20 साल पहले पाकिस्तान को दहलाने वाला मिग-25 टोही विमान

1997 में भारत के एक मिग-25 टोही विमान ने एक गुप्त अभियान के तहत लगभग 65 हजार फुट की ऊँचाई पर आवाज़ की गति से कुछ कम रफ्तार पर उड़ान भरते हुए पाकिस्तानी इलाके में प्रवेश किया और इस्लामाबाद के निकट स्थित सामरिक ठिकानों की तस्वीरें लीं। फिर यह विमान भारत की ओर वापस मुड़ा, लेकिन पायलट ने पाकिस्तान से बाहर निकलते समय अपने विमान की रफ्तार बढ़ाकर आवाज़ की गति से दुगुनी कर दी, जिसके कारण ज़मीन पर उस उड़ान की भयानक आवाज़ सुनाई पड़ने लगी।
MiG-25
मिग-25 लड़ाकू विमान। स्रोत :Dmitry A. Mottl / wikipedia

मई 1997 में भारतीय वायुसेना के एक मिग-25आर टोही विमान ने टोह लेने के लिए पाकिस्तानी इलाके में काफी भीतर तक उड़ान भरी और पाकिस्तान के संवेदनशील सैन्य ठिकानों की तस्वीरें लीं। इसके बाद वापिस लौटते हुए पायलट ने विमान की रफ्तार को बढ़ाकर ध्वनि की गति से ज़्यादा कर दिया, जिसके कारण इस्लामाबाद के ऊपर विमान के उड़ान की जबरदस्त आवाज़ सुनाई देने लगी। इससे पहले कि पाकिस्तानी कुछ समझ पाते या भारतीय विमान को रोकने के लिए अपने लड़ाकू विमानों को उड़ा पाते, मिग-25 विमान भारतीय वायुसीमा में वापस आ चुका था। उल्लेखनीय है कि उत्तर अटलाण्टिक सन्धि संगठन यानी नाटो मिग-25 भेदिया विमानों को फॉक्सबैट के नाम से पुकारता है।

इस अभियान के विवरण को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, इसलिए यह बात अभी भी रहस्य बनी हुई है कि भारतीय वायुसेना के उस पायलट ने पाकिस्तान के घनी आबादी वाले भूभाग के ऊपर अपनी उपस्थिति को उजागर करने का फ़ैसला क्यों किया था। टोही और निगरानी विमानों को समर्पित वेबसाइट ‘स्पाईफ्लाइट’ के अनुमान के अनुसार मिग-25 विमान का पायलट यह दिखाना चाहता था कि पाकिस्तानी वायुसेना बहुत कमज़ोर है और वह भारत का बाल भी बाँका नहीं कर सकती है।

स्पाईफ्लाइट के अनुसार — भारतीय मिग-25 भेदिया विमान ने लगभग 65 हजार फुट की ऊँचाई पर आवाज़ की गति से कम रफ्तार पर उड़ान भरते हुए पाकिस्तानी इलाके में प्रवेश किया था। लेकिन पाकिस्तान को उसकी कुछ खबर ही नहीं लगी। फिर इस भारतीय विमान ने पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के नजदीक स्थित सामरिक ठिकानों के ऊपर उड़ान भरी और उनकी तस्वीरें लीं। फिर यह विमान वापस भारतीय वायुक्षेत्र की ओर मुड़ा।

लेकिन शायद मिग-25 विमान का चालक पाकिस्तान को उसकी औकात बताना चाहता था, इसलिए पाकिस्तानी वायुक्षेत्र से बाहर निकलते समय उसने अपने विमान की गति को बढ़ाकर ध्वनि की गति से दुगुना कर दिया, जिसके कारण तगड़ा ध्वनिक स्पन्दन उत्पन्न हुआ और ज़मीन पर विमान के उड़ने की भयानक आवाज़ सुनाई पड़ने लगी। इसके बाद भारतीय विमान को रोकने के लिए पाकिस्तानी वायुसेना के अनेक एफ-16ए लड़ाकू विमानों ने उड़ान भरी, लेकिन तब तक भारतीय विमान उनके हाथ से निकल चुका था।

