मक्सीम गोर्की की तीन किताबें, जो सबको पढ़नी चाहिए

6 अप्रैल 2016 रूस-भारत संवाद
मक्सीम गोर्की ने 1906 में ’माँ’ उपन्यास लिखा था, जो सोवियत साहित्य में सर्वोत्तम उपन्यास माना जाता है और जिसे समाजवादी यथार्थवाद को उकेरने वाली पहली रचना बताया जाता है। आज रूस-भारत संवाद आपको विश्व-प्रसिद्ध सोवियत लेखक मक्सीम गोर्की की उन तीन रचनाओं के बारे में बताने जा रहा है, जो हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए।
Maxim Gorky
विश्व-प्रसिद्ध सोवियत लेखक मक्सीम गोर्की। स्रोत :TASS

आज से क़रीब 150 साल पहले जन्म लेने वाले अलिक्सेय पेशकफ़ ने 20 साल की उम्र में अख़बारों में लेख लिखने के लिए गोर्की यानी कड़वा तखल्लुस रख लिया था क्योंकि वे उस समय राजनीतिक रूप से भी सक्रिय थे। बाद में यही गोर्की समाजवादी यथार्थवाद का प्रतीक बन गए। लेकिन सोवियत अधिकारियों के साथ भी उनके रिश्ते खट्टे-मीठे और जटिल बने रहे। उन्होंने अपनी आत्मकथात्मक रचनाओं के अलावा अनेक कहानियाँ, उपन्यास और नाटक लिखे हैं।

1.  माँ

मुनीश नारायण सक्सेना द्वारा अनूदित एक क्लासिक उपन्यास

हाल ही में दिल्ली के मेधा बुक्स प्रकाशन ने मक्सीम गोर्की के मुनीश नारायन सक्सेना द्वारा अनूदित उपन्यास ’माँ’ का नया संस्करण प्रकाशित किया है। मुनीश नारायण सक्सेना ने इस उपन्यास का अनुवाद पिछली सदी के आठवें दशक के अन्त में किया था। लेकिन उनसे पहले छठे दशक के आख़िर में ही ’माँ’ उपन्यास का हिन्दी में पहला अनुवाद प्रकाशित हो चुका था। प्रकाशन के बाद ही भारत के छात्रों और मज़दूरों के बीच यह उपन्यास बेहद लोकप्रिय हुआ था और आज हालत यह है कि हर साल माँ उपन्यास का एक नया संस्करण सामने आता है और हिन्दी के कई प्रकाशक इसे प्रकाशित कर चुके हैं। माँ उपन्यास का एक हिस्सा गोर्की ने अमरीका में लिखा था और सबसे पहले 1907 में  अँग्रेज़ी में न्यूयार्क लिटरेरी मैगज़ीन में इस उपन्यास के कई अंश प्रकाशित हुए थे। 

माँ उपन्यास में वर्णित घटनाएँ एकदम सच्ची हैं और वे रूस के नीझ्नी नोवगरद शहर में घटी थीं, जहाँ मक्सीम गोर्की का जन्म हुआ था। 1902 में मज़दूरों ने मई दिवस के अवसर पर एक जुलूस का आयोजन किया था और तत्कालीन रूस की सेना ने उस जुलूस को तितर-बितर करके जुलूस का आयोजन करने वाले मज़दूर नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया था। क्रान्तिकारी मैकेनिक प्योतर ज़लोमफ़ ने इस जुलूस में बैनर हाथ में उठाकर सक्रिय रूप से भाग लिया था और जुलूस में शामिल मज़दूरों के सामने एक क्रान्तिकारी भाषण भी दिया था। इन प्योतर ज़लोमफ़ से प्रेरणा ग्रहण करके  गोर्की ने अपने उपन्यास माँ के नायक पाविल व्लासफ़ की रचना की और उनकी माँ ही इस उपन्यास की मुख्य नायिका हैं। 

