प्रसिद्ध रूसी बाल-कहानियों के हिन्दी अनुवादों की क़िताब का भारत में विमोचन

ऐसा पहली बार हुआ है, जब भारत में किसी ने प्रसिद्ध रूसी बाल-कहानियों की एक क़िताब ’दिनीस्किनी रस्काज़ी’ (डेनिस की कहानियाँ) का सीधे रूसी से हिन्दी और मराठी में अनुवाद किया हो।
Charumanti Ramdas
‘डेनिस की कहानियाँ’ की अनुवादक डॉ० ए० चारुमती रामदास। स्रोत :Alexandra Katz

रूसी लेखक वीक्तर द्रागुन्स्की की ‘दिनीस्किनी रस्काज़ी’ नामक बालकथाओं का संग्रह बड़ी प्रसिद्ध क़िताब है। विगत 14 नवम्बर को पुणे में इस क़िताब के हिन्दी और मराठी अनुवादों का विमोचन किया गया। हिन्दी अनुवाद में इस क़िताब का नाम है — ‘डेनिस की कहानियाँ’। उल्लेखनीय है कि 14 नवम्बर को भारत में भारत के पहले प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन बाल-दिवस के रूप में मनाया जाता है। 

प्रख्यात बाल लेखक वीक्तर द्रागुन्स्की का जन्म 1913 में अमरीका के न्यूयार्क शहर में एक रूसी आप्रवासी परिवार में हुआ था। बाद में उनका परिवार वापस सोवियत संघ लौट आया। वीक्तर द्रागुन्स्की ने 1959 में ’दिनीस्किनी रस्काज़ी’ लिखनी शुरू की थीं। इससे पहले उन्होंने रंगमंच और सिनेमा में अभिनेता और सर्कस में मसखरे के तौर पर काम किया था। यही नहीं, तब तक वे अनगिनत व्यंग्य, हास्य-कथाएँ, गीत और पटकथाएँ भी लिख चुके थे।

पिछली सदी के सातवें दशक में वीक्तर द्रागुन्स्की द्वारा लिखा गया यह बालकथा संग्रह ’“दिनीस्किनी रस्काज़ी’ दिनीस करब्ल्योफ़ नामक एक 8 वर्षीय रूसी बच्चे के जीवन पर आधारित है, जो पिछली सदी के छठे दशक के उत्तरार्ध से लेकर  सातवें दशक के पूर्वाध तक अपने परिवार के साथ मस्क्वा शहर में रहता है। इन बालकथाओं में इस बच्चे, उसके माता-पिता तथा उसके संगी-साथियों की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का चित्रण किया गया है। इन कहानियों में मज़ेदार बातचीत, रोचक गुत्थियों और आश्चर्यजनक खोजों से जुड़े प्रसंगों की भरमार है।  

 / Alexandra Katz / Alexandra Katz

ऐसा लगता है कि लेखक ने दिनीस कराब्लेफ़ नामक इन बालकथाओं के नायक के चरित्र की प्रेरणा अपने पुत्र दिनीस से ही ली थी। दिनीस्किनी रस्काज़ी की एक कहानी में द्रागुन्स्की की पुत्री क्सेनिया का भी नाम आता है। आज वीक्तर द्रागुन्स्की की कृतियों का स्वत्वाधिकार उनके पुत्र दिनीस द्रागुन्स्की और पुत्री क्सेनिया द्रागुन्सकया के पास है। उल्लेखनीय है कि दिनीस द्रागुन्स्की एक लेखक व पत्रकार हैं, जबकि क्सेनिया द्रागुन्सकया एक नाटककार व गद्य लेखिका हैं।

जब भारतीय अनुवादकों डॉ० ए० चारुमती रामदास और डॉ० अनघा भट्ट ने द्रागुन्स्की से सम्पर्क किया, तो उन्होंने ’दिनीस्किनी रस्काज़ी’ की सभी 61 कहानियों को रूसी भाषा से हिन्दी और मराठी में अनुवाद करके मुद्रित व इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप (ई-पुस्तक) में भारत में प्रकाशित करने की अनुमति दे दी। 

