येलेना रेरिख़ का कहना था – कलिम्पोंग ही मेरा घर है

25 मार्च 2017 अजय कमलाकरन
रूसी दार्शनिक, कवि और लेखिका येलेना रेरिख़ ने अपने जीवन के अन्तिम सात वर्ष उत्तर बंगाल के कलिम्पोंग शहर के शान्त वातावरण में बिताए थे। यहाँ रहकर वे हर रोज़ पूर्वी हिमालय पर्वतमाला के पहाड़ों और कंचनजंघा की चोटी के दर्शन किया करती थीं।
Helena Roerich
येलेना रेरिख़ का चित्र।

रहस्यमयी रेरिख़ परिवार के सदस्यों को यह विश्वास था कि गुरु मोरया उनका पथ-प्रदर्शन करते हैं। उल्लेखनीय है कि गुरु मोरया थियोसॉफिकल सोसाइटी (ब्रह्मविद्या सभा) की संस्थापक येलेना ब्लावत्स्कया के भी गुरु थे। 1947 में निकलाय रेरिख़ के देहान्त के बाद उनकी पत्नी येलेना रेरिख़ ने भारत में ही रहकर अपने परिवार के कामों को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया। येलेना रेरिख़ न सिर्फ़ निकलाय रेरिख़ की जीवनसंगिनी थीं, बल्कि वे स्वयं भी एक महान लेखिका, कवि और दार्शनिक थीं।

येलेना रेरिख़ अपने पुत्र गिओर्गी के साथ दिल्ली चली गईं। वहाँ से वे मुम्बई के नज़दीक स्थित खण्डाला पहुँची। और फिर 1949 में वे उत्तर बंगाल के कलिम्पोंग नामक शान्त पहाड़ी शहर में जाकर बस गईं।

रूथ ड्रेयर ने ‘निकलाय तथा येलेना रेरिख़ : दो महान कलाकारों व शान्तिदूतों की आध्यात्मिक यात्रा’ नामक अपनी पुस्तक में लिखा है कि येलेना रेरिख़ ने कलिम्पोंग में ’(अपने परिवार की) आध्यात्मिक विरासत को भविष्य में भी सुरक्षित रखने के लिए खूब मन लगाकर काम किया’।

कलिम्पोंग में येलेना रेरिख़ क्रुकेटी हाउस नामक बंगले में रहा करती थीं, जिसे अँग्रेज़ों ने पिछली सदी के पाँचवें दशक के शुरू में बनवाया था। ऐसा माना जाता है कि अगले सात वर्षों तक उन्होंने गुरु मोरया द्वारा निर्धारित कार्य का सम्पादन किया। रूथ ड्रेयर के अनुसार येलेना रेरिख़ ने अपने साथियों से कहा था — महागुरु के प्रकाश के कारण ही मेरा अस्तित्व बना हुआ है। महागुरु के अनुसार, अभी मेरा इस लौकिक जगत में रहना ज़रूरी है क्योंकि उच्चतम ब्रह्माण्डीय प्रतीक के अन्तर्गत चल रहे इस काम में कोई दूसरा आदमी मेरी जगह नहीं ले सकता है। इस सदी को मेरे बोध और मेरी सिद्धी की ज़रूरत है। येलेना रेरिख़ का प्रमुख लक्ष्य था — अग्नियोग के सन्देश का प्रचार-प्रसार।

जब येलेना रेरिख़ कलिम्पोंग पहुँची, उनकी उम्र लगभग 70 साल की हो चुकी थी और उनकी तबियत ख़राब रहने लगी थी। लेकिन उनमें बीमारी के कोई विशेष लक्षण दिखाई नहीं दे रहे थे। जर्मनी के नागरिक हेनरिख़ माय अग्नियोग के सिद्धान्तों के अनुगामी हैं। वे साल भर में छह महीने भारत में ही रहते हैं। उन्होंने बताया —  येलेना रेरिख़ को कलिम्पोंग के स्थानीय निवासियों से बड़ा लगाव था और वे तिब्बती, गोरखा तथा बंगाली लोगों के साथ ख़ूब घुलमिल गई थीं। यह जानना बड़ा कठिन है कि उस समय गुरु मोरया उन्हें क्या करने का निर्देश दे रहे थे, किन्तु येलेना रेरिख़ का सम्पर्क निश्चित रूप  से चेतना के किसी अन्य आयाम तक था। वैसे पश्चिम का विज्ञानवादी समाज इस बात को शायद ही स्वीकार करेगा।