व्लदीमिर लेनिन ने माँ उपन्यास को समय की कसौटी पर खरा उतरा उपन्यास बताया था। लेकिन अँग्रेज़ी में माँ उपन्यास का अनुवाद करने वाले अनुवादक  हग एपलिन का मानना है कि माँ उपन्यास राजनीति के बारे में उतना नहीं है, जितना वह ईसाई दृष्टि से माँ के आत्म-बलिदान को प्रस्तुत करता है। हालाँकि सारी दुनिया में इस उपन्यास को समाजवादी यथार्थवाद का प्रतीक माना जाता है, जिसमें ऐसे बहुत से दृश्य हैं जो समाजवादी यथार्थवादी नज़रिए को प्रस्तुत करते हैं। इसमें रूस में उस समय चल रहे मज़दूर आन्दोलन का सच्चा चित्र उभारा गया है। मज़दूर पर्चे बाँटते हुए दिखाइ दे रहे हैं, वे चाय के समोवार के आसपास इकट्ठे होकर ऐतिहासिक पुस्तकों पर और मज़दूरों की गुलामी भरी हालत पर चर्चा करते हैं। इस उपन्यास में कारख़ानों में काम करने वाले मज़दूरों के जीवन और उनके मालिकों की क्रूरताओं और सनक के अनेक यथार्थवादी चित्र प्रस्तुत किए गए हैं।
 
उपन्यास में माँ के आत्मविश्लेषण के सहारे मज़दूरों के नज़रिए और उनके राजनीतिक अभियानों का वर्णन किया गया है। मज़दूरों की बातें सुनकर माँ के भीतर अनेक भावनात्मक परिवर्तन आते हैं और वे अपने भय और भ्रम की स्थिति से उबर जाती है। पाविल उसे बताता है कि जल्दी ही उन लोगों का अन्त हो जाएगा जो हमारे ऊपर आदेश चलाते हैं और हमारे डर का फ़ायदा उठाकर हमारा शोषण करते हैं। और उपन्यास के अन्त में अदालत में अपने बेटे का भाषण सुनते हुए माँ न्यायाधीशों की लोलुप आँखें देखती है, जो उसके बेटे के लचीले मज़बूत शरीर को बरबाद करने की सोच रहे हैं, लेकिन बेटे का विश्वास और उसकी बातें माँ की आँखें भी पूरी तरह से खोल देती हैं।

2. सूरज के बेटे

’सूरज के बेटे’ मक्सीम गोर्की का एक विश्वप्रसिद्ध नाटक है, जो 1905 के तत्कालीन रूस की क्रान्तिकारी धरती में उभर रहे समाज और विज्ञान के बारे में है। यह नाटक मक्सीम गोर्की ने माँ उपन्यास की रचना करने से एक साल पहले यानी 1905 में जेल में लिखा था। गोर्की को रूस के ज़ार के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी करने के लिए ज़ार की पुलिस ने पकड़कर जेल में डाल दिया था। हिन्दी में इस नाटक का अनुवाद अब तक उपलब्ध नहीं है। अगर हिन्दी में यह नाटक अनूदित हो गया होता तो न जाने कितनी बार उसका मंचन हो चुका होता।

हाल ही में ब्रिटेन में लन्दन के नेशनल थियेटर ने एण्ड्र्यू अपटन द्वारा अनूदित इस नाटक का मंचन किया था। इस नाटक में गोर्की ने सामाजिक न्याय और असमानता का सवाल उठाते हुए देश में फैले भ्रष्टाचार पर प्रश्नचिह्न लगाया है।  अपटन का कहना है कि वे गोर्की के नाटक की ऐतिहासिकता पर कोई सवाल नहीं उठाते, लेकिन समाज में बदलाव करने का दबाव डालने वाली विचारधारा द्वारा समाज पर किया जाने वाला कब्ज़ा वे बर्दाश्त नहीं कर सकते। अतीत एक दर्पण है, जो यह देखने की अन्तर्दृष्टि देता है कि समाज में कितना बदलाव हुआ है या कौन-कौन से बदलाव नहीं हुए हैं। उन्होंने गोर्की के इस नाटक के एक पात्र जुनूनी वैज्ञानिक पाविल प्रतासफ़ को हास्यास्पद बताया है, जो इस तरह की भविष्यवाणियाँ करता है कि देवदारू के रेशे से भी मुलायम अण्डरवियर बनाया जा सकता है, जिस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इस नाटक का एक अन्य पात्र कलाकार वागिन जवाब देता है कि तुम्हारा यह भविष्य तो ख़ूनी ढंग से असहज लगता है।

