उत्तरध्रुवीय इलाके की प्रकृति जैसे महाप्रलय के बाद की दुनिया

उत्तरध्रुवीय इलाके पर विजय पाने वाले विजेता आज भी वहाँ सोवियत अतीत के भूत को देखकर डर जाते हैं।

Natalya Bogorodskaya
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रोमांचक यात्राएँ करने वाले साँक्त पितेरबुर्ग के एक साहसी परिवार के सदस्य नताल्या और प्योतर बगारोदस्की बताते हैं — उत्तरध्रुवीय इलाके के सफ़ेद भालुओं से अपनी जान बचाते-बचाते हम दोनों समुद्री तूफ़ान की लहरों में डूबते-डूबते बाल-बाल बचे थे। लेकिन उत्तरी ध्रुव के उस दुर्गम और मानवरहित इलाके में पहुँचकर ही हमें अपने जीवन की सही-सही कीमत महसूस होती है, जब मौत सिर पर मण्डरा रही होती है और तुम्हारे आसपास तो क्या दूर-दूर तक कोई भी तुम्हारी सहायता करने के लिए नहीं होता। मौत का यह स्वाद चखे बिना ज़िन्दगी वैसी ही फीकी-फीकी लगती है, जैसे बिना नमक के सूप।  

नताल्या और प्योतर सन् 2008 से उत्तर ध्रुवीय इलाकों की यात्रा कर रहे हैं। कभी वे डोंगी पर सवार होकर सफ़ेद सागर और लाल सागर में घूमते हैं तो कभी छोटी नाव या बेड़े पर सवार होकर बेरिन्त्स सागर के रास्ते लादगा झील से ’नई धरती’ के उस शिविर तक पहुँचते हैं, जहाँ रहकर पहले वैज्ञानिकों का दल शोध किया करता था।

फ्रांज जोसेफ भूमि, ग्राहम बेल के द्वीप 

फ्रांज जोसेफ भूमि — रूस की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर बनी आखिरी चौकी है। इसके बाद उत्तरी ध्रुव क्षेत्र शुरू हो जाता है, जहाँ बर्फ़ ही बर्फ़ फैली हुई है और ठण्ड का साम्राज्य है। ग्राहम बेल द्वीप पर भी 1993 से कोई नहीं रहता। पहले वहाँ बर्फ़ पर एक हवाई-पट्टी बनी हुई थी और दो सैन्य बस्तियाँ बसी हुई थीं।  

नताल्या और प्योतर ने ’रशियन आर्कटिक’ नामक नेशनल पार्क के एक दल के साथ सन् 2013 में इस इलाके की यात्रा की थी, जब उनसे यह अनुरोध किया गया था कि वे दोनों पूरे द्वीप पर फैले रद्दी पुराने लोहे के ड्रमों को हटाने और द्वीप की सफ़ाई करने में दल की सहायता करें। लोहे के इन ख़ाली ड्रमों का कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं था। 

इस द्वीप पर अपने काम के दौरान नताल्या और प्योतर बगारोदस्की  विमानन के इतिहास से जुड़ी ऐतिहासिक चीज़ों की खोज कर रहे थे। वे पुराने विमानों के हिस्से, उनके इंजन, पुराने हवाई-अड्डे से जुड़ी ऐतिहासिक चीज़ें, पुराने वाहनों और ट्रैक्टरों के हिस्से और पुराने राडार उपकरण आदि ढूँढ़ रहे थे। 

ग्राहम बेल द्वीप का इस्तेमाल बन्द होने के बाद तथा वहाँ बर्फ़ पर बनी हवाई-पट्टी और सैन्य-बस्तियों को त्यागने के बाद वहाँ जीवन का कोई निशान बाक़ी नहीं बचा था। जो बचा हुआ था, वे थे खण्डहर हुए मकान और लोहे के आवासीय ब्लॉक, बड़े-बड़े ख़ाली ड्रम, ट्रकों के गैराज, दुर्घटनाग्रस्त हुए एक एएन -12 विमान के हिस्से और उत्तरध्रुवीय इलाके की प्रकृति। पिछले दो दशकों से बस, यही सारा सामान यहाँ पड़ा हुआ कराह रहा है। 

आमदिरमा बस्ती 

उत्तरी हिम महासागर के तट पर बसी इस बस्ती तक कोई सड़क नहीं जाती है। बस्ती में बने कुछ दो मंज़िले पक्के मकान आज भी खड़े हुए हैं। उनके अलावा जीवन का बुनियादी ढाँचा भी बना हुआ है। सोवियत सत्ताकाल में इन मकानों में लोग रहा करते थे। अब कोई नहीं रहता। मनुष्य ने इन मकानों को त्याग दिया है। नताल्या और प्योतर जब 2010 में बेरिन्त्स सागर के तटवर्ती इलाकों की यात्रा पर निकले तो अपनी हलकी डोंगी में बैठकर कारा सागर को पार करके यहाँ पहुँचे थे।

हालाँकि यह आमदिरमा बस्ती पूरी तरह से जनविहीन नहीं हुई है। यहाँ आज भी क़रीब 300 व्यक्ति रहते हैं। ख़ाली पड़े मकानों की बगल में ही बने कुछ दूसरे बहुमंज़िला मकानों में ये लोग रहते हैं। इस पुरानी सैनिक बस्ती में आज भी बच्चों की खिलखिलाहटें गूँजती हैं। बस्ती में बनी एकमात्र दुकान के पास एक गाड़ी खड़ी हुई है, जिसमें बारहसिंघे जुते हुए हैं। स्थानीय निनेत्स जाति का एक बारहसिंघा-पालक दुकान पर कुछ ख़रीदारी करने के लिए आया हुआ है। और बस्ती के छोरों पर समुद्र तट के पास सफ़ेद भालू घूमते दिखाई दे जाते हैं।

