रूसी वैज्ञानिकों ने वैदिक काल के आनुष्ठानिक पेय का रहस्य उजागर किया

यह लेख उन अन्वेषकों और पुरातत्वविदों को समर्पित है, जिन्होंने प्राचीन भारतीय पेय ‘सोम’ को बनाने के लिए प्रयुक्त वनस्पति की खोज की है।
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वैदिक काल के दो प्रमुख देवों - इन्द्र और अग्नि को भारी मात्रा में सोमपान करते हुए दिखाया जाता है। स्रोत :Sarah Welch/wikipedia.org

सुरा के इतिहास में एक अत्यधिक रहस्यमय पेय है – सोम। प्राचीन भारत में सोम का आनुष्‍ठानिक महत्व था। ऐसा माना जाता था कि सोमपान करने से अमरत्व की प्राप्ति होती है। वैदिक काल के दो प्रमुख देवों - इन्द्र और अग्नि को भारी मात्रा में सोमपान करते हुए दिखाया जाता है।

वैदिक अनुष्ठानों में साधारण मनुष्यों के भी सोमपान करने के प्रमाण मिलते हैं। 5 हज़ार वर्ष से भी अधिक समय पहले संहिताबद्ध ऋग्वेद में कहा गया है — “हमने सोमपान किया, हम अमरत्व को प्राप्त हुए, हमें प्रकाश की प्राप्ति हुई, हमें देवों की प्राप्ति हुई”। ईरानियों की भाषा में ‘स’ ध्वनि का अभाव था, तो उन्होंने पवित्र अवेस्ता में इसे ‘होम’ की संज्ञा दी है।

प्राचीन हिन्दू व पारसी लोगों के वंशज हालाँकि युगों से चले आ रहे अपने अनुष्ठानों को आज भी सम्पादित करते हैं, लेकिन सोम को किस पौधे से प्राप्त किया जाता था, इसका ज्ञान अब उन्हें नहीं रहा।

दुष्प्राप्य सोम के स्थान पर वैकल्पिक अमन प्रभावी पदार्थों का उपयोग किया जाने लगा। पिछले दो सौ वर्षों में भांग, रेबन्दचीनी, जिन्सेंग, अफ़ीम और वन चिकोरी सहित अनेक वनस्पतियों के सोम होने के दावे किए जा चुके हैं।

सोम जासूस

हालाँकि रूसी पुरातत्वविदों ने शायद इस गुत्थी को सुलझा लिया है। 2009 में ‘रूसी विज्ञान अकादमी की साइबेरियाई शाखा’ के ‘पुरातत्व व नृजाति वृत्‍त संस्थान’ से आए एक रूसी-मंगोलियाई खोजदल को मंगोलिया के जंगलों में एक गहरी क़ब्र को ख़ोदते समय बेल-बूटेदार ऊनी कपड़े मिले, जो दो हजार साल पुराने थे।

पुरातत्वविदों का काम अभी तक, भले ही, पूरा न हुआ हो, लेकिन कपड़े के इन टुकड़ों को उनकी पूर्व अवस्था में लाने पर कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जो वस्त्र उन्हें मिला है, वह गहरे लाले रंग के अनेक ऊनी कपड़ों से मिलकर बने कालीन का हिस्सा था।

 इस कपड़े को सीरिया या फ़िलिस्तीन में बुना गया था, इस पर बेल-बूटे पश्चिमोत्तर भारत में काढ़े गए थे और फिर यह मंगोलिया पहुँचा। इस तरह इस कपड़े की यात्रा काफ़ी लम्बी रही। यह खोज किसी चमत्कार से कम नहीं लगती क्योंकि ऊपरी तौर पर देखने पर ऐसा होना बिल्कुल असम्भव-सा लगता है।

रूसी विज्ञान अकादमी की साइबेरियाई शाखा की मुख्य अनुसंधानकर्ता नतालिया वीक्तरव्ना पलोस्माक ने लिखा है — 2 हजार साल बाद इस कपड़े का मिलना बिल्कुल संयोग मात्र है; इस कपड़े का अभी भी बिल्कुल ठीक अवस्था में होना काफी चमत्कारिक बात है। यह कपड़ा इतनी दूरी पर स्थित क़ब्र में कैसे पहुँचा, यह बात यदि हमेशा के लिए नहीं, तो कम से कम काफ़ी लम्बे समय तक तो जरूर रहस्य बनी रहेगी।

