबसे महत्वपूर्ण परमाणु प्रतिष्ठानों’, कहूटा परमाणु संवर्धन संयन्त्र और इस्लामाबाद के निकट स्थित पिन्सटेक पुनर्प्रक्रमण केन्द्र को भारी क्षति पहुँचाई जा सकती थी। लेकिन इस मौक़े को गँवा दिया गया और अब भविष्य में यह मौक़ा फिर नहीं मिलने वाला है।

सीआईए की रिपोर्ट में कहा गया है — भारतीय वायुसेना कहूटा तथा पिन्सटेक के चारों ओर बनी पाकिस्तान की प्रतिरक्षा पंक्ति को भेदकर पाकिस्तानी परमाणु केन्द्रों को पूरी तरह से या काफ़ी हद तक नष्ट कर सकती थी, जिससे पाकिस्तान अनेक वर्षों तक परमाणु हथियारों का उत्पादन नहीं कर पाता। भारत द्वारा पाकिस्तानी परमाणु केन्द्रों पर आक्रमण किए जाने से शायद परमाणु का उत्पादन करने की पाकिस्तान की क्षमता कुन्द पड़ जाती और पाकिस्तान के परमाणु अनुसन्धान व विकास केन्द्रों तथा परमाणु हथियारों के पुर्जों को बनाने, जोड़ने व परीक्षण करने के लिए जरूरी मूलभूत ढाँचे को गम्भीर क्षति पहुँचती और शायद पाकिस्तान के अनेक महत्वपूर्ण परमाणु हथियार विशेषज्ञ भी इस दुनिया से विदा हो गए होते।

उल्लेखनीय है कि इज़राइल ने 1981 में इराक के ओसिराक परमाणु बिजलीघर को ध्वस्त कर दिया था। किन्तु भारत का तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व यथार्थपरक राजनीति के बदले अस्पष्ट नैतिक आदर्शों से कहीं अधिक प्रभावित था। इज़राइल के विदेश मन्त्री मोशे दयान ने 1977 में अपनी गुप्त भारत यात्रा के दौरान इज़रायल ने भारत के सामने कहूटा परमाणु संयन्त्र को नष्ट करने का प्रस्ताव भी रखा था, लेकिन भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री मोरारजी देसाई ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।

भारत और रूस के लिए सीख

पाकिस्तान के साथ रूस के अल्पकालिक मधुर सम्बन्धों को छोड़ दें, तो पिछले अनेक दशकों के इस दौर में भारत और रूस के बीच आपसी सहयोग तथा मैत्री का सदाबहार भाव लगातार मौजूद दिखता है।

सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति बरीस येल्तसिन और यिगोर गैदार तथा अन्द्रेय कोज़िरिफ़ जैसे उनके अमरीका-समर्थक सलाहकारों की ऊटपटांग नीतियों के कारण अमरीका को भारत पर रूसी असर को कम करने की सम्भावना मिली थी।

1990 से 1996 तक रूस के विदेशमन्त्री रहे अन्द्रेय कोज़िरिफ़ ने घोषणा की थी कि रूस अब आगे से भारत को विशेष महत्व नहीं देगा और वह भारत तथा पाकिस्तान के साथ एक जैसा ही बरताव करेगा। ऐसी स्थिति में तत्कालीन प्रधानमन्त्री नरसिंह राव के पास इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा था कि सुरक्षा के क्षेत्र में भारत दूसरे देशों के साथ भी रिश्ते बनाए।

बरीस येल्तसिन के शासनकाल से पहले और उसके बाद के वर्षों में रूस भारत का विश्वनीय मित्र रहा है और रूस ने अपनी इस मित्रता पर कभी उँगली उठाने का अवसर नहीं दिया। पश्चिमी देशों के साथ बेहतर होते सम्बन्धों के वर्तमान दौर में भारतीय नेताओं को यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए।

दूसरी ओर रूस को भी भारत के पड़ोसी देशों को हथियार बेचने से परहेज करना चाहिए क्योंकि पाकिस्तान को छोटे-मोटे हथियार बेचने की बात को भी भारत के लोग अत्यधिक शंका और सन्देह की नज़र से देखते हैं।

सीआईए की इस रिपोर्ट में भारत की स्थिति को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया गया है — भारत ने सार्वजनिक तौर पर और राजनयिक माध्यमों द्वारा इस बात पर लगातार ज़ोर दिया है कि पाकिस्तान को अमरीका द्वारा हथियारों की बिक्री को वह भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थायित्व के लिए सबसे गम्भीर खतरा मानता है। भारतीय अधिकारी सार्वजनिक रूप से अमरीका पर आरोप लगाते हैं कि अमरीका-पाकिस्तान सुरक्षा सम्बन्ध दक्षिण एशिया में भारत के राजनीतिक व सैन्य प्रभुत्व के लिए चुनौती है और इससे हिन्द महासागर में महाशक्तियों के बीच का आपसी टकराव बढ़ता है।

रूस को भी यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि भारत आज भी रूसी हथियारों का सबसे बड़ा ग्राहक है। इसलिए उसे उन सामरिक ग़लतियों से परहेज करना चाहिए, जो ग़लतियाँ शीत युद्ध के समय अमरीका ने की थीं।

न्यूज़ीलैण्ड में रहने वाले राकेश कृष्णन सिन्हा पत्रकार व विदेशी मामलों के विश्लेषक हैं।

इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।

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