रूस में भारत के शास्त्रीय नृत्य क्यों लोकप्रिय हैं?

आज यह स्थिति है कि मास्को में सारे साल कहीं न कहीं भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी और ओडिसी नृत्यों की प्रस्तुतियों का आयोजन होता रहता है। लेकिन नई पीढ़ी के रूसियों की दिलचस्पी भारत के शास्त्रीय नृत्यों में उतनी नहीं दिखाई देती। ऐसा हो सकता है कि समय बीतने के साथ-साथ रूस में भारत के शास्त्रीय नृत्यों की लोकप्रियता भी घटती चली जाय।
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रूस में भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी और ओडिसी जैसे भारत के शास्त्रीय नृत्य बेहद लोकप्रिय हैं। स्रोत :Irina Iskorostenskaia

21 फ़रवरी को मास्को में रूसी नर्तकी मरीया झिल्त्सोवा और भारतीय नर्तकी प्रियंका कुमार भरतनाट्यम प्रस्तुत करने जा रही हैं। भरतनाट्यम की विभिन्न शैलियों को पसन्द करने वाले रूसी दर्शकों के लिए मास्को में इस तरह के आयोजन अक्सर होते रहते हैं। पिछले क़रीब 30 साल से रूसी नर्तकियाँ  प्रायः भारतीय दूतावास के सहयोग से भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी और ओडिसी नृत्यों की वर्कशापों, प्रतियोगिताओं और प्रस्तुतियों का आयोजन करती रहती हैं।

भारतीय नृत्यों में दिलचस्पी कैसे पैदा हुई? 

1970 से 1990 के बीच रूस में भारतीय फ़िल्में बेहद लोकप्रिय थी और इन फ़िल्मों में दिखाए जाने वाले भारतीय नृत्यों में रूसी लड़कियाँ भी गहरी दिलचस्पी लेने लगीं। रूस में ’नृत्य सभा’ नामक कोष की निदेशिका और भरतनाट्यम नृत्य की प्रसिद्ध विशेषज्ञ इरीना इस्करास्तेनस्कया ने बताया — रूस में उस समय विदेशी फ़िल्में कम दिखाई जाती थीं, लेकिन भारतीय फ़िल्में अक्सर रूसी परदे पर दिखाई देती थीं। आज की हिन्दी फ़िल्मों में और तब की फ़िल्मों में बड़ा फ़र्क था। तब हिन्दी फ़िल्मों में परम्परागत भारतीय नृत्यों और संगीत की भरमार होती थी। भारतीय संस्कृति में गहरी दिलचस्पी लेने वाले अन्य रूसी लोगों की तरह इरीना भी फ़िल्मों के माध्यम से ही भारत के शास्त्रीय नृत्यों में भी दिलचस्पी लेने लगीं।

’कथक चक्र’ नृत्य स्टूडियो की संचालिका येकतिरीना सिलिवेर्स्तवा ने बताया — पिछली सदी के नौवें दशक में रूस में भारतीय नृत्य प्रस्तुत करने वाली अनेक शौकिया संगीत और नृत्य मण्डलियाँ बन गई थीं, जो भारत की फ़िल्मों मे दिखाए जाने वाले नृत्यों को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करती थीं। फ़िल्में देख-देखकर ही ये रूसी युवतियाँ भारत के विभिन्न नृत्य सीख गई थीं।

फिर 1987-88 में रूस में भारत महोत्सव का आयोजन हुआ, जिसमें भाग लेने के लिए प्रसिद्ध भारतीय नर्तक सोवियत संघ आए और उन्होंने मास्को, लेनिनग्राद, कियेफ़ और ताशकन्द में अपने कार्यक्रम प्रस्तुत किए। इस्करास्तेनस्कया ने रूस-भारत संवाद को तब के अपने संस्मरण सुनाते हुए कहा — 1987 का साल रूस में भारत के साल के रूप में मनाया गया था। मैं पूरे विश्वास के साथ यह बात कह सकती हूँ कि वह साल सिर्फ़ मेरे लिए ही नहीं, बल्कि बहुत से रूसी लोगों के लिए भारत के प्रति प्रेम के अंकुर फूटने का साल बन गया था। भारतीय शास्त्रीय नृत्यों को पसन्द करने वाले हम में से बहुत से लोगों ने तब न केवल प्रसिद्ध भारतीय नर्तकों के दर्शन ही किए, बल्कि हमें उनके साथ काम करने का मौक़ा भी मिला। कोई दुभाषिए के रूप में उनसे जुड़ गया था, तो कोई उनके कार्यक्रमों के प्रस्तोता के रूप में, तो कोई आयोजक के रूप में। इस तरह हम बड़े-बड़े भारतीय कलाकारों के सीधे सम्पर्क में आ गए थे।  

फिर 1989 में मास्को में भारतीय दूतावास ने जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केन्द्र खोला। बस, तभी से यह भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र रूस में भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार और विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केन्द्र भारत की संस्कृति में गहरी रुचि दिखाने वाले युवक-युवतियों को छात्रवृत्तियाँ भी प्रदान करता है और उन्हें भारतीय नृत्य, संगीत व अन्य कलाएँ सीखने के लिए भारत के विभिन्न कला केन्द्रों में भारत भी भेजता है। 

जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केन्द्र में भी भारतीय नृत्य और संगीत का प्रशिक्षण दिया जाता है। शुरू में इस केन्द्र में प्रशिक्षण पाकर और बाद में भारत जाकर भारत के प्रसिद्ध कला केन्द्रों में जमकर अभ्यास करने के बाद रूस में भारत के शास्त्रीय नृत्य करने वाले नर्तकों और भारतीय संगीत-वाद्य वादकों की एक पूरी फ़ौज खड़ी हो गई। 2003 में इन लोगों ने मिलकर ’नृत्य सभा’ नामक अपना एक संगठन भी बना लिया। आजकल इस संगठन में विभिन्न आयु-वर्ग के भिन्न-भिन्न स्तरों वाले और विभिन्न भारतीय नृत्य शैलियों में नृत्य प्रस्तुत करने वाले नर्तक शामिल है, जो समय-समय पर रूस में नृत्य सम्बन्धी व्याख्यानों, कार्यशालाओं, प्रतियोगिताओं और प्रस्तुतियों का आयोजन करते रहते हैं और अपने शिष्यों को आगे प्रशिक्षण के लिए भारत भेजते रहते हैं। 

नृत्य के प्रति गहरा लगाव  

शास्त्रीय नृत्यों के भारतीय गुरुओं के अनुसार, रूस में भारत के शास्त्रीय नृत्यों में गहरी रुचि लेने वाले लोग बड़ी संख्या में उपस्थित हैं। मास्को के जवाहरलाल नेहरू सांस्कृतिक केन्द्र में कत्थक नृत्य सिखाने वाले गुरु धर्मेन्द्र गौतम ने रूस-भारत संवाद को बताया — मैंने रूस के क़रीब 15 शहरों में अपने नृत्य-कार्यक्रम प्रस्तुत किए हैं। हर शहर में मेरा भावभीना स्वागत किया गया। लोग बड़ी आत्मीयता और स्नेह के साथ मुझसे मिले और हर जगह मेरी ख़ूब अच्छी तरह से आवभगत की गई। और यह सब वे इसलिए नहीं कर रहे थे चूँकि वे मेरा सम्मान करते हैं, बल्कि इसलिए कर रहे थे क्योंकि वे मेरी कला का सम्मान करते हैं। भारतीय संस्कृति के प्रति इतना गहरा लगाव और इतना खुलापन मैंने रूस के अलावा दुनिया के और किसी भी देश में नहीं देखा। 

गुरु धर्मेन्द्र गौतम ने रूसी लोगों की मानसिकता का ज़िक्र करते हुए कहा कि वे सिर्फ़ भारतीय नृत्य ही नहीं सीखते, बल्कि भारतीय संस्कृति का भी गहराई से अध्ययन करते हैं। वे भारत की प्राचीन परम्पराओं को निकट से समझने और उनका पालन करने की कोशिश करते हैं। ’नृत्य सभा’ की सदस्य और कुचिपुड़ी नृत्य की गुरु वेरा कृष्णाराज ने कहा — रूस में ऐसे लोग बड़ी संख्या में हैं, जो भारत की संस्कृति से लगाव रखते हैं। वे भारतीय संस्कृति की बारीकियों को समझने की कोशिश करते हैं, उसे दिल की गहराइयों से महसूस करते हैं और उसे अभिव्यक्त करते हैं। आत्मा के स्तर पर ही दो संस्कृतियों के बीच यह आदान-प्रदान होता है।

भविष्य क्या है? 

रूस में भारतीय संस्कृति और विशेष रूप से भारतीय शास्त्रीय नृत्यों के विकास की क्या सम्भावनाएँ हैं? हमारे इस सवाल का जवाब अलग-अलग रूसी नर्तकों ने अलग-अलग दिया। 

भरतनाट्यम की गुरु और भारतीय दर्शन की अध्येता आन्ना स्मिरनोवा का मानना है कि समय बीतने के साथ-साथ शायद रूस में भारतीय नृत्यों के प्रति लगाव कम हो जाएगा। उन्होंने कहा — हमारी पीढ़ी ही वह पहली और आख़िरी पीढ़ी है, जिसने भारतीय शास्त्रीय नृत्यों को बड़ी गम्भीरता से समझा और अपनाया। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि भारत के शास्त्रीय नृत्यों में पूरी तरह से पारंगत होने के लिए जीवन के अनेक वर्ष देने पड़ते हैं। बहुत कुछ छोड़ना पड़ता है, लेकिन अन्त में इसका कोई वित्तीय और आर्थिक परिणाम सामने नहीं आता। हमारे जैसे आदर्शवादी लोग रूसी समाज में अब लगभग नहीं के बराबर हैं। हम सोवियत समाज में या सोवियत संघ के पतन के तत्काल बाद के दौर में पले-बढ़े थे।हमारे जीवन-मूल्य दूसरे थे, लेकिन आज की पीढ़ी के जीवन-मूल्य दूसरे हैं। पर इसके बावजूद मेरा मानना है कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य वह दिव्य और आध्यात्मिक कला है, जो अपने विकास का रास्ता ख़ुद ढूँढ़ लेगी।  

कृष्णाराज भी इनसे सहमत हैं। उनके मानना है कि इण्टरनेट संस्कृति के दौर में पलने और बढ़ने वाली आज की पीढ़ी गम्भीर नहीं है और वह कठोर परिश्रम नहीं करना चाहती। इसी कारण से शास्त्रीय नृत्य सीखने वाले लोगों की संख्या कम होती जा रही है। अब सिर्फ़ वही लोग भारत के शास्त्रीय नृत्य सीखने के लिए आते हैं, जिन्हें वास्तव में भारतीय संस्कृति से बेहद लगाव है। 

लेकिन ये सभी नृत्यगुरु इस बात से सहमत हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, लेकिन रूस में उत्साही लोगों की कमी नहीं है और यह परम्परा आगे जारी रहेगी।

 

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