जीवन और मौत के बीच झूलते लेनिनग्राद की विजय का दिन

लेनिनग्राद (आज का साँक्त पितेरबुर्ग) को फ़ासिस्ट जर्मनी की दुश्मन सेना ने चारों तरफ़ से घेर रखा था। हर रोज़ शहर पर बम गिराए जाते थे, लेकिन लेनिनग्राद के निवासी भूखे रहकर भी जी-जान से अपने शहर की रक्षा करने के लिए लड़ रहे थे।

महान् देशभक्तिपूर्ण युद्ध शुरू होने के बाद एकदम शुरू के महीनों में ही फ़ासिस्ट जर्मनी की सेना ने लेनिनग्राद की चारों तरफ़ से नाकेबन्दी कर ली थी। सोवियत संघ के जिन शहरों को जर्मन सेना ने पूरी तरह से घेर रखा था, उनमें लेनिनग्राद भी शामिल था जो मस्क्वा (मास्को) के बाद रूस का दूसरा बड़ा शहर है। लेनिनग्राद की नाकेबन्दी 8 सितम्बर 1941 को की गई थी और 27 जनवरी 1944 तक चलती रही। हालाँकि सोवियत संघ की लाल सेना ने 18 जनवरी 1943 को ही जर्मन घेराव को तोड़ दिया था, लेकिन घेराव को पूरी तरह से तोड़ने में 9 दिन और लग गए।    

लेनिनग्राद को इस तरह से घेरा गया था कि बाहरी दुनिया से उसका सम्पर्क पूरी तरह से कट गया था। लेनिनग्राद में खाद्य-पदार्थों और ईंधन का अभाव शुरू हो गया। उन दिनों सिर्फ़ लादगा झील ही एकमात्र ऐसा रास्ता बचा था, जिससे होकर शहर को खाद्य-पदार्थों की सप्लाई की जा रही थी। गर्मियों में लादगा झील जलमार्ग के रूप में काम करती थी और सर्दियों में जब झील का पानी जम जाता था तो झील पर जमी बरफ़ की मोटी परत पर चलने वाली हलकी गाड़ियों से लेनिनग्राद को रसद पहुँचाई जाती थी। लेनिनग्राद का घेराव शुरू होने के बाद 1941 की पहली सर्दियों में ही लेनिनग्राद शहर के हज़ारों निवासी भूख और ठण्ड से तड़प-तड़प कर मर गए। हालाँकि नगर में स्वयंसेवक दस्तों ने शहर की जनता के लिए सार्वजनिक भोजनालयों का प्रबन्ध किया था। नगर के पार्कों और मैदानों में साग-सब्ज़ियाँ उगाने की कोशिश भी की गई। इन क्यारियों की दिन-रात सुरक्षा की जाती थी। 

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फ़ासिस्ट जर्मन सेना शहर पर चारों तरफ़ से गोलाबारी कर रही थी। आकाश से भी विमान बमबारी किया करते थे। जर्मन सेना यह कोशिश कर रही थी कि नगर की रक्षा करने वाले नगरवासी आत्मसमर्पण कर दें। इस भारी बमवर्षा के कारण लेनिनग्राद नगर की ज़्यादातर इमारतें खण्डहरों में बदल गई थीं। हज़ारों लोग मारे गए थे और लाखों लोग घायल हुए थे।

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नवम्बर 1941 से ही लेनिनग्राद में खाद्य-पदार्थों का अकाल शुरू हो गया। शहर के निवासियों को राशन कार्ड दे दिए गए ताकि शहर के खाद्य-भण्डारों में बची भोजन-सामग्री सभी लोगों के बीच बराबर-बराबर बाँटी जा सके। पहले जाड़े में ही लेनिनग्राद के 7 लाख 80 हज़ार निवासी भूख और ठण्ड से मौत के मुँह में चले गए।

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जर्मन गोलाबारी और बमवर्षा की वजह से ’नेवस्की प्रोस्पेक्ट’ के इलाके में नगर को जल-आपूर्ति करने वाली पाइपलाइन टूट गई और नगरवासियों को मिलने वाला पानी बन्द हो गया। लोग इधर-उधर से पानी लाने पर मजबूर हो गए।   

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जाड़े के उन ठण्डे, कठिन और काले दिनों में, जब घरों में न बिजली थी और न ही घरों को गर्माने की कोई व्यवस्था, लोग रेडियो और ट्राँजिस्टरों के सहारे ही दुनिया से जुड़े हुए थे। रेडियो ही उनके लिए ख़बरें पाने का एकमात्र सहारा था।