हालाँकि ’दिनीस्किनी रस्काज़ी’ को भारत में कोई पहली बार प्रकाशित नहीं किया जा रहा है। इस पुस्तक की कुछ कहानियों का अनुवाद सोवियत सत्ता काल में ही कर लिया गया था। लेकिन ऐसा पहली बार हो रहा है कि इस पुस्तक की सभी  61  कहानियों को भारत में प्रकाशित किया गया है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार इस पुस्तक का सीधे रूसी भाषा से हिन्दी व मराठी में अनुवाद किया गया है। इससे पहले के सभी अनुवाद इसके अंग्रेजी संस्करणों से ही किए गए थे। 

भारत में इस पुस्तक को पुणे के पायनियर प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है। उन्होंने इस क़िताब को तीन खण्डों में बाँट दिया है। पहले खण्ड में 20 कहानियाँ हैं। हिन्दी और मराठी, दोनों भाषाओं में इसकी एक-एक हज़ार प्रतियाँ छापी जा रही हैं, जिन्हें महाराष्ट्र के साथ-साथ भारत के अन्य राज्यों में भी वितरित किया जाएगा। फ़्लिपकार्ट और अमेजन जैसे  ई-वाणिज्य  पोर्टलों पर भी इस क़िताब के पेपरबैक संस्करण की बिक्री की जाएगी।

डॉ० अनघा भट्ट । स्रोत : Alexandra Katzडॉ० अनघा भट्ट । स्रोत : Alexandra Katz

पायनियर प्रकाशन के संस्थापक आनन्द फटक ने रूस-भारत संवाद को बताया — हमने अभी यह पहला ही क़दम उठाया है। अब हम इस क़िताब की मार्केटिंग करने और इसे आम जनता तक पहुँचाने पर काम कर रहे हैं क्योंकि पुस्तक का विमोचन तो एक लम्बी प्रक्रिया की बस, शुरुआत भर ही है। आम पाठकों तक इस क़िताब को पहुँचाने में काफ़ी समय लगेगा। इस वर्ष के अन्त तक हम लोग ’दिनीस्किनी रस्काज़ी’ के शेष दोनों खण्डों को भी प्रकाशित करने की तैयारी कर रहे हैं। भारत में इस पुस्तक की सफल बिक्री करने के लिए हम रूस की सरकार, सांस्कृतिक संगठनों और विभिन्न कम्पनियों से भी तरह-तरह का सहयोग लेने का प्रयास करेंगे। 

‘ट्रांसलेशन पैनसिया’ नामक कम्पनी पुस्तक प्रकाशकों को अनुवाद सेवाएँ प्रदान करती है। इसकी संस्थापक और निदेशिका विदुला टोकेकर ने भाषाविधा डॉट कॉम नामक एक डिजिटल प्रकाशन पोर्टल शुरू किया है। ’दिनीस्किनी रस्काज़ी’ का ई-पुस्तक संस्करण अब भाषाविधा डॉट कॉम पर उपलब्ध है। विदुला टोकेकर ने बताया कि केवल 4 प्रतिशत भारतीय पाठक ही अँग्रेज़ी भाषा की क़िताबें पढ़ते हैं, शेष 96 प्रतिशत पाठक भारतीय भाषाओं की ही पुस्तकें पढ़ते हैं। इसलिए भाषाविधा लोकप्रिय पुस्तकों और आधुनिक साहित्य को डिजिटल स्वरूप में भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान देती है। यह स्व-प्रकाशन पोर्टल अनुवादकों और लेखकों को अपनी कृतियों को प्रकाशित करने का भी अवसर उपलब्ध कराता है। डिजिटल प्रकाशन के इस तरीके के ज़रिए भारतीय भाषाओं के आधुनिक साहित्य के साथ-साथ विदेशी भाषाओं से भारतीय भाषाओं में अनूदित साहित्य भी पूरे देश भर में अपने लक्षित पाठक वर्ग तक पहुँच जाता है। 