पाकिस्तान के विदेश मन्त्री गौहर अयूब खान का मानना था कि मिग-25 विमान ने इस्लामाबाद के निकट स्थित सामरिक ठिकानों की तस्वीरें खींची हैं। हालाँकि भारत ने इस बात को सिरे से नकार दिया। एयर पावर इण्टरनेशनल के अनुसार पाकिस्तानी सरकार मानती थी कि भारतीय लड़ाकू विमान चालक ने जानबूझकर ध्वनि सीमा को भंग किया क्योंकि वह पाकिस्तानी वायुसेना को यह एहसास दिलाना चाहता था कि पाकिस्तानी वायुसेना के पास ऐसा कोई विमान नहीं है, जो मिग-25 टोही विमान जितनी ऊँचाई पर उड़ सके और उसके आस-पास भी फटक सके।

मिग-25 विमान 65 हजार से लेकर 90 हजार फुट तक की ऊँचाई पर आवाज़ की गति से तिगुनी यानी 3 हजार 7 सौ किलोमीटर प्रति घण्टे की रफ्तार से उड़ान भरा करते थे। पाकिस्तान के पास इतनी अधिक ऊँचाई और इतनी अधिक गति से उड़ान भरने वाला एक भी विमान नहीं था। आकाश में इतनी अधिक ऊँचाई पर उड़ान भरने वाले इन भारतीय विमानों का पता लगाना पाकिस्तानी राडारों के बस के बाहर की बात थी। भारतीय पायलट द्वारा जानबूझकर भयानक आवाज़ पैदा करने और बहुत कम ऊँचाई पर विमान को उड़ाए जाने की वजह से ही पाकिस्तानी वायुसेना को मिग-25 विमान का पता चल सका और पाकिस्तानी वायुसेना ने भारतीय विमान को रोकने के लिए सरगोधा वायुसैनिक ठिकाने से दो एफ-16ए लड़ाकू विमानों को रवाना किया।

किन्तु मिग-25 विमान का पीछा करने का कोई मतलब नहीं था। पाकिस्तानी वायुसेना के सूत्रों ने एयर पावर इण्टरनेशनल को बताया कि 65 हजार फुट की ऊँचाई पर उड़ान भरते हुए भारतीय विमान को रोकने की कोई जरूरत ही नहीं थी क्योंकि पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमान केवल 50 हजार फुट की ऊँचाई तक ही उड़ान भर सकते थे।

सीमा पार ताकझाँक

1981 से लेकर 2006 तक के 25 साल के दौर में उत्तर प्रदेश के बरेली स्थित ट्राईसोनिक्स स्क्वाड्रन के आठ मिग-25 विमान पाकिस्तान और कभी-कभार तिब्बत के ऊपर भी बेरोकटोक उड़ान भरा करते थे। इस प्रकार मिग-25 विमानों ने वहाँ की ज़मीनी स्थितियों की अनगिनत साफ़ और स्पष्ट तस्वीरें उतार ली थीं। इनमें राडार छवियाँ भी थीं। यही नहीं, इन विमानों ने पाकिस्तानी और चीनी सैन्य संचार नेटवर्कों के इलेक्ट्रानिक स्पन्दनों को भी दर्ज किया था। ये विमान हर माह औसतन 10-15 बार उड़ान भरा करते थे।

मिग-25 विमान अमरीकी बमवर्षक विमानों के खिलाफ रूस के गुप्त हथियार थे। इसलिए रूस ने वारसा सन्धि के सदस्य रहे अपने घनिष्ठतम सहयोगी देशों को भी मिग-25 विमानों की सप्लाई नहीं की थी। हालाँकि 1976 में देशद्रोही वीक्तर बिलेंका के पाला बदलकर अमरीकी गुट में चले जाने के कारण मिग-25 विमान की बहुत-सी गुप्त सूचनाएँ अमरीकियों को पता लग गई थीं। पर इसके बाद सोवियत संघ ने मिग-25 विमान का निर्यात करना शुरू कर दिया।

