रूसी चिकित्सक ने शिवधाम का रहस्य खोलने की कोशिश की

1 मार्च 2017 अजय कमलाकरन
रूसी नगर उफ़ा के निवासी नेत्र विशेषज्ञ डॉ० एर्नस्ट मुल्दाशिफ़ ने हाल ही में यह परिकल्पना प्रस्तुत की है कि हिमालय पर्वतमाला का कैलाश पर्वत वास्तव में एक प्राचीन मानव निर्मित पिरामिड है, जो अनेक छोटे-छोटे पिरामिडों से घिरा हुआ है और गीज़ा व टिओथ्युआकान (मैक्सिको) के पिरामिडों से जुड़ा हुआ है।
कैलाश पर्वत
कैलाश पर्वत। स्रोत :Ondřej Žváček/wikipedia

हिमालय पर्वतमाला के समुद्र की सतह से 6718 मीटर ऊँचे कैलाश पर्वत को हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायी पवित्र पर्वत मानते हैं। हिन्दुओं का मानना ​​है कि विघ्न-बाधाओं और बुराइयों को नष्ट करने वाले भगवान शिव ने कैलाश पर्वत पर ही समाधि लगाई थी। तिब्बती बौद्धों का मानना ​​है कि परम आनन्द के प्रतीक बुद्ध डेमचोक (धर्मपाल) कैलाश पर्वत के अधिष्ठाता देव हैं और वे कैलाश पर्वत पर ही निवास करते हैं। जैन धर्म के अनुयायी कैलाश को अष्टापद कहते हैं। उनका मानना है कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने यहीं निर्वाण प्राप्त किया था। 

आज तक कोई मनुष्य कैलाश पर्वत पर नहीं चढ़ पाया है। जिसने भी कैलाश पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की, उसकी मृत्यु हो गई। इस बारे में तरह-तरह की बहुत-सी कथाएँ प्रचलित हैं। चीन की सरकार ने कैलाश पर्वत की धार्मिक संवेदनशीलता को देखते हुए पर्वतारोहियों पर पाबन्दी लगा रखी है और कैलाश पर पर्वतारोहण पूरी तरह से बन्द है। 

भारतीयों की तरह रूसी लोग भी पर्वतों और पहाड़ों से गहरा प्रेम करते हैं। निकलाय रेरिख ने कैलाश पर्वत के बारे में अपने विचार लिखे थे। यही नहीं उनकी एक प्रसिद्ध पेण्टिंग ’पर्वतीय राह’ कैलाश पर्वत को ही समर्पित है। 

कैलाश पर्वत से जुड़ी दन्तकथाएँ 

इस तरह की बहुत सी दन्तकथाएँ सुनने में आती हैं कि कैसे 19 वीं और 20 वीं सदी के शुरू में कुछ रूसी पर्वतारोहियों ने कैलाश पर्वत पर चढ़ने की कोशिश की थी और वे गायब हो गए थे। एक साइबेरियाई पर्वतारोही ने एक बार मुझे बताया था कि कुछ पर्वतारोही कैसे कैलाश पर्वत पर एक निश्चित बिन्दु तक पहुँचे और उसके बाद वे अचानक बूढ़े दिखाई देने लगे। उसने बताया था कि इसके एक साल बाद ही बुढ़ापे की वजह से उनकी मृत्यु हो गई। 

निकलाय रेरिख़ को यह विश्वास था कि कैलाश पर्वत के आसपास के इलाके में शम्बाला नाम का एक रहस्यमयी राज्य है। हिन्दुओं के कुछ सम्प्रदाय इस शम्बाला राज्य को कपापा के नाम से पुकारते हैं, जहाँ सिर्फ़ सिद्ध और तपस्वी ही रहते हैं। 

1999 में रूस के नेत्र रोग विशेषज्ञ एर्नस्ट मुल्दाशिफ़ ने यह तय किया कि वे कैलाश पर्वत के रहस्यों को खोलने के लिए उस इलाके में जाएँगे। उनकी पर्वतारोहण टीम में भूविज्ञान व भौतिकी के विशेषज्ञ और इतिहासकार शामिल थे। 

इस दल के सदस्यों ने कई तिब्बती लामाओं से मुलाकात की और पवित्र कैलाश पर्वत के आसपास कई महीने बिताए। 

मानव निर्मित पिरामिड? 