उन्होंने कुल्लू में उरुस्वती हिमालय अध्ययन संस्थान की स्थापना की थी। अगले छह साल तक वे वहाँ जाती रहीं, लेकिन उनका ज़्यादातर समय कलिम्पोंग में ही बीतता था।

हेनरिख़ माय ने आगे बताया —  वे ज़्यादातर क्रुकेटी हाउस में ही अपना समय बिताती थीं। बंगले के लॉन में बैठकर हिमालय की ताज़ा हवा में वे या तो कुछ न कुछ लिखा करती थीं, कभी चित्र बनाया करती थीं, तो कभी ध्यान किया करती थीं।

अक्टूबर 1955 में नींद के दौरान ही उन्हें दो बार दिल के दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई। उस समय उनकी आयु 76 वर्ष थी।  उनके पार्थिव शरीर का दाह-संस्कार उनकी इच्छानुसार कंचनजंघा के सामने स्थित एक पर्वतचोटी पर किया गया। बाद में उनकी भस्म को एक बौद्ध स्तूप के भीतर रख दिया गया। झांग ठोक पालरी फोदांग बौद्ध मठ के परिसर में स्थित इस स्तूप पर यह स्मृतिलेख अंकित है — येलेना रेरिख़, पत्नी निकलाय रेरिख़, विचारक व लेखिका, भारत की पुरानी मित्र।

उनके पुत्र गियोर्गी और स्वेतस्लाफ़ और पुत्रवधू देविका रानी यह देखकर अभिभूत हो गए कि उनकी अन्त्येष्टि में भाग लेने के लिए पूरे एशिया से लोग आए हुए थे। रूथ ड्रेयर ने अपनी पुस्तक में लिखा है —  हिन्दू, चीनी, अफ़गान, तिब्बती, मंगोल, नेपाली, भूटानी और यहाँ तक कि कुछ जापानी लोगों ने भी उनकी शवयात्रा में भाग लिया था।

येलेना रेरिख़ संग्रहालय

अब क्रुकेटी हाउस में रेरिख़ संग्रहालय बना हुआ है। रेरिख़ परिवार के जिन इतालवी अनुरागियों ने हिमालय आचारनीति व उत्तम जीवन संस्थान की स्थापना की थी, इस संग्रहालय का प्रबन्धन उनके ही हाथों में है।

कलिम्पोंग आने वाले यात्रियों के लिए अब यह संग्रहालय एक प्रमुख पर्यटक स्थल बन चुका है। ब्रिटेन से आए पर्यटक इयान ग्राहम ने एक लोकप्रिय यात्रा समीक्षा वेबसाइट पर लिखा है – ससेक्स के देहाती घरों जैसे दिखने वाले इस भवन का अग्नियोग संगठन ने बहुत अच्छी तरह से पुनरुद्धार कराया है। इस भवन में नीरव शान्ति व्याप्त है। इसमें प्रवेश करते ही आपकी चेतना ध्यानस्थ स्थिति में जाने लगती है।

हेनरिख़ माय जैसे पर्यटकों की यह विशेष सलाह है कि आप यहाँ के उद्यान में शान्तिपूर्वक बैठें और चेतना की गहराइयों में उतरने की कोशिश करें।

पुनश्च:

यह बात बड़ी उत्साहवर्धक है कि रेरिख़ परिवार की विरासत भारत के कोने-कोने में फैली हुई है।  रेरिख़ परिवार भारत के महानतम हितैषियों में से एक था।

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