क्या रूस भारत की कमज़ोरी का फ़ायदा उठा रहा है?

अन्तरराष्ट्रीय स्टॉकहोम शान्ति शोध संस्थान (अस्शाशोस) ने हाल ही में दुनिया में हथियारों की ख़रीद-फ़रोख्त के बारे में एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें यह बताया गया है कि हथियारों के भारतीय बाज़ार पर रूस का नियन्त्रण बढ़ता जा रहा है और भविष्य में रूस ही भारत का प्रमुख सप्लायर होगा।
Indian military
भारत रूसी हथियारों पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता है। स्रोत :mil.ru

पिछली सदी के सातवें दशक के मध्य में रूस और भारत के बीच रक्षा सहयोग की शुरूआत हुई थी और उसके बाद दोनों ही देशों की यह कोशिश रही कि दूसरे देशों के साथ इस क्षेत्र में भारत का सहयोग विकसित न हो पाए। अन्तरराष्ट्रीय स्टॉकहोम शान्ति शोध संस्थान (अस्शाशोस) ने हाल ही में इस सिलसिले में एक नई रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें साफ़-साफ़ यह बताया गया है कि रूस और भारत पूरी तरह से एक-दूसरे पर निर्भर करते हैं और वे इस निर्भरता में कोई ढील नहीं देना चाहते।

इस रिपोर्ट का शीर्षक है — 'अन्तरराष्ट्रीय हथियार हस्तान्तरण के रुझान - 2016'। रिपोर्ट से मालूम होता है कि पिछले पाँच साल में  2011 से 2016 के दौरान रूस ने अपने हथियारों का निर्यात छोटे-छोटे देशों को किया है। बड़े देशों में सिर्फ़ अकेला भारत ही ऐसा देश है, जिसने रूस से उसके 38 प्रतिशत हथियार ख़रीदे हैं। वियतनाम और चीन ने रूस से 11-11 फीसदी हथियार लिए हैं, जबकि अल्जीरिया ने रूस के 10 प्रतिशत हथियार ख़रीदे हैं। इसके विपरीत अमरीकी हथियारों का मुख्य ग्राहक है — सऊदी अरब। जिसने अमरीका से उसके कुल हथियारों के निर्यात का 13 प्रतिशत हिस्सा ख़रीदा है। सँयुक्त अरब अमीरात ने अमरीका से 8.7 फीसदी हथियार ख़रीदे हैं और तुर्की ने 6.3 प्रतिशत। 

भारत रूसी हथियारों पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता है। 2012 से 2016  के बीच भारत की हथियारों की 68 फ़ीसदी ज़रूरतें रूस ने ही पूरी कीं। अमरीका ने भारत की 14 फीसदी ज़रूरतों को पूरा किया और इज़राइल ने भी भारत को 7.2 प्रतिशत हथियारों की सप्लाई की।

भारत अभी भी निर्भर है 

2012 से 2016  के दौरान दुनिया के जिन 155  देशों ने हथियारों का आयात किया, उन देशों की सूची में भारत पहले नम्बर पर आता है। 2007 से 2011 और 2012 से 2016 के बीच भारत ने हथियारों का आयात 43 फीसदी बढ़ा दिया है। हाल के वर्षों में भारत ने अपने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों चीन और पाकिस्तान की तुलना में बहुत ज़्यादा मात्रा में हथियार ख़रीदे हैं। 

अस्त्र-शस्त्रों के मामले में रूस पर निर्भर होकर भारत को किसी तरह का कोई सामरिक जोख़िम भी नहीं उठाना पड़ता, क्योंकि रूस अपने ग्राहकों पर किसी तरह के कोई प्रतिबन्ध या रोक कभी नहीं लगाता। इसीलिए भारत रूस पर वैसे ही निर्भर होता चला जाता है, जैसे किसी शराबी को शराब की लत पड़ जाती है। लेकिन इस आयात के कारण ही भारत का अपना स्वदेशी रक्षा उद्योग विकसित नहीं हो पा रहा है। यह एक विरोधाभास की स्थिति है। अन्तरराष्ट्रीय स्टॉकहोम शान्ति शोध संस्थान (अस्शाशोस) ने बताया — भारी मात्रा में विदेशी हथियारों का आयात करने की वजह से भारत का स्वदेशी रक्षा उद्योग प्रतिस्पर्धी हथियारों का डिजाइन तैयार करने और उनका उत्पादन करने में विफल रहा है। 

ऐसा नहीं है कि भारत में कौशल या तकनीकी ज्ञान का अभाव है, बल्कि भारत में तो इस इच्छा का अभाव दिखाई दे रहा है कि अपने लिए ख़ुद हथियार बनाए जाएँ। जबकि भारत का राजनीतिक नेतृत्व देश के रक्षा उद्योग को अपने पैरों पर खड़ा करना चाहता है। विशेष रूप से पूर्व रक्षामंत्री ए० के० एण्टनी के कार्यकाल में इस बात पर ज़ोर दिया गया था कि भारत अपनी ज़रूरतें ख़ुद पूरी करे। एण्टनी का कहना था कि पाकिस्तान जैसा असफल देश भी दुनिया के क़रीब 30 देशों को अपने छोटे हथियारों और कम मारक शस्त्रों का निर्यात करता है, तो फिर भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता।  

