रूस करेगा उत्तरी ध्रुव में इस्तेमाल किए जाने वाले रूसी हथियारों का प्रदर्शन

धुर उत्तरी ध्रुवीय प्रदेश का मौसम बहुत कठोर मौसम है और वहाँ की ज़मीन बहुत ऊबड़-खाबड़ है। हथियार ऐसे होने चाहिए जो उस इलाके की भयानक ठण्ड में भी काम करते रहें और जिन्हें उस इलाके में यहाँ-वहाँ पहुँचाना और लाना-ले जाना आसान हो।
Pantsyr-SA (Arctic)
वायु सुरक्षा मिसाइल तोप प्रणाली ’पन्तसीर - एसए’ (आर्कटिक)। स्रोत :Evgeny Biyatov/RIA Novosti

रूस में 9 मई को द्वितीय विश्व-युद्ध में रूस की विजय के अवसर पर हर साल जो सैन्य परेड निकाली जाती है, उसमें इस साल दुनिया के सबसे आधुनिकतम और अभिनव अरमाता टैंक तथा वायु सुरक्षा प्रणाली एस-300 के अलावा वह नई रूसी सैन्य तकनीक भी पेश की जाएगी, जिसका इस्तेमाल धुर उत्तरी ध्रुवीय प्रदेश के कठोर मौसम में युद्ध करने के लिए किया जा सकता है। 

अप्रैल के शुरू में पत्रकारों से मुलाक़ात करते हुए रूस के थलसेना प्रमुख कर्नल-जनरल अलेग सल्यूकफ़ ने बताया — विजय दिवस परेड में पहली बार हम वायु सुरक्षा मिसाइल तकनीक ’तोर-एम2डीटी’ और वायु सुरक्षा मिसाइल तोप प्रणाली ’पन्तसीर - एसए’ का सार्वजनिक रूप से प्रदर्शन करेंगे। उन्होंने बताया कि इस सैन्य तकनीक का इस्तेमाल कठोर जलवायु वाले रूस के उत्तर ध्रुवीय इलाके की सुरक्षा के लिए सहज ही किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि उत्तरी ध्रुव के इलाके में न सड़कें हैं और न पुल। ज़मीन ऊबड़-खाबड़ है और ऊँची-नीची। वहाँ रूस के सैनिक-अड्डे भी नहीं हैं।

अभी तक उत्तरी ध्रुव के इलाके में एक बार भी लड़ाई नहीं हुई है। लेकिन हिमनदों वाले टुण्ड्रा के इस इलाके में लड़ाई कभी भी भड़क सकती है। हालाँकि उत्तरी ध्रुव के इलाके की कठोर जलवायु के कारण वहाँ युद्ध करना बेहद मुश्किल होगा।

उत्तरी ध्रुवीय इलाके में सबसे ज़्यादा मुश्किल काम सैन्य तकनीक को पहुँचाना और उसे मौसम की मार से तथा भयानक ठण्ड से सुरक्षित बनाए रखना है।

पहली दिक्क़त तो यह है कि जाड़ों में इस इलाके में तापमान (या शीतमान) शून्य से 60 डिग्री सेल्सियस तक नीचे चला जाता है। इतनी ठण्ड में कोई तकनीक काम नहीं करती। तकनीक पर लगाई जाने वाली ग्रीस या चिकनाई जम जाती है। तकनीक में इस्तेमाल किए गए रबड़ के कल-पुर्जे शीशे की तरह नाज़ुक और भुरभुरे होकर टूट जाते हैं। इलैक्ट्रोनिक यन्त्र-उपकरण भी इस भयानक ठण्ड में काम नहीं करते।

दूसरी दिक़्क़त इस इलाके की ज़मीनी हालत के कारण सामने आती है। जमी हुई बर्फ़ के नीचे बड़ी-बड़ी खाइयाँ और गड्ढे हो सकते हैं। यह भी सम्भव है कि ऊपर से जो बर्फ़ीला मैदान दिखाई दे रहा है, भीतर से वह दलदली इलाका हो। बर्फ़ से पूरी तरह ढका हुआ बड़ा दलदली इलाका।

इसलिए रूसी सेना के हथियार डिजाइन ब्यूरो ने ऐसी सैनिक गाड़ियाँ और ट्रक बनाए हैं, जो हर तरह के इलाके को पार करके इधर-उधर आ-जा सकते हैं। उत्तरी ध्रुव के इलाके में चलाने के लिए ही डीटी-10 ’वीतिज़’ नामक वाहन बनाया गया है।

