कश्मीर पर सौवाँ वीटो लगाकर रूस ने पश्चिम की हवा निकाल दी थी

शीत युद्ध के दौरान रूस ने कई बार सँयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर वीटो लगाकर भारत को फ़ज़ीहत से बचाया था, हालाँकि लगातार ताक़तवर हो रहे भारत को अब उस तरह के सहयोग की ज़रूरत नहीं रही।
Indian officers in Kashmir
कश्मीर में भारतीय सैनिक, 1962। स्रोत :Getty Images

सँयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस ने सौवाँ वीटो कश्मीर के सवाल पर भारत के समर्थन में लगाया था।  22 जून 1962 को रूस ने आयरलैण्ड के प्रस्ताव पर वीटो लगाकर कश्मीर को भारत से छीनकर पाकिस्तान के हवाले करने के पश्चिमी देशों के मंसूबों को ध्वस्त कर दिया था।

पश्चिमी गुट इस बात से खार खाने लगा क्योंकि दिसम्बर 1961 में भी रूस ने भारत के ही पक्ष में 99वाँ वीटो लगाया था। उस समय हुआ यह था कि जब भारत ने गोवा को आज़ाद कराने के लिए पुर्तगालियों पर चढ़ाई की, तो सुरक्षा परिषद में युद्धविराम का प्रस्ताव लाया गया। रूस ने इस प्रस्ताव को वीटो कर दिया। इस वजह से पश्चिमी गुट की मनोदशा उस समय बिल्कुल भारत विरोधी हो गई थी। पश्चिमी मीडिया में रूस को सँयुक्त राष्ट्र के कामकाज में हर समय रोड़ा अटकाने वाले देश के तौर पर दिखाया जाता था।

आयरलैण्ड द्वारा सँयुक्त राष्ट्र संघ में पेश किए गए प्रस्ताव में भारत और पाकिस्तान को कश्मीर विवाद के निपटारे के लिए सीधी बातचीत शुरू करने की सलाह दी गई थी। इस प्रस्ताव को सुरक्षा परिषद के 7 सदस्यों का समर्थन प्राप्त था। इन सात देशों में सुरक्षा परिषद के चार स्थाई सदस्य – अमरीका, फ़्राँस, ब्रिटेन और चीन (तब चीन का प्रतिनिधित्व ताईवान करता था) –और तीन अस्थायी सदस्य आयरलैण्ड, चिली तथा वेनेजुएला शामिल थे।

भारतीय प्रतिनिधिमण्डल ने आयरलैण्ड के इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। उसके बाद सँयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस के प्रतिनिधि प्लातोन मरोज़फ़ ने तेज़ आवाज़ में ’नहीं’ कहा। रूस के सहयोगी देश रोमानिया ने प्रस्ताव का विरोध किया, जबकि घाना और मिस्र तटस्थ रहे।

सँ० रा० सुरक्षा परिषद में अमरीका के प्रतिनिधि एडलाय स्टीवेन्सन ने रूस के इस क़दम की निन्दा की और कहा कि रूस सँयुक्त राष्ट्र संघ को  ’पंगु बनाने का काम कर’ रहा है। मरोज़फ़ ने जोरदार तरीके से उन्हें तीन बार टोका। मरोज़फ़ ने कहा  —  शीत युद्ध की पैंतरेबाजी का यह सबसे घटिया उदाहरण है। वीटो का इस्तेमाल कोई ख़राब चीज़ नहीं है। इससे कुछ देश अपनी हद के भीतर रहते हैं और जब वे ख़ास अमरीकी तौर-तरीके से कोई क़दम उठाते हैं, तो उन्हें अपने पैर वापस खींचने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

अटल रुख

रूस ने कश्मीर मामले में हमेशा भारत का साथ दिया है। विदेशी मामलों के विश्लेषक सी० राजामोहन ने बताया — पिछली सदी के छठे दशक में ब्रिटेन और अमरीका इस मुद्दे को लेकर पाकिस्तान के पक्ष में पैंतरेबाजी कर रहे थे। ऐसी हालत में सोवियत संघ का झुकाव भारत की ओर होने से भारत में स्वाभाविक रूप से रूस के पक्ष में एक सकारात्मक माहौल बना।

सी० राजामोहन ने कहा — 1955 में रूसी नेता ख्रुषोफ़ और बुल्गानिन भारत के दौरे पर आए थे। इससे रूस और भारत के बीच मजबूत सहयोग की बुनियाद पड़ी। दोनों सोवियत नेताओं ने श्रीनगर की यात्रा की। श्रीनगर में आयोजित सार्वजनिक अभिनन्दन समारोह में ख्रुषोफ़ ने घोषणा की कि रूस की सीमाएँ यहाँ से बहुत दूर नहीं हैं और कश्मीर में कोई भी गड़बड़ हो, तो भारत को बस आवाज लगाने भर की ज़रूरत है और रूस उसकी सहायता करने के लिए आ जाएगा। रूस ने अपना वादा निभाया और पिछली सदी के छठे दशक में कश्मीर को लेकर ब्रिटेन तथा अमरीका द्वारा चले गए पैंतरों की काट करने के लिए सँयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो लगा दिया।