नताल्या और प्योतर बगारोदस्की को बस्ती से कुछ ही दूर गुम्बदनुमा एक इमारत के खण्डहर दिखाई देते हैं। टूण्ड्रा की इस मखमली ज़मीन पर दिखाई दे रहे इस सफ़ेद छतरीनुमा ढाँचे में ही पहले ’लेना-एम’ नाम के मोबाइल राडार आकर शरण लिया करते थे। 

’लेना-एम’ राडारों की इस दोमंज़िला इमारत में आज भी चारों तरफ़ लोहे के ऐसे मजबूत किवाड़ लगे हुए हैं, जिनको आग से कोई नुक़सान नहीं पहुँच सकता। इमारत के अन्दर चारों तरफ़ रोशनदानों की तरह के आलों और तारों का जाल बिछा हुआ है। 

उत्तरध्रुवीय इलाके की उजाड़ बस्तियाँ : भालू कहाँ रहते हैं

उत्तरध्रुवीय इलाके की ’नई धरती’ पर पिछली सदी में बसे हुए गाँव और बस्तियाँ आज उजाड़ और वीरान पड़ी हैं। इन बस्तियों में बने मकान खण्डहरों में बदल चुके हैं। अब वहाँ कोई नहीं रहता। नताल्या और प्योतर इन इलाकों की यात्रा के दौरान अपने साथ लगातार कोई न कोई आग्नेय-अस्त्र रखते थे। यहाँ के स्थाई निवासियों सफ़ेद भालुओं से उनकी पहले भी मुठभेड़ हो चुकी थी और वे यह समझते थे कि आदमी इन भूखे भालुओं के लिए ख़तरा नहीं बल्कि भोजन है। 

पड़ोस की बस्तियों में आजकल वे लोग अभी भी छुट्टियाँ बिताने के लिए आते हैं, जिनका बचपन उत्तरी ध्रुव के इसी इलाके में बीता है। ऐसे लोग भी हैं, जो अपने छोड़े जा चुके इन घरों का इस्तेमाल अपने दाचे (फ़ार्महाउस) के रूप में करते हैं। छुट्टियों में वे यहाँ आकर अपने पुराने घर में रहते हैं, मछलियाँ पकड़ते हैं, शिकार करते हैं, घूमते-फिरते हैं और आराम करते हैं।

सेण्ट नोस (पवित्र नाक) अन्तरीप 

उत्तरीध्रुवीय इलाके की अपनी रोमांचक और साहसी यात्रा के दौरान नताल्या और प्योतर बगारोदस्की सेण्ट नोस (पवित्र नाक) अन्तरीप में बहुत कम समय के लिए रुके, क्योंकि वहाँ रुकना खतरे से ख़ाली नहीं था। अन्तरीप का तटवर्ती इलाका पथरीला है और वहाँ लंगर डालना बहुत मुश्किल है। समुद्र के इस इलाके में लहरों का बहाव बहुत तेज़ था, जो नताल्या और प्योतर की डोंगी को बहाकर ले जा सकता था। अगर उनकी डोंगी बह जाती तो उनके वापिस लौटने के सारे रास्ते ही बन्द हो जाते। 

नताल्या और प्योतर बगारोदस्की को सेण्ट नोस अन्तरीप पर मनुष्य के कोई चिह्न नहीं मिले। उजड़े पड़े मकानों को देखकर रीढ़ की हड्डी में एक ठण्डी लहर दौड़ गई। घुटने-घुटने तक उगी घास पर चलकर दोनो यात्री द्वीप पर बने और अब उजाड़ पड़े प्रकाशस्तम्भ तक गए। उसका लोहे का दरवाज़ा खुला हुआ था और तेज़ हवा में झूल रहा था। प्रकाशस्तम्भ में एक गोल ऊँची-सी सीढ़ी ऊपर की तरफ़ जा रही थी। वहाँ फैले धुँधलके को पार करके नताल्या और प्योतर इस आठमंज़िले प्रकाशस्तम्भ की ऊपरी मंज़िल पर पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने खिड़की से झाँककर देखा तो दूर चारों तरफ़ बर्फ़ीला समुद्र ही दिखाई दिया। प्योतर को जब यह ख़याल आया कि पहले कैसे कुछ कर्मचारी तूफ़ानों और उत्तरध्रुवीय रातों में इस प्रकाशस्तम्भ में अकेले रहते थे तो उनके शरीर में एक झुरझुरी-सी उठी। वे यह सोचकर ही घबरा गए कि कैसे भयानक तूफ़ानी लहरें उन रातों में पत्थर के पुश्ते पर चोट करती होंगी और वहाँ अकेले रहने वालों के मन में एक हाहाकार-सा पैदा हो जाता होगा।  

सोवियत सत्ताकाल में उत्तरध्रुवीय कठोर जलवायु को झेलने वाले लोग अब दशकों से यहाँ नहीं रहते। लेकिन उनके उजाड़ और वीरान मकान, प्रकाशस्तम्भ और हवाई-पट्टियाँ आज भी जैसी की तैसी पड़ी हुई हैं। नताल्या और प्योतर उत्तरध्रुवीय इलाकों की अपनी यात्राओं के दौरान दुर्गम रास्तों को पार करके इन गाँवों और बस्तियों में फिर से पहुँच रहे हैं। अपनी इन यात्राओं के रिपोर्ताज और तस्वीरें वे रूसी भाषा में अपनी वेबसाइट ’सेवप्रस्तोर’ में लगातार प्रकाशित करते रहते हैं।

 

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