’मेक इन इण्डिया’ की रणनीति 

यह अच्छी ख़बर है कि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी 'मेक इन इंण्डिया' की नीति अपनाने पर ज़ोर दे रहे हैं ताकि हथियारों के उत्पादन के क्षेत्र में भारत ज़्यादा से ज़्यादा आत्मनिर्भर हो जाए। 2014 में भारत के सबसे बड़े युद्धपोत — रूस निर्मित विमानवाहक युद्धपोत आईएनएस विक्रमादित्य पर नौसैनिकों को सम्बोधित करते हुए नरेन्द्र मोदी ने कहा था  — अब भारत को भी अपने हथियारों के निर्यात की तरफ़ ध्यान देना चाहिए। भारत के हथियार ऐसे होने चाहिए कि छोटे देश भारत में उत्पादित हथियारों का इस्तेमाल करके ख़ुद को सुरक्षित महसूस कर सकें। 

भारत में कुछ रक्षा परियोजनाओं पर काम चल रहा है और मोदी के आने से पहले ही भारतीय और विदेशी हथियार निर्माताओं के बीच सहयोग शुरू हो गया था। ’मेक इन इण्डिया’ या ’मेक बाई इण्डिया’ की नीति पर वास्तव में शुरू से ही भारत की निजी कम्पनियों ने कब्ज़ा कर रखा है। भारत के इतिहास में पहली बार ’रिलायंस’ जैसी बड़ी भारतीय कम्पनी ने रक्षा उद्योग के उपकरणों का उत्पादन करने से जुड़े उद्योग में पूंजी निवेश करना शुरू किया। जबकि रिलायंस को रक्षा उद्योग के बारे में ज़रा भी जानकारी नहीं है।

इसके बावजूद अनिल अम्बानी की ’रिलायंस डिफ़ेन्स’ कम्पनी ने विमानों, हैलिकॉप्टरों, चारवियों (चालक रहित विमानों), लड़ाकू वाहनों, रात में देखने वाली दूरबीनों, संवेदकों (सेंसर), दिशासूचक यन्त्रों, प्रणोदक इंजनों और कम्प्यूटर सिमुलेटर माडलों आदि का निर्माण करने के 12 औद्योगिक लायसेन्स लिए हैं।

अगर हम कुछ दशक आगे के भारत के भविष्य पर नज़र डालें तो हम देखेंगे कि भारत ख़ुद बहुत से हथियार बनाने लग जाएगा और विदेशों से उनका निर्यात बन्द कर देगा।

नए स्तर की ओर बढ़ता भारत

हथियारों के बाज़ार के विविधीकरण की इच्छा रखते हुए भी दुनिया की वास्तविक स्थिति ऐसी है कि अमरीका, रूस और चीन जैसे तीन बड़ी महाशक्तियों के अलावा सिर्फ़ भारत ही अकेला ऐसा देश है, जो बड़ी मात्रा में हथियार ख़रीदता है। रूस द्वारा उत्पादित हथियारों की सूची में अन्तरिक्ष आधारित ऐसे हथियार भी है जिनका भारत अभी भी उत्पादन करने में असमर्थ है। इसीलिए रूस भारत का प्रिय हथियार सप्लायर देश बना हुआ है क्योंकि उससे किसी भी तरह के नए से नए आधुनिक हथियार ख़रीदे जा सकते हैं।

रूस ने भारत को सबसे पहले मिग-21 लड़ाकू सुपरसोनिक विमान का निर्यात किया था, जो आवाज़ की गति से भी दूनी गति से उड़ान भर सकता था। इस विमान को ख़रीदने के बाद ही भारतीय उपमहाद्वीप के आकाश में हवाई शक्ति सन्तुलन बदल गया था। तब भारत इन विमानों को ख़रीदने के लिए उनकी क़ीमत का तुरन्त भुगतान नहीं कर सकता था। रूस ने उदारता दिखाई और भारत को उधार विमान देने की पेशकश की, जिनका मूल्य भारत आने वाले कई दशकों तक चुकाता रहा। मिग -21 ही वह पहला लड़ाकू विमान था, जिसका उत्पादन करने का प्रस्ताव रूस ने भारत जैसे विकासशील देश के सामने रखा था।

तब से आज तक रूस ने भारत के सामने तरह-तरह के आधुनिकतम और अधुनातन हथियारों का उत्पादन करने और उनका भारत में ही आगे विकास करने के लिए लायसेन्स देने के प्रस्ताव रखे हैं, जिनमें परमाणु पनडुब्बियाँ, क्रायोजेनिक इंजन, युद्धपोत और सुपरसोनिक मिसाइल जैसे अत्याधुनिक और विकसित हथियार भी शामिल रहे हैं। 

आज भारत का औद्योगिक स्तर विकसित देशों के स्तर के आसपास पहुँच चुका है और कुछ ही दशकों में वह विकसित देशों के स्तर के बराबर हो जाएगा। तब तक रूस के पास कई वर्षों का समय है कि वह भारत के साथ सहयोग को और बढ़ा सके।

न्यूज़ीलैण्ड में रहने वाले राकेश कृष्णन सिंह पत्रकार व विदेशी मामलों के विश्लेषक हैं।

इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।

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