ए० चारुमती रामदास के अनुसार रूसी साहित्य भारत के भीतर और विशेषकर भारतीय भाषाओं में व्यापक तौर पर उपलब्ध नहीं है। चारुमती अँग्रेज़ी व विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद में रूसी भाषा पढ़ाती रही हैं और उन्होंने इससे पहले भी बुल्गाकफ़, पूश्किन, बूनिन, कुप्रीन, चुकोव्स्की तथा अन्य अनेक रूसी लेखकों की कृतियों का रूसी भाषा से हिन्दी में अनुवाद किया है। इस समय वे अलिक्सान्दर ग्रीन की ‘आलिए परूसा’  (सिन्दूरी पालों वाला जहाज़) नामक कहानी-संग्रह का अनुवाद कर रही हैं।

 / Alexandra Katz / Alexandra Katz

ए० चारुमती रामदास ने कहा — हम यहाँ दो काम कर रहे हैं। पहला, हम रूसी साहित्य, विशेषकर बाल साहित्य को लोकप्रिय बनाने में लगे हुए हैं और दूसरा यह कि  हम हिन्दी व मराठी में अनुवाद कर रहे हैं, अँग्रेज़ी में नहीं, जबकि भारत में बच्चों की अधिकतर नई पुस्तकें अक्सर अँग्रेज़ी में ही आती हैं। 

उन्होंने आगे कहा — आजकल भारत में रूसी साहित्य के नाम पर मुख्य रूप से गोगल, चेख़फ़, पूश्किन, तलस्तोय और दस्ताएवस्की की रचनाएँ पढ़ी जाती हैं।  सोवियत काल में सोवियत प्रकाशकों ने ढेर सारी रूसी पुस्तकों और लेखकों की कृतियों को विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रकाशित किया था, लेकिन उन दिनों भी रूस तथा सोवियत संघ की केवल कालजयी रचनाओं का ही प्रकाशन हो सका था। यह सच्चाई है कि आधुनिक काल के रूस के अनेक श्रेष्ठ लेखकों की रचनाओं का भारत में सही अर्थों में कभी प्रकाशन नहीं हो पाया।

पुणे विद्यापीठ में रूसी भाषा की आचार्य व विदेशी भाषा विभाग की विभागाध्यक्ष अनघा भट्ट ने अनेक रूसी लेखकों की कृतियों का अनुवाद किया है। उन्होंने याद दिलाया कि पिछली सदी के अन्तिम दशक में सोवियत संघ का पतन होने के बाद भारत में रूसी साहित्य के प्रकाशन का काम पूरी तरह से रोक दिया गया। इस कारण भारत में रूसी साहित्य कम ही उपलब्ध है और इस वजह से उसकी लोकप्रियता भी कम हो गई है। हालाँकि उन्होंने बताया कि सोवियत काल के पुराने अनुभवों के कारण भारत में रूसी क़िताबों के प्रति बड़ी अच्छी भावना पाई जाती है। 

अनघा भट्ट का मानना है कि सामान्य रूप से रूसी साहित्य और विशेष रूप से आधुनिक रूसी साहित्य को बढ़ावा देने के लिए रूस की सरकार बहुत कुछ कर सकती है। इसके लिए रूस की सरकार को भारत में आयोजित साहित्य-उत्सवों  व साहित्यिक कार्यक्रमों में भाग लेने और भारतीय विश्वविद्यालयों में व्याख्यान देने के लिए रूसी लेखकों को यहाँ भेजना चाहिए। उन्होंने कहा — अनेक यूरोपीय देश अपने कुछ सर्वाधिक लोकप्रिय लेखकों को भारत भेजकर इस प्रकार के सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देते हैं। इससे यहाँ पर उन देशों की संस्कृति, साहित्य और भाषाओं को सचमुच बढ़ावा मिलता है।

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