रूस और भारत : सभ्यताओं की मैत्री

2017 में रूस और भारत के बीच राजनयिक सम्बन्धों की स्थापना हुए 70 वर्ष पूरे हो जाएँगे। इस जयन्ती की पूर्ववेला में रूस-भारत संवाद वेबसाइट दो देशों के बीच पारस्परिक सम्बन्धों के इतिहास के बारे में एक लेखमाला प्रस्तुत कर रही है। आज पढ़िए उस लेखमाला का पहला लेख।
Nikitin Over Three Seas
अफ़नासी निकीतिन की भारत यात्रा के बारे में बनाई गई 'परदेसी' फ़िल्म का एक दृश्य। स्रोत :RIA Novosti

भारत प्राचीनकाल से ही रूसियों का ध्यान आकर्षित करता रहा है। रूस से हज़ारों किलोमीटर दूर बसे इस देश के बारे में जानकारियाँ रूस तक दो रास्तों से पहुँचा करती थीं। ये रास्ते थे — साहित्यिक कृतियाँ और दो देशों के व्यापारियों का एक-दूसरे के यहाँ आगमन।

रूसी-भारतीय सम्बन्धों का जो सबसे पुराना स्रोत आज उपलब्ध है, वह है रूसी व्यापारी अफ़नासी निकीतिन द्वारा पन्द्रहवीं शताब्दी में लिखी गई यात्रा डायरी, जिसका शीर्षक है — तीन समुद्रों के पार की यात्रा। अफ़नासी निकीतिन ने इस डायरी में भारत की अपनी तीन वर्षीय यात्रा का वृतान्त लिखा है। यह किताब आज रूसी साहित्य में न केवल एक प्रमुख ’साहित्यिक स्मारक’ का महत्व रखती है, बल्कि यह डायरी रूसी-भारतीय रिश्तों का एक अनू ठा सबूत भी बन गई है। इस यात्रा-डायरी का अनुवाद दुनिया की अनेक भाषाओं में हो चुका है क्योंकि अफ़नासी निकीतिन वास्को दे-गामा से भी क़रीब तीस साल पहले भारत पहुँचे थे और उन्होंने ही यूरोपवासियों को भारत तक जाने का रास्ता दिखाया था। 

लेकिन अफ़नासी निकीतिन की भारत-यात्रा के बाद भी रूस और भारत के बीच आपसी सम्पर्क स्थापित होने में क़रीब दो सदियाँ लग गईं। केवल सत्रहवीं सदी के आख़िर में ही रूसी व्यापारी सिम्योन मालिन्की भारत के तत्कालीन मुगल बादशाह औरंगज़ेब के लिए रूस के ज़ार प्योतर प्रथम का एक पत्र लेकर पहुँचे थे, जिसमें बादशाह से यह अनुरोध किया गया था कि वे उन्हें भारत में रूसी माल बेचने की इजाज़त दे दें और भारतीय माल ख़रीदने दें। सन् 1696 में औरंगज़ेब ने रूसी व्यापारी सिम्योन मालिन्की से अपने दरबार में मुलाक़ात की और उन्हें बिना कोई टैक्स दिए व्यापार करने की इजाज़त दे दी। सिम्योन मालिन्की और उनके सहयोगी व्यापारी छह साल तक भारत में रहे। उन्होंने सूरत, बुरहानपुर, आगरा, दिल्ली और भारत के दूसरे नगरों की यात्रा की और मूल्यवान भारतीय वस्तुएँ ख़रीदकर मस्क्वा (मास्को) वापिस लौट आए। 

इस व्यापारिक अभियान की सफलता ने रूसी-भारतीय व्यापारिक सम्पर्कों को और ज़्यादा व्यापक किया। जल्दी ही रूस के अस्त्राख़न नगर में क़रीब 200 भारतीय व्यापारी आकर बस गए और भारत से अपना सामान लाकर रूस में बेचने लगे।

सन् 1722  में रूस के ज़ार प्योतर प्रथम अस्त्राख़न आए और उन्होंने अस्त्राख़न में रह रहे भारतीय आप्रवासी व्यापारियों के प्रमुख अन्बू राम से मुलाक़ात की। अन्बू राम ने रूस के ज़ार से अनुरोध किया कि भारतीय व्यापारी चीन और पश्चिमी यूरोप के साथ भी व्यापार करना चाहते हैं और उन्हें इस बात की इजाज़त दी जाए कि वे भारत से चीन और पश्चिमी यूरोप तक माल ले जाने के लिए रूस का इस्तेमाल एक पारगमन पड़ाव के रूप में कर सकें। रूस के ज़ार ने उन्हें ऐसा करने की इजाज़त दे दी। इसके बाद भारतीय व्यापारी अक्सर मस्क्वा (मास्को) और साँक्त पितेरबुर्ग (सेण्ट पीटर्सबर्ग) की सड़कों पर घूमते दिखाई देने लगे। वे अपना माल लेकर तब रूस के नीझ्नी नोवगरद में लगने वाली सबसे बड़ी मकरेव्स्की हाट में भी पहुँचने लगे। यहाँ तक कि भारतीय व्यापारी रूस के धुर उत्तर में बसे अर्ख़ंगेल्स्क नगर में भी जा बसे।