प्रतासफ़ भविष्यवाणी करता है कि जल्दी ही रसायनशास्त्र जीवन के गुप्त रहस्यों को खोल देगा और सौ साल बाद ही हम परखनली में जीवन की रचना करने लगेंगे और मौत एक परखनली से हार जाएगी। रसायनों की बोतलों में पैदा होने वाले बुलबुले और भाप  बीसवीं सदी में जीवन को बड़ी तेज़ी से बदल देंगे। आज मज़दूर वर्ग विद्रोह पर उतारू है, जबकि आत्मसन्तुष्ट और आत्मविमोही मध्यवर्ग सिर्फ़ बड़े धुंधले रूप में ही यह समझ पा रहा है कि एक नया सामाजिक प्रयोग शुरू होने जा रहा है।

3.  मेरा बचपन

1966 में गोर्की की आत्मकथा का पहला भाग ’मेरा बचपन’ हिन्दी में अनुवाद होकर सामने आया था। तब नीझ्नी नोवगरद शहर को भी मक्सीम गोर्की के सम्मान में गोर्की कहकर पुकारा जाता था। इस आत्मकथा के पहले भाग की भूमिका में मक्सीम गोर्की को बीसवीं शताब्दी के रूसी साहित्य का एक महान् लेखक बताया गया था। सोवियत संघ के पतन के बाद के कुछ वर्षों में गोर्की की रचनाओं की उपेक्षा की जाने लगी थी। उनकी किताबों का फ़ैशन कम हो गया था। लेकिन गोर्की की जो किताबें छापनी बन्द कर दी गई थीं वे अचानक फिर से छपकर सामने आने लगीं। अब साफ़-साफ़ यह लगता है कि गोर्की की रचनाओं से मुँह मोड़ना सम्भव नहीं हैं। उनकी रचनाओं में जीवन गूँजता है। ’मेरा बचपन’ में गोर्की के बचपन का बेहद मार्मिक वर्णन है। अपनी आत्मकथा का यह पहला भाग गोर्की ने 1913 में लिख था, जब वे इटली के काप्री द्वीप पर निर्वासन के कई वर्ष काटकर वापिस रूस लौटे थे।

’मेरा बचपन’ की शुरूआत लेखक के पिता के अन्तिम संस्कार के एक दृश्य से होती है। पिता की आँखों पर ताम्बे के काले सिक्के रखकर उनकी आँखों की चमक को छुपा दिया गया है। गोर्की ने बड़ी सादगी के साथ एक बच्चे की नज़र से पिता के अन्तिम संस्कार का ज़िक्र किया है। बच्चा अपनी नानी के पीछे छिपने की कोशिश कर रहा है और इस बात को लेकर परेशान है कि वहाँ मिट्टी पर फुदक रहे कुछ जीवित मेंढ़कों को भी पिता की क़ब्र में ज़िन्दा ही दफ़ना दिया जाएगा।

उसके बाद बहुत से विवरण हैं –बर्फ़ीली ठण्ड की कँपकँपाहट और झनझनाहट, मोमबत्ती की रोशनी में बजता गिटार, रूसी जीवन की कठिनाइयों के बीच ख़ुशी के कुछ क्षण, चेचक, बर्फ़ीले तूफ़ान तथा केतली से वोद्का के घूँट...इन भयानक विवरणों से भी, जिन्हें बच्चा पूरी तरह से समझ नहीं पाता, बच्चे के मन में भय का संचार होता है। बच्चे का नाना जो एक बार वोल्गा नदी में एक बजरे पर उसे घसीट चुका है, उसकी तब तक पिटाई करता है, जब तक कि वह बेहोश नहीं हो जाता। गोर्की बाद में कहते हैं  – लगातार ग़रीबी और गन्दगी में रहने वाले लोगों के लिए दुख जीवन में एक मोड़ लेकर आता है और उदासी... एक छुट्टी की तरह आती है।

उनका प्रारम्भिक जीवन लगातार मारपीट और हिंसा से भरा रहा, जिसे बाद में याद करना भी बड़ा दर्दनाक लगता है लेकिन सच्चाई आत्मदया से ज़्यादा बड़ी होती है। जीवन के उन अन्धकारमय  क्षणों के बावजूद गोर्की की आत्मकथा में यह गुण छुपा हुआ है कि वह एक राजनीतिक आशावाद पैदा करती है। मक्सीम गोर्की लिखते हैं – जीवन हमें हमेशा आश्चर्यचकित करता है... वह हमें रचनात्मक उछाह देता है... हमारे मन में हमेशा जलती रहने वाली आशा की एक मशाल जलाता है कि आगे हमारा जीवन पहले से ज़्यादा बेहतर, ज़्यादा उज्ज्वल और ज़्यादा मानवीय होगा।

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