भारत का मुँहतोड़ जवाब

रूस द्वारा वीटो लगाए जाने से कश्मीर मुद्दे पर पश्चिम को मुँह की खानी पड़ी। हालाँकि सँयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के हौए से भारत का पीछा तभी छूट सका, जब उसने इस तरह के प्रस्तावों की परवाह करना छोड़कर तिरस्कार का भाव दिखाना शुरू कर दिया। पश्चिमी देश वास्तव में इसी तरह के व्यवहार के लायक थे।

आइए देखें कि सँयुक्त राष्ट्र में कश्मीर को लेकर भारत की यह नई रणनीति किस तरह विकसित हुई।

रूस द्वारा सौवाँ वीटो लगाए जाने के तीन साल बाद कश्मीर पर एक बार फिर से पूरी दुनिया का ध्यान केन्द्रित हुआ। पाकिस्तान ने युद्धविराम का उल्लंघन करते हुए भारत पर आक्रमण कर दिया। तब भारत ने भी युद्ध की घोषणा कर दी।सितम्बर 1965 में जब भारतीय सेना पाकिस्तानियों को धकियाती हुई लाहौर में घुस गई, तो पाकिस्तान के विदेश मन्त्रीज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो (जो बाद में पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री भी बने) ने सँयुक्त राष्ट्र में कश्मीर का मुद्दा उठाया। इसके जवाब में भारतीय प्रतिनिधिमण्डल सुरक्षा परिषद की बैठक का बहिष्कार करके बाहर चला गया।

इस घटना से पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई। लोगों को विश्वास ही नहीं था कि गाँधी जी के अनुयायी भी इस तरह का क़दम उठा सकते हैं। एक प्रख्यात विश्लेषक के शब्दों में कहें तो उस समय तक यही समझा जाता था कि यदि भारत के दोनों गालों पर थप्पड़ मारा जाएगा, तो भारत को यह बुरा लगेगा कि उसके पास मार खाने के लिए कोई तीसरा गाल नहीं है।

भारत के पूर्व विदेश मन्त्री कुँवर नटवर सिंह उस समय सँयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में तैनात थे। उन्होंने कहा किभारत का यह बहिर्गमन सँयुक्त राष्ट्र में कश्मीर को लेकर एक ’क्रान्तिकारी बदलाव’ था।

अँग्रेज़ी समाचारपत्र ’हिन्दू’ से बात करते हुए उन्होंने कहा — इसका परिणाम यह हुआ कि 1971 के युद्ध के बाद लाए गए एक प्रस्ताव को यदि छोड़ दें, तो सँयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आगामी कई दशकों तक कश्मीर के बारे में शायद ही कभी कोई बात हुई हो। पाकिस्तान ने अनेक बार प्रस्ताव लाने की कोशिश की, लेकिन सोवियत संघ ने हर बार वीटो लगा दिया। 1972 के शिमला समझौते, जिसमें भारत और पाकिस्तान ने द्विपक्षीय समाधान के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की थी, के बाद से तो सँयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर सम्बन्धी चर्चाओं पर पूरी तरह से विराम लग गया।’

आँकड़े भी नटवर सिंह के इस दावे की पुष्टि करते हैं। 1948 से लेकर 1965 के बीच सुरक्षा परिषद ने कश्मीर को लेकर 23प्रस्ताव पारित किए। 1965 में भारत द्वारा बहिर्गमन किए जाने के बाद से सँयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सिर्फ़ एक ही प्रस्ताव पारित किया है। 21 दिसम्बर 1971 के इस प्रस्ताव संख्या 307 में भारत और पाकिस्तान से बांग्लादेश युद्ध के बाद की’युद्धविराम रेखा का सम्मान करने’ की बात कही गई है।

नटवर सिंह गाँधी परिवार के वफ़ादार रहे हैं। उनके अनुसार, प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने 1948 में कश्मीर मुद्दे को सँयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ले जाने की जो ’बेवकूफ़ी’ की थी, उसके दुष्प्रभावों को दूर करने में भारतीय राजनयिकों को कई साल लग गए। पूर्व विदेश मन्त्री नटवर सिंह का मानना है कि भारत को पाकिस्तान की बातों का जवाब देने के लिए कोई कनिष्ठ अधिकारी भेजना चाहिए क्योंकि पाकिस्तान इसी व्यवहार के लायक है। उन्होंने कहा — सँयुक्त राष्ट्र महासभा में जब हमारे प्रधानमन्त्री पाकिस्तानी प्रधानमन्त्री की बात का जवाब देते हैं, तो उन्हें अपार ख़ुशी मिलती है। पिछले दो सालों के दौरान हमारे प्रधानमन्त्रियों ने यही काम किया है।

