स्तालिन का अपना निजी टोनहा या जादूगर

वोल्फ़ मेस्सिंग को कई चमत्कारी शक्तियों से युक्त माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि वे स्तालिन के लिए काम करते थे।
Hingga hari ini, misteri Messing tetap tidak terpecahkan. Foto: Reznikov/RIA Novosti
वोल्फ़ मेस्सिंग। स्रोत :Reznikov/RIA Novosti

वोल्फ़ मेस्सिंग (1899-1974)  का व्यक्तित्व बेहद रहस्यपूर्ण था। वे जादूगर थे, लोगों पर अपना वशीकरण चलाकर उन्हें बस में कर लेते थे, टोने-टोटके करने वाले टोनहा थे और लोगों को सम्मोहित (हिप्नोटाइज) करना जानते थे। हिटलर भी वोल्फ़ मेस्सिंग से डरता था। स्तालिन और बेरिया मेस्सिंग के बातें बड़े ध्यान से सुना करते थे। लेकिन कोई नहीं जानता कि सच्चाई क्या है। जब भी मेस्सिंग की बात चलती है तो जनता के बीच प्रचलित उनकी कहानियों से उन्हें अलग नहीं किया जा सकता है।

वोल्फ़ मेस्सिंग का जन्म पोलैण्ड के उस भूभाग में स्थित एक यहूदी बस्ती में हुआ था, जो रूसी साम्राज्य का हिस्सा था। मेस्सिंग के माता-पिता चाहते थे कि वे यहूदी इमाम या यहूदी रब्बी बनें, इसलिए उनकी शिक्षा-दीक्षा  यहूदी धार्मिक मदरसे में कराई गई। लेकिन वोल्फ़ मेस्सिंग को धर्म रास नहीं आता था।

उनका सोचना था कि उनके जीवन का उद्देश्य कुछ दूसरा ही है। इसलिए वे घर से भाग खड़े हुए। वे स्टेशन पहुँचे और जो रेलगाड़ी सामने खड़ी दिखाई दी, उसमें जाकर बैठ गए। रेल का टिकट ख़रीदने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे। जब टिकट चैकर टिकट चैक करने आया तो वे एक सीट के नीचे घुस गए। लेकिन टिकट चैकर की निगाह से बचना आसान नहीं था। उसने उन्हें वहाँ से निकाला और उनका गिरेबान पकड़ कर टिकट माँगने लगा। मरता क्या न करता। वोल्फ़ मेस्सिंग के हाथ में एक पुराना अख़बार था। उन्होंने वह अख़बार ही टिकट चैकर की ओर बढ़ा दिया। चैकर ने उसे पंच कर दिया और बोला —  बड़े सनकी हो। टिकट है, फिर क्यों छुप रहे हो। तब वोल्फ़ मेस्सिंग को पहली बार यह अहसास हुआ कि उनके पास ऐसी ताक़त है कि वे लोगों को  अपनी इच्छा से नियन्त्रित और संचालित कर सकते हैं।

वह रेलगाड़ी बर्लिन जाती थी। इस तरह वोल्फ़ मेस्सिंग बर्लिन पहुँच गए। बर्लिन में शुरू में उन्हें कोई काम नहीं मिला। उन्होंने होटलों में बर्तन धोए, लोगों के जूते साफ़ किए या फिर भूखों मरते रहे। कई बार तो वे भूख के कारण बेहोश भी हो जाते थे। इसके बाद वे एक सरकस में काम करने लगे। सर्कस में वे अनेक चौंकाने वाले खेल दिखाते थे। इस वजह से दर्शकों के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी।

मेस्सिंग किसी भी छुपाई हुई चीज़ को ढूँढ़ निकालते थे। वे लोगों के मन की बात पढ़ लेते थे। भविष्य में क्या होने वाला है, वे यह भी बता देते थे और किसी भी आदमी से अपना मनचाहा काम करा लेते थे। ये सारे काम वे सचमुच में कर सकते थे। इसके लिए उन्हें किसी सहायक की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। वे कोई जादू नहीं दिखाते थे, बल्कि  सचमुच में जादू करते थे और भविष्य में क्या होने वाला है, यह बता देते थे।

एक बार यह सर्कस घूमते-घामते वियना पहुँचा। वहाँ दो वैज्ञानिक-विद्वानों — सिगमण्ड फ्रायड और अल्बर्ट आइंस्टीन ने जब वोल्फ़ मेस्सिंग की इस महारत के बारे में पता लगा कि वे भविष्य बता देते हैं, तो दोनों ने मेस्सिंग के इस चमत्कार का अध्ययन और अनुसन्धान करना चाहा। इसके बाद तीनों की मुलाक़ात हुई। उस मुलाक़ात में वोल्फ़ मेस्सिंग ने फ़्रायड से कहा — आप कुछ भी सोचिए, मैं आपकी इच्छा पूरी कर दूँगा। उसके बाद मेस्सिंग अल्बर्ट आइंस्टीन के पास पहुँचे और उन्होंने आइंस्टीन की मूँछ के तीन बाल उखाड़ लिए। फिर उन्होंने फ़ायड से पूछा — आप यही चाहते थे न? फ़्रायड ने कहा — हाँ।