खोजबीन करने के बाद एर्नस्ट मुल्दाशिफ़ की टीम इस निष्कर्ष पर पहुँची कि वास्तव में कैलाश पर्वत एक विशाल मानव निर्मित पिरामिड है, जिसका निर्माण प्राचीन काल में किया गया था। उन्होंने दावा किया कि यह पिरामिड कई छोटे-छोटे पिरामिडों से घिरा हुआ है और यह पारलौकिक गतिविधियों का केन्द्र है।

'हम कहाँ से आए हैं?' नामक अपने एक व्याख्यापरक लेख में एर्नस्ट मुल्दाशिफ़ ने लिखा — रात की ख़ामोशी में पहाड़ के भीतर से एक अजीब तरह की फुसफुसाहटों की आवाज़ सुनाई देती है। एक रात अपने दोनों सहयोगियों के साथ मैंने साफ़-साफ़ पत्थरों के गिरने की आवाज़ सुनी थी और यह आवाज़ कैलाश पर्वत के पेट के भीतर से सुनाई दे रही थी। हमें ऐसा लगा कि जैसे इस पिरामिड के अन्दर कुछ लोग रहते हैं। 

अपने इसी लेख में मुल्दाशिफ़ आगे लिखते हैं — तिब्बती ग्रंथों में लिखा हुआ है कि शम्बाला एक आध्यात्मिक देश है, जो कैलाश पर्वत के उत्तर-पश्चिम में स्थित है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस विषय पर चर्चा करना मेरे लिए मुश्किल है। लेकिन मैं पूरी सकारात्मकता से यह कह सकता हूँ कि कैलाश पर्वत का इलाका सीधे-सीधे पृथ्वी के जीवन से जुड़ा हुआ है। और जब हमने 'सिद्धों और तपस्वियों के राज्य’ तथा 'पिरामिड और पत्थरों के दर्पण’ को मिलाकर एक योजनाबद्ध नक्शा बनाया तो हम यह देखकर हैरान रह गए कि वह नक़्शा जैसे डीएनए के अणु की स्थानिक संरचना का नक़्शा था।

मुम्बई में रहने वाले संस्कृत के एक विद्वान मोहन भट्ट का कहना है कि रामायण में भी कैलाश पर्वत को पिरामिड के रूप में बना एक पवित्र पर्वत बताया गया है। वहाँ वेदों का भी सन्दर्भ दिया गया हैं। प्राचीन ग्रन्थों में कैलाश पर्वत को ब्रह्माण्ड की धुरी बताया गया हैं। 

मुल्दाशिफ़ का मानना है कि पृथ्वी के प्राचीन विद्वानों ने ये पिरामिड बनाए थे। उन्हें सूक्ष्म ऊर्जा का ज्ञान था। मुल्दाशिफ़ लिखते हैं कि पहाड़ प्राचीन स्मारकीय संरचनाओं की प्रणाली का एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं, जो सीधे सीधे हमारी पृथ्वी के मुख्य केन्द्र गीज़ा और टिओथ्युआकान के पिरामिडों से जुड़े होते हैं। 

विगत के बाद, एक रूसी-अँग्रेज़ी द्विभाषी वेबसाइट ने इस सिद्धान्त की विस्तार से पड़ताल की चीनी अधिकारियों ने तुरन्त ही एर्नस्ट मुल्दाशिफ़ के दावे को खारिज कर दिया। 

तिब्बत में अपने एक साल के अभियान के बाद मुल्दाशिफ़ ने यह दावा किया कि उन्होंने एक मृत शरीर से कॉर्निया और रेटिना को निकालकर एक अन्धी औरत की आँख में उसे प्रत्यारोपित कर दिया है। और ऐसा करने से पहले उन्होंने प्रयोग के तौर पर उस आँख को रसायन में डुबो कर रखा था। लेकिन उनके इस दावे को भी ब्रिटेन के डॉक्टरों ने खारिज कर दिया। 

एर्नस्ट मुल्दाशिफ़ का जन्म 1948 में हुआ था और वे ऊफ़ा में आँखों का इलाज और प्लास्टिक सर्जरी करने वाले एक क्लीनिक के मालिक हैं। 

उपसंहार 

मैं एक नास्तिक व्यक्ति हूँ जिसे ब्रह्माण्ड के रहस्यों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। मुझे नहीं मालूम कि कैलाश पर्वत के बारे में किए गए ये दावे कितने सच हैं या कितने झूठ। हालाँकि मैं यह देखकर ख़ुश हूँ कि चीन की सरकार हिन्दुओं और बौद्धों की संवेदनाओं और भावनाओं का सम्मान करती है और वह किसी को भी वह कैलाश पर्वत पर चढ़ने की इजाज़त नहीं देगी, जिसे स्वर्ग की एक सीढ़ी के रूप में भी जाना जाता है।

अजय कमलाकरन  ’रूस-भारत संवाद’ के एशिया सम्बन्धी सलाहकार सम्पादक हैं। 

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