लेकिन अब लगता है कि भारत ने नटवर सिंह की इस सलाह को काफी गम्भीरता से लिया है। सितम्बर 2016 में जब पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री नवाज़ शरीफ़ ने कश्मीर पर भाषण दिया, तो भारत की ओर से उसका जवाब कनिष्ठ राजनयिक ईनम गम्भीर ने दिया। शरीफ़ के भाषण को ’विष-वमन’ बताते हुए उन्होंने पाकिस्तान को ’आतंकवाद की नर्सरी’ की संज्ञा दी।अन्तरराष्ट्रीय मीडिया ने भी इसमें ख़ूब रस लिया।

भारत को अब रूसी सहारे की ज़रूरत नहीं रही

शीत युद्ध अब सचमुच एक इतिहास बन चुका है। लगातार नए समीकरण बन रहे हैं और सारे विरोधाभासों के बावजूद कल तक एक-दूसरे के दुश्मन रहे देश आज आतंकवाद के विरुद्ध कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ रहे हैं।

चूँकि अमरीका पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य व आर्थिक सहायता में कटौती कर रहा है,  इसलिए पाकिस्तानी जनरल रूस के साथ सम्बन्ध सुधारना चाहते हैं। सबको पता है कि पाकिस्तान में नीतियों को बनाने और लागू करने का काम वास्तव में पाकिस्तानी सेना ही करती है। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति रणनीतिक रूप से बड़ी महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान से होकर रेशमी मार्ग गुज़रता है और उससे पश्चिम एशिया और मध्य एशिया तक आसानी से पहुँचा जा सकता है। इस कारण दुनिया की प्रमुख ताक़तों की पाकिस्तान में दिलचस्पी बढ़ रही है। रूस भी इस मामले में अन्य देशों से अलग नहीं है। रूसी सत्ता केन्द्र के भीतर जरूर ऐसे कुछ लोग हो सकते हैं, जिन्हें लगता होगा कि पाकिस्तान के साथ सामान्य सम्बन्ध बनाने में कोई नुक़सान नहीं है। हालाँकि इस तरह से सोचने वाले रूसी राजनयिकों को इस बात पर भी ज़रूर विचार करना चाहिए कि क्या रूस के इस क़दम से भारत अमरीका के और क़रीब नहीं चला जाएगा।

बहरहाल, सँयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के ख़िलाफ़, बल्कि किसी भी देश के ख़िलाफ़ भारत की सबसे अच्छी रणनीति यही होगी कि वह सँयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों पर ध्यान ही न दे। भारत इस मामले में इज़राइल से काफ़ी कुछ सीख सकता है। मित्र देशों की संख्या के लिहाज से इज़राइल दुनिया के सबसे अलग-थलग पड़े देशों में से एक है। इसके साथ ही इज़राइल के ख़िलाफ़ अब तक सँयुक्त राष्ट्र में अनगिनत प्रस्ताव पारित किए गए हैं। लेकिन इज़राइल की प्रतिक्रिया बड़ी साफ़ है — वह विवादित क्षेत्रों में अपने नागरिकों को लगातार बसाता रहा है। इस तरीके के आश्चर्यजनक परिणाम भी सामने आए हैं। तभी तो आपको शायद आज यह याद भी न होगा कि सँयुक्त राष्ट्र में इजराइल के खिलाफ पिछला प्रस्ताव कब लाया गया था?

एक परिपक्व वैश्विक शक्ति के तौर पर भारत को इस तरह की छोटी-मोटी बातों पर ध्यान न देने की आदत डालनी होगी। वैसे भी भौगोलिक विवादों के मामले में उसी का सिक्का चलता है, जो उस भौगोलिक क्षेत्र पर काबिज़ हो। लद्दाख तथा जम्मू के अलावा कश्मीर का सर्वोत्तम व सबसे बड़ा हिस्सा भारत के पास है। भारत को अब कश्मीर के मामले में रूसी सहारे की ज़रूरत नहीं रह गई है और उसे रूस से सहारे की अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए। महाशक्ति बनने की इस यात्रा में भारत को अकेले अपने दम पर फ़ैसले लेने तथा उन्हें क्रियान्वित करने की इच्छाशक्ति पैदा करनी चाहिए।

 

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