मेस्सिंग ने बहुत-सी यात्राएँ कीं। हर आदमी उनकी गतिविधियों में दिलचस्पी दिखाने लगता था। महात्मा गाँधी ने भी उनसे भेंट की थी और मर्लिन मुनरो ने भी। पोलैण्ड के राष्ट्रपति पिलसूदस्की ने भी उनसे मुलाक़ात की। जब जर्मनी में हिटलर सत्ता में आया तो वोल्फ़ मेस्सिंग पोलैण्ड लौट आए। पोलैण्ड में ही वारसा के एक थियेटर में उन्होंने अपनी वह प्रसिद्ध भविष्यवाणी की। वोल्फ़ मेस्सिंग ने कहा — अगर हिटलर पूरब के किसी देश के साथ लड़ाई छेड़ेगा तो उसकी मौत हो जाएगी। जब हिटलर तक यह बात पहुँची तो हिटलर बेहद नाराज़ हुआ और मेस्सिंग से चिढ़ने लगा। उसने मेस्सिंग को ज़िन्दा या मुर्दा पकड़ कर लाने वाले को दो लाख रेखमार्क इनाम में देने की घोषणा की। अब क्या था? बहुत से गिरोह मेस्सिंग के पीछे पड़े हुए थे। जब फ़ासिस्ट सेनाओं ने वारसा पर कब्ज़ा कर लिया तो गेस्टापो ने वोल्फ़ मेस्सिंग को गिरफ़्तार कर लिया। सड़क पर चलते-चलते अचानक पहरे पर खड़े कुछ सैनिकों ने उन्हें रोका :

 — तुम कौन हो?

 — मैं एक आर्टिस्ट हूँ।

 — नहीं, तुम झूठ बोल रहे हो। तुम तो मेस्सिंग हो। यहूदी जादूगर। बर्लिन को तुम्हारा बेचैनी से इन्तज़ार है। 

यह सुनने के बाद उनके जबड़े पर एक ज़ोर का घूँसा लगा। वे बेहोश हो गए। जब उन्हें होश आया तो वे एक पुलिस चौकी में थे। लेकिन सम्मोहित (हिप्नोटाइज) करने की अपनी क्षमता के बल पर वे पुलिस चौकी से सुरक्षित बाहर निकल आए। मेस्सिंग ने उस समय चौकी में उपस्थित सभी पुलिस वालों को मन ही मन यह आदेश दिया कि वे क़ैदियों की कोठरी में चले जाएँ और सभी पुलिस वाले एक-एक करके कोठरी में चले गए। ख़ुद उन्हें यह नहीं मालूम था कि उन्होंने ऐसा क्यों किया। वोल्फ़ मेस्सिंग ने उन्हें कोठरी में बन्द कर दिया और ख़ुद चौकी से निकलकर वे सोवियत संघ की सीमाओं के निकट जा पहुँचे।

सोवियत संघ में भी लोग मेस्सिंग के बारे में जानते थे। स्तालिन ने अपना विमान उन्हें लाने के लिए भेजा और उन्हें क्रेमलिन में भेजने का आदेश दिया। सोवियत खुफ़िया एजेन्सी के एजेण्ट मेस्सिंग को लेकर क्रेमलिन पहुँचे।

स्तालिन ने वोल्फ़ मेस्सिंग से कहा  — अच्छा, ज़रा दिखाइए, आप क्या चमत्कार कर सकते हैं। ऐसा कीजिए, आप कल मेरे घर आइए। आपको इसके लिए किसी पारपत्र या पास की ज़रूरत तो नहीं होगी?

अगले दिन वोल्फ़ मेस्सिंग बिना कोई पारपत्र या पास दिखाए ही, सब चौकियों से गुज़रकर स्तालिन से मिलने उनके घर पहुँच गए। स्तालिन के सुरक्षाकर्मी उन्हें देखकर उन्हें देश का ख़ुफ़ियातन्त्र मन्त्री बेरिया समझा और बिना उनके दस्तावेज़ों की जाँच किए ही उन्हें स्तालिन तक जाने दिया।

स्तालिन ने अगले दिन मेस्सिंग को और भी मुश्किल काम सौंपा। अबकी बार उन्हें सरकारी बैंक से एक लाख रूबल निकलवाकर लाने थे। बिना किसी दस्तावेज़ के उन्हें यह काम पूरा करना था। तयशुदा दिन मेस्सिंग केन्द्रीय बैंक के दरवाज़े पर पहुँचे और सीधे भीतर घुस गए। भीतर जाकर उन्होंने कैशियर को एक सादा काग़ज़ दिखाया और एक लाख रूबल देने की माँग की। कैशियर ने वह काग़ज़ देखकर उन्हें एक लाख रूबल दे दिए। वोल्फ़ मेस्सिंग ने एक लाख रूबल की गड्डियाँ अपने बैग में रखीं और क्रेमलिन पहुँच गए।