कपड़े पर जो बेलबूटे कढ़े हुए हैं, उसमें एक प्राचीन पारसी अनुष्ठान को दिखाया गया है। यह अनुष्ठान एक छत्रक (कुकुरमुत्ता या मशरूम) के चारों ओर किया जा रहा है। चित्र के बीच में वेदी की बाईं तरफ राजा या पुरोहित को दिखाया गया है, जो सुन्दर और बेल-बूटेदार एक लम्बा लबादा पहने हुए है। उसने अपने हाथ में छत्रक ले रखा है और उसका पूरा ध्यान उस छत्रक पर ही केन्द्रित है।

नतालिया पलोस्माक के अनुसार यह “दिव्य छत्रक” विख्यात मनःप्रभावी वनस्पति साइलोसाइब क्यूबेन्सिस से काफी मिलता-जुलता है। प्रमाणों से यह पता चलता है कि प्राचीन आनुष्ठानिक पेय सोम को स्ट्रोफारिएशी कुल के छत्रकों से तैयार किया जाता था, जिनमें साइलोसाइबिन नामक अनूठा तन्त्रिका तन्त्र उद्दीपक पदार्थ होता है।

सभी अनुसंधानकर्ता इस बात पर एकमत हैं कि प्राचीन भारत और ईरान के लोग अपने धार्मिक अनुष्ठानों में किसी मनःप्रभावी पदार्थ युक्त पेय का उपयोग किया करते थे। उनके बीच बहस सिर्फ इस बात पर है कि वह पेय कौन-सा था और सेवन करने वालों की चेतना पर उसका क्या असर पड़ता था।

कालीन-गाथा

नतालिया पलोस्माक के अनुसार, कालीन पर चित्रित किए गए आदमी या तो शक जाति के हैं या पहलव। वे जिस अनुष्ठान को सम्पादित कर रहे हैं, उससे यह संकेत मिलता है कि वे पारसी मत के किसी रूप को मानते हैं। पवित्र अग्निकुण्ड इस बात का प्रमाण है, जो ईरानियों के देवता अहुर मज़्दा का प्रतीक है। 

राजा (या पुरोहित) के हाथ में जो छत्रक है, वह अग्नि में डाली जाने वाली कोई आहुति हो सकती है या यह भी हो सकता है कि पवित्र पेय बनाने के लिए इसका उपयोग किए जाने से पहले उसे अग्नि द्वारा पवित्र किया जाता हो।

’इस बात की पूरी सम्भावना है कि यह अनुष्ठान तत्कालीन पश्चिमोत्तर भारत में किया जा रहा था। यह क्षेत्र उन दिनों भारतीय, ईरानी और यूनानी, इन तीन नृजातियों, तीन संस्कृतियों का मिलन-स्थल था। इन तीनों जातियों के अपने-अपने देवता थे और अपने देवता के साथ-साथ परकीय देवों के प्रति भी श्रद्धा रखना व पूजा-उपासना करना बिल्कुल सामान्य बात थी।’

नतालिया पलोस्माक ने आगे समझाया है — हमारे सामने यह जो अभिषेक का दृश्य है, उसकी तह तक पहुँचने के लिए हमें पूरे कपड़े पर हर जगह चित्रित की गई मधुमक्खियों और तितलियों पर ध्यान देना चाहिए। ऊपरी तौर से देखने पर तो हमें इसमें कोई विशेष बात नज़र नहीं आती। लेकिन मधुमक्खियाँ और तितलियाँ उपासना की सबसे प्राचीन प्रतीक हैं और आज चाहे उनका जो भी मतलब निकाला जाता हो, उन दिनों उनका अर्थ व महत्व आज से काफी भिन्न हुआ करता था।