18 वीं सदी में रूसी समाचार-पत्रों में भारत का नाम अक्सर दिखाई पड़ता था। यह और बात है कि भारत से जुड़ी सभी ख़बरें तब पश्चिमी स्रोतों से रूस पहुँचा करती थीं। जब ब्रिटेन ने भारत पर अधिकार कर लिया तो रूसियों की दिलचस्पी भारत में बहुत ज़्यादा बढ़ गई। रूसी पत्र-पत्रिकाओं में उन दिनों अक्सर ऐसे लेख देखने को मिलते थे, जिनमें भारत की जनता के साथ सहानुभूति जतलाई जाती थी। उदाहरण के लिए, ’यूरोप की ख़बरें’ नामक एक पत्रिका में उन दिनों अक्सर इस तरह के लेख छपा करते थे कि इंगलैण्ड की नीतियाँ दोहरी क्यों होती हैं? इंगलैण्ड यूरोप में जिसे लूट मानता है, भारत में उसे अपना अधिकार क्यों समझता है? यूरोप में इंगलैण्ड वैध शासन की वकालत करता है और भारत में वैध शासकों को उखाड़ फेंकता है ताकि वह ख़ुद ताक़तवर बना रहे।

रूस में ब्रिटेन विरोधी भावनाएँ इतनी ज़्यादा बढ़ गई थीं कि रूसियों ने फ़्राँस के साथ मिलकर भारत को ब्रिटेन के पंजे से छुड़ाने के लिए भारत पर हमला करने की योजना भी बना ली थी। सबसे पहले फ़्राँस के सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट ने 1797 में भारत पर हमला करने की योजना बनाई थी और जल्दी ही उन्होंने रूस के ज़ार पाविल प्रथम को भी अपनी इस योजना में शामिल कर लिया था।

लेकिन साँक्त पितेरबुर्ग में रह रहे ब्रिटेन के राजदूत ने एक षड़यन्त्र करके रूस के ज़ार की हत्या करवा दी, इसलिए रूसी सेना का भारत अभियान शुरू नहीं हो पाया। इतिहासकार इस घटना को ’ वो बड़ा खेल’ कहकर याद करते हैं, जिसमें मध्य एशिया पर अपना प्रभाव जमाने के लिए रूस और ब्रिटेन के बीच खींचतान हुई थी। 

सन् 1830 में लार्ड पालमेर्स्टन ब्रिटेन के विदेशमन्त्री बने। उन्हें यह विश्वास था कि अगर रूस का असर मध्य एशियाई देशों में बढ़ेगा तो भारत में भी जन-विद्रोह की कोशिशें बढ़ती चली जाएँगी।

लार्ड पालमेर्स्टन का ऐसा सोचना निराधार नहीं था, क्योंकि रूसी पत्र-पत्रिकाओं में तब अक्सर इस तरह के लेख छपने लगे थे कि ब्रिटेन भारत को लूट-खसोट रहा है। तब रूस की एक सबसे प्रभावशाली पत्रिका थी  — ’जन्मभूमि सन्देश’ (अतेचिस्तविन्निए ज़ापिस्की)। 1844 में इस पत्रिका में रूसी विश्व-यात्री अलिक्सान्दर रोतचिफ़ का एक लेख छपा, जिसमें उन्होंने लिखा था — मैं भारत की ग़रीबी देखकर दंग रह गया। इस देश की तीन-चौथाई जनता बेहद ग़रीबी में जीवन जी रही थी। इस तरह के लेखों की बदौलत रूसी लोग यह जानते थे कि अँग्रेज़ भारत को नोच-खसोट रहे हैं और उन्होंने भारत को एक ’बन्धुआ मज़दूर’ बना रखा है।

भारत में 1857 में हुई क्रान्ति और अँग्रेज़ों द्वारा उसका क्रूरतापूर्वक किया गया दमन भी रूसी लोगों की निगाह से न बच पाया। रूसी जनता भारतीय जनता के साथ गहरी सहानुभूति रखने लगी थी। रूस भारत में अपना राजनयिक दूतावास खोलना चाहता था। रूस ने इसके लिए बहुत कोशिशें भी कीं। लेकिन भारत के तत्कालीन अँग्रेज़ शासकों ने तरह-तरह के बहाने बनाकर इसमें रोड़े अटकाए। परन्तु फिर भी सन् 1900 में मुम्बई में रूसी दूतावास आख़िर खुल ही गया। 

1905 और 1917 में रूस में हुई क्रान्तियों की बदौलत रूस और भारत की जनता के बीच गहरी आत्मीयता स्थापित हो गई। इन रूसी क्रान्तियों ने भारत के राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन को गहराई से प्रभावित किया और आन्दोलन को सक्रिय बनाए रखने के लिए प्रेरित किया।

रूसी-भारतीय सम्बन्धों का यह सदियों पुराना इतिहास इस बात का सबूत है कि इन दो देशों के बीच रिश्ते सिर्फ़ सरकारी स्तर पर ही नहीं हैं। दोनों देशों की जनता के बीच भी हार्दिक सम्बन्ध हैं और गहरी सद्भावना है। ये दोनों महान् सभ्यताएँ एक-दूसरे के प्रति गहरा आकर्षण रखती हैं और इस आकर्षण पर ही हमारी आज की दुनिया में बहुत-कुछ निर्भर करता है।

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