यह मालूम नहीं है कि लेखक मिख़ाइल बुल्गकोफ़ ने वोल्फ़ मेस्सिंग के बारे में सुना था या नहीं। शायद, सुना ही होगा। लेकिन मिख़ाइल बुल्गकोफ़ के उपन्यास ’मास्टर और मर्गारीता’ का एक पात्र वोलान्द भी ऐसे ही चमत्कार दिखाता है, जो मेस्सिंग दिखाया करते थे।

रूस पहुँचकर भी मेस्सिंग ने भविष्यवाणियाँ करना बन्द नहीं किया। पहले उन्होंने यह बताया कि जल्दी ही लड़ाई शुरू हो जाएगी। यहाँ तक कि उन्होंने वह सप्ताह भी बता दिया था, जब लड़ाई शुरू होगी। उन्होंने कहा था कि 1941 के जून महीने के आख़िरी दशक में युद्ध शुरू हो जाएगा। फिर युद्ध शुरू होने से पहले ही उन्होंने कहा कि वे यह देख रहे हैं कि सोवियत टैंक बर्लिन में घुस रहे हैं।

स्तालिन और वोल्फ़ मेस्सिंग के रिश्ते बड़े जटिल रिश्ते थे। निश्चय ही वोल्फ़ मेस्सिंग स्टालिन के निजी टोनहा या जादूगर नहीं थे। जबकि आम तौर पर लोग ऐसा ही मानते हैं। स्तालिन को किसी टोना-टोटका करने वाले ओझा की ज़रूरत नहीं थी। हाँ, यह बात भी सच है कि वोल्फ़ मेस्सिंग दूसरों के विचारों को पढ़ने की क्षमता रखते थे। लेकिन स्तालिन ख़ुद ही अपने संगी-साथियों के विचार जानते थे और अपने विचार स्तालिन सामने वाले से पूरी तरह छिपाकर रखते थे। इसलिए किसी टेलीपैथ या सम्वेदन-चैतन्य विशेषज्ञ की उन्हें कभी ज़रूरत महसूस नहीं हुई। स्तालिन को शायद ही यह बात पसन्द आती कि उनके आस-पास कोई ऐसा व्यक्ति रहे, जो उनके विचारों को पढ़ने में सक्षम हो। इसलिए वोल्फ़ मेस्सिंग से स्तालिन ने बस, दो-चार मुलाक़ातें ही कीं।

लेकिन इसके बावजूद वोल्फ़ मेस्सिंग ने स्तालिन को प्रभावित कर लिया था। लोग तो यह भी कहते हैं कि स्तालिन मेस्सिंग से डरा करते थे। एक जनकथा यह भी सुनने में आती है कि मेस्सिंग एक बार चुपचाप स्तालिन के घर पहुँच गए। यह मार्च 1953 की बात है। स्तालिन ने वोल्फ़ मेस्सिंग से पूछा :

— तुम दूसरों को उनका भविष्य बताते घूमते हो। क्या तुम्हें ख़ुद यह पता है कि तुम्हारी मौत कब आएगी?

— आपके बाद ही मरूँगा, साथी स्तालिन — मेस्सिंग ने कहा।

— इसका मतलब तुम यह जानते हो कि मैं कब मरूँगा?

— बहुत जल्दी।

यह सुनकर डर के मारे स्तालिन की आँखें फैल गईं। उन्होंने मुँह खोला तो पलकें भारी होने लगीं। और स्तालिन तुरन्त ही कालीन पर गिर पड़े।

शायद यह जनता के बीच फैली जनकथाओं में से ही एक जनकथा है। लेकिन यह जनकथा बड़ी ख़ूबसूरत है। एक दुष्ट राजा दयालु जादूगर के चमत्कारों से ही मर जाता है।

हालाँकि ख़ुद वोल्फ़ मेस्सिंग के जीवन में उनके चमत्कार काम नहीं आए। अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में वे बुरी तरह से बीमार रहे और मौत से बुरी तरह डरते रहे। जब उन्हें उनके घर से ऑपरेशन करने के लिए अस्पताल ले जाया जा रहा था, तो अपने चित्र को देखकर मेस्सिंग ने कहा — बस, वोल्फ़। अब तू यहाँ कभी लौटकर नहीं आएगा।

वोल्फ़ मेस्सिंग की मृत्यु हो गई। लेकिन उनके चमत्कार आज भी रहस्य के कुहासे में छुपे हुए हैं। कहा जाता है कि केजीबी के गुप्त दस्तावेज़ों में मेस्सिंग से जुड़ी फ़ाइलें आज भी रखी हुई हैं, लेकिन उनमें एक भी दस्तावेज़ ऐसा नहीं है, जिससे उनके जादू करने की क्षमता के बारे में कोई जानकारी मिलती हो।

+
फ़ेसबुक पर पसंद करें