मधुमक्खी मधु यानी इन्द्र, विष्णु तथा कृष्ण की प्रतीक हुआ करती थी। अथर्व वेद में आध्यात्मिक साधना और मधु निर्माण के बीच तुलना की गई है। मधु यानी शहद में सड़न रोकने का गुण होता है, इसलिए कुछ भोज्य सामग्रियों के परिरक्षण में इसका बड़ा महत्व था। उदाहरण के लिए, मेक्सिको में साइलोसाइबिन युक्त छत्रकों को परिरक्षित करने के लिए काफी लम्बे समय से मधु का उपयोग किया जाता रहा है।

तितली से दीर्घ आयु का भाव लिया जाता था। यूनानी पुराणों में तितली को आत्मा की देवी ‘साइकी’ का साक्षात रूप माना जाता था। यूनानी शब्द ‘साइकी’ आत्मा और तितली, दोनों के अर्थ में प्रयुक्त होता है। ललित कलाओं में आत्मा को प्रायः चिता से बाहर निकलती या हेड्स के पास जाती हुई तितली के रूप में चित्रित किया जाता था। यूनानी परम्परा में आत्मा के लिए प्रयुक्त शब्द का अर्थ अक्सर ’दिव्य अग्नि’ भी हुआ करता था।

नतालिया पलोस्माक ने बताया — सम्भव है कि चित्र की पृष्ठभूमि में प्रदर्शित तितलियाँ और मधुमक्खियाँ आत्माओं के लोक यानी स्वर्ग की प्रतीक हों। ऐसा विश्वास था कि पवित्र छत्रक का सेवन करने के पश्चात योद्धा पूर्वजों के लोक स्वर्ग को जाते हैं।

’अब जाकर पहेली का अर्थ स्पष्ट होता है। कीट और छत्रक के बीच बड़ा निकट सम्बन्ध है और वे पूरे परिवेश को चमत्कारिक बना देते हैं।’ ऋग्वेद के इस वचन को याद कीजिए — हमने सोमपान किया, हम अमरत्व को प्राप्त हुए, हमें प्रकाश की प्राप्ति हुई, हमें देवों की प्राप्ति हुई।

यहाँ पर हमारा ध्यान रूस की एक अन्य महान अन्वेषिका ततियाना येलिज़ारिन्कवा की भविष्यदर्शी बातों की ओर जाता है। भारतविज्ञानी व ऋग्वेद अनुवादक ततियाना येलिज़ारिन्कवा ने इस मंगोलियाई अन्वेषण से ठीक दस वर्ष पहले लिखा था — ऋग्वेद की ऋचाओं की मानें, तो सोम सिर्फ उद्दीपक ही नहीं, बल्कि विभ्रमजनक पेय था। सोम की ठीक-ठीक पहचान करना अति कठिन है क्योंकि जिन भी वनस्पतियों के सोम होने का दावा किया गया है, उनमें से कोई भी सोम के सभी गुणों पर खरी नहीं उतरती तथा ऋचाओं में वर्णित सोम के वर्णन से केवल आंशिक रूप से ही मेल खाती है। किन्तु इससे भी बड़ा कारण यह है कि ऋग्वेद की जिन ऋचाओं में सोम के पुरातन अनुष्ठान का वर्णन है, उनकी भाषा व शैली  ’भारोपीय काव्य वर्णन’ के काव्यात्मक गुणों के अनुरूप है, जो सोम को पहचानने के रास्ते में बड़ी भारी बाधा है। सोम की पहचान सम्बन्धी गुत्थी का उत्तर पाने के लिए पुरातत्वविदों को पश्चिमोत्तर भारत, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अन्वेषण करना चाहिए न कि काफी दूर स्थित मध्य एशिया में।

देवों को अमरत्व और प्राचीन भारत व ईरान के निवासियों को जीवन-रस प्रदान करने वाले पेय के रहस्य को अन्ततः सुलझा लिया गया है। अब यह देखना है कि रूसी अनुसंधानकर्ताओं ने कालीन के 2 हजार वर्ष पुराने टुकड़े से जिस पाकविधि का पता लगाया है, क्या कोई चालाक उद्यमी प्रतिलोम इंजीनियरी द्वारा उससे सोम तैयार करने का प्रयास करता है।

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