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लेनिनग्राद के निवासी तभी अपने घरों से बाहर निकलते थे, जब ऐसा करना बेहद ज़रूरी होता था। भूख और ठण्ड के कारण वे इतने कमज़ोर हो चुके थे कि छोटी-मोटी दूरी चलकर पार करना भी उनके लिए सम्भव नहीं था। लोग चींटियों की तरह मर रहे थे और उनके शव गलियों में इधर-उधर छितरे मिलते थे।

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लेनिनग्रादवासियों के साहस और दिलेरी को बनाए रखने के लिए संगीत नाटिका मण्डली ने अलिक्सान्दर थियेटर के मंच पर नाटिकाएँ और प्रहसन प्रस्तुत करने शुरू कर दिए। उन्हीं दिनों प्रसिद्ध सोवियत पियानोवादक दिमित्री शस्तकोविच ने लेनिनग्राद सिम्फ़नी नम्बर-7 की रचना की, जो सारी दुनिया में बेहद लोकप्रिय हुई और प्रसिद्ध हो गई। 

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लेनिनग्राद  के चारों तरफ़ खाइयाँ खुदी हुई थीं और बाड़ें लगी हुई थी। लेनिनग्राद का हर वह निवासी अपने शहर की रक्षा करने के लिए मोर्चे पर जाया करता था, जिसमें ज़रा भी ताक़त होती थी। इसके अलावा नगरवासियों ने अपने शहर को साफ़-सुथरा रखने की भी पूरी कोशिश की। सड़कों और गलियों से सब गन्दगी और बर्फ़ रोज़ हटाई जाती थी। 

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जिन बच्चों के माता-पिता की मौत हो गई थी, उन बच्चों को अनाथालयों में ले जाया जाता था और वहाँ उन्हें पढ़ाने-लिखाने की कोशिश भी की जाती थी। लेकिन अक्सर ये बच्चे लेनिनग्राद नगर में चल रहे ’लिनतीप’ हथियार कारख़ानों में काम करते थे और गोला-बारूद व मशीनगनें बनाने में वयस्कों की सहायता किया करते थे।  

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इन गोलों का इस्तेमाल पूर्वी मोर्चे पर शहर की रक्षा करने वाली भारी तोपों में किया जाता था।

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लादगा झील ही बाहरी दुनिया से लेनिनग्राद के निवासियों के सम्पर्क का एकमात्र रास्ता थी। इस रास्ते को लोग ’जीवन-मार्ग’ कहा करते थे क्योंकि इसी झील के रास्ते दिन-रात शहर को खाद्य-पदार्थों और अन्य जीवनरक्षक मालों की आपूर्ति की जाती थी। जाड़ों में जब झील का पानी जम जाता था तो उस पर हलके ट्रक चला करते थे। इन ट्रकों के चालक अपने केबिन का दरवाज़ा हमेशा खुला रखते थे ताकि यदि झील पर जमी बर्फ़ में दरार पड़ जाए और ट्रक झील में डूबने लगे तो वे ट्रक से बाहर कूद कर अपना जीवन बचा सकें।

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लेनिनग्राद के पूर्वी मोर्चे पर मशीनगन लेकर जवान शहर की रक्षा करते थे। जाड़ों में वे सफ़ेद लबादे पहने रहते थे, और इस तरह चारों तरफ़ पड़ी सफ़ेद बर्फ़ के बीच वे दिखाई नहीं देते थे। 

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उस घेराव के दौरान सिर्फ़ नगरवासियों की सुरक्षा का ही इन्तज़ाम नहीं करना पड़ा, बल्कि एरमिताझ कला संग्रहालय के कर्मियों ने अमूल्य कलाकृतियों की सुरक्षा करने की भी कोशिश की। सभी तैलचित्रों को उनके फ़्रेम से निकालकर उन्हें लपेटकर तहख़ानों में छिपा दिया गया था।  

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कई इमारतों के तहख़ानों का इस्तेमाल तब लोग जर्मन विमानों की बमबारी से बचने के लिए किया करते थे और बमवर्षा शुरू होते ही इन इमारतों के भूगर्भ में जाकर छिप जाया करते थे।

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उन दिनों पूरे शहर में लाउडस्पीकर लगे हुए थे जिनमें बजने वाले अलार्म नगरवासियों को दुश्मन के हवाई-हमलों से सचेत किया करते थे। अगर अलार्म तेज़गति से बज रहा है तो यह सावधान होने का संकेत था और फिर जब अलार्म धीमी गति से बजता था तो इसका मतलब होता कि ख़तरा टल गया। 

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हर हवाई-हमले के बाद कुछ और इमारतें खण्डहरों में बदल चुकी होती थीं या उनमें छेद हो चुके होते थे। इन ख़तरनाक इमारतों के गिरने की चेतावनी देने के लिए और लोगों को उन इमारतों की तरफ़ न जाने देने के लिए इन इमारतों पर पोस्टर बनाकर लटका दिए जाते थे।

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