’वीतिज़’ का डिजाइन पहली बार 30 साल पहले बनाया गया था। बाद में उसमें लगातार बदलाव किए जाते रहे और उसे नया रूप दिया जाता रहा। टैंकों की तरह के चेनदार पहियों पर चलने वाला यह वाहन दो हिस्सों में बँटा हुआ है। दो हिस्सों में बँटे होने की वजह से इस पर 10 टन तक वज़न लादा जा सकता है और वह 40 किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ़्तार से दौड़ सकता है। उत्तरी ध्रुवीय इलाके की दुर्गम ज़मीन पर यह रफ़्तार बहुत ज़्यादा है। ’वीतिज़’ में किए गए नए बदलावों के बाद यह वाहन एक ऐसे बख़्तरबन्द वाहन में बदल चुका है, जिस पर कोई भी मारक हथियार लादकर उत्तरी ध्रुव के किसी भी इलाके में पहुँचाया जा सकता है।

रूसी सैन्य डिजाइनरों ने अभिनव क़िस्म की एक नई गाड़ी भी बनाई है, जिसके विशाल पहियों का व्यास दो मीटर के लगभग है। इन पहियों में विशेष क़िस्म के टायर लगे हुए हैं, जो ज़मीन पर कम से कम दबाव डालते हैं और गहरी बर्फ़, जमी हुई धरती, तालाब, झील या जमी हुई नदियों से होकर भी बड़ी आसानी से गुज़र जाते हैं। इस तकनीक की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि उसमें लगे ज़्यादातर उपकरण ऑटोमैटिक हैं। अभी तक इन गाड़ियों के जो भी मॉडल बनाए गए हैं, वे तीन दिन-तीन रात तक बिना खाए-पीए यानी बिना ईंधन लिए चल-फिर सकते हैं। डिजाइनरों ने इन सैनिक गाड़ियों की इसी ख़ासियत को सबसे बड़ी ख़ासियत माना है। 

उत्तरी ध्रुवीय इलाके में रूसी सैनिक-अड्डे कहाँ-कहाँ

पिछले दौर में उत्तरी ध्रुवीय इलाके में भयानक होड़ शुरू हो चुकी है। उत्तरी हिम महासागर के किनारे बसे हुए सभी देश उत्तरी ध्रुवीय इलाके के समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों और खनिज भण्डारों पर खुलकर अपने-अपने दावे पेश कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में रूस को धुर उत्तरी ध्रुवीय इलाके में लगातार अपनी स्थिति को मज़बूत करना पड़ रहा है। सोवियत सत्ता काल में जहाँ पुराने सोवियत सैनिक अड्डे बने हुए थे, उनकी जगह अब नए सैनिक अड्डे बनाए जा रहे हैं, जो नई आधुनिकतम तकनीकों से लैस हैं। इस इलाके में रूस के सबसे बड़े सैनिक अड्डे नवसिबीर्स्क द्वीपों पर और फ़्राँज जोसेफ़ भूमि पर स्थित हैं। इन अड्डों के नाम हैं — ’सेविरनी क्ल्योवर’ और ’आर्कतिचिस्की त्र्योख़लिस्तनिक’। ये दोनों सैन्य अड्डे दुनिया के धुर उत्तरी इलाके में विशेष परियोजनाओं के आधार पर बनाए गए हैं। इन अड्डों में हमेशा सैकड़ों सैनिक और जवान तैनात रहते हैं। इन जवानों को डेढ़ साल के लिए इन अड्डों पर भेजा जाता है और उन्हें वहाँ जीवन की हर सुविधा उपलब्ध है। डेढ़ साल तक वे दुनिया से कटकर अपनी ड्यूटी करते हैं। 

स्रोत : Vadim Savitskii/RIA Novostiस्रोत : Vadim Savitskii/RIA Novosti

रूसी सैनिक जब उत्तर ध्रुवीय इलाके के अपने अभियान पर जाते हैं तो उनका अभियान इन्हीं सैनिक अड्डों से शुरू होता है। इन अड्डों में दर्जनों सैन्य तकनीकें उपस्थित हैं और बड़ी मात्रा में ईंधन और भोजन के भण्डार भी बने हुए हैं। इन अड्डों का मुख्य काम उन राडारों और सैन्य विमानों की निगरानी करना है, जो रूसी उत्तरी ध्रुवीय इलाके की टोह लेकर उस पर लगातार नज़र रखते हैं। भविष्य में यहाँ पूरी तरह से सुसज्जित बड़े हवाई-अड्डे बनाने की योजना है, जो पोतरोधी और वायु सुरक्षा प्रणालियों से लैस होंगे। उनमें संचार की आधुनिकतम सुविधाएँ उपलब्ध होंगी, ताकि पनडुब्बियों से भी सीधा सम्पर्क किया जा सके। अगर ये सब योजनाएँ पूरी हो जाएँगी तो इसका मतलब यह होगा कि रूस के उत्तरी ध्रुवीय इलाके के आसमान, ज़मीन और समुद्र को एक सुरक्षित ढाल मिल गई है।

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