विमानन विशेषज्ञ शिव अरूर ने अपने एक लेख में भारत के पूर्व वायुसेनाध्यक्ष इदरीस लतीफ की इस बात को सामने रखा है — 1980 में इस बात को जानकर मेरे आश्चर्य और हर्ष की सीमा नहीं रही कि सोवियत संघ हमें, सचमुच. मिग-25 विमान देना चाहता है। मैंने प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाँधी से फोन पर बात की। उन्होंने हरी झण्डी दिखा दी और मुझसे फ़ैसला लेने को कहा। मैं भला सकारात्मक फ़ैसला कैसे नहीं लेता। आखिर मिग-25 विमान दुनिया भर का सर्वश्रेष्ठ विमान था और अब यह विमान हमें भी मिलने वाला था।

मजबूत और टिकाऊ

हालाँकि ट्राईसोनिक्स स्क्वाड्रन द्वारा ली गई तस्वीरों को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, फिर भी प्रख्यात विमानन लेखक येफ़िम गोर्डन ने बेहद उपयोगी इन जेट विमानों की गुप्त दुनिया की कुछ झलकियाँ जरूर पेश की हैं।

मिग-25 विमानों में कोई हथियार नहीं होता है। अपने ऊपर होने वाले किसी भी तरह के हमले से बचने के लिए ये विमान आवाज़ की गति से तिगुनी रफ्तार बढ़ाकर और बहुत ऊँचाई पर उड़ान भरकर ही अपनी जान बचा सकते थे। 'मिग-25 फॉक्सबैट, मिग-31 फॉक्सहाउण्ड: रूस की रक्षात्मक अग्रिम पंक्ति' नामक अपनी पुस्तक में येफ़िम गोर्डन ने लिखा है — मिग-25आरबी के टोही /आघात आदि मॉडलों के पायलट तीव्र गति, बेहद साफ़ तस्वीरें लेने की क्षमता, एक ही उड़ान में विशाल क्षेत्रों की टोह लेने की क्षमता और शत्रु की मार की चपेट में आने की कम सम्भावना जैसी बेहद उपयोगी विशेषताओं के कारण इन विमानों को खूब पसन्द किया करते थे।

मिग-25 भेदिया विमानों से हवाई अड्डे पर खड़े हुए विमानों, रेलगाड़ियों व पोतों का पता लगाया जा सकता था और पुलों, सड़कों आदि के नक़्शे भी बनाए जा सकते थे। भारतीय थलसेना को जब कभी पाकिस्तान के बख्तरबन्द हथियारों के बारे में जानकारियों की ज़रूरत होती थी, तो भारतीय वायुसेना के मिग-25 भेदिया विमान इन विशेष अभियानों के लिए उड़ान भरा करते थे। राडार द्वारा खींची गई तस्वीर की फ़िल्म को ज़मीन पर खड़ी एक सुसज्जित वैन में धोया जाता था। भारतीय वायुसेना के पूर्व विंग कमाण्डर आलोक चौहान के अनुसार —  मिग-25 भेदिया विमानों को पाकिस्तान जितने बड़े देश का नक्शा बनाने के लिए दस से भी कम उड़ानें भरने की ज़रूरत पड़ती है।

मिग-25 भेदिया विमान हर तरह के मौसम में उड़ सकते हैं और उन्हें वातानुकूलित विमानशाला में रखने की कभी ज़रूरत नहीं होती। अपनी ही श्रेणी के पश्चिमी देशों के विमानों की तुलना में मिग-25 विमानों का रखरखाव व देखरेख करना भी बेहद आसान है और उसके लिए विशेष मशीनों और इंजीनियरों की भी ज़रूरत नहींं पड़ती है।

येफ़िम गोर्डन ने आगे लिखा है — मिग-25 विमान के बारे में सबसे ज़्यादा अचरज की बात तो यह है कि ये विमान काफ़ी पारम्परिक होते हुए भी असाधारण रूप से उपयोगी हैं। यह विमान इतना सरल व सस्ता था कि इसका बड़ी विशाल संख्या में उत्पादन और निर्यात किया जा सकता था। उल्लेखनीय है कि 1991 के खाड़ी युद्ध के समय इराक ने पक्के तौर पर हवा से हवा में मार करके अमरीका के सिर्फ एक ही लड़ाकू विमान को नीचे गिराया था। रोचक बात यह है कि अमरीकी नौसेना के एफ/ए-18 हार्नेट लड़ाकू विमान को मिग-25 विमान ने ही मार गिराया था। मिग-25 टोही विमान आज भी विश्व के अनेक हिस्सों में शत्रु की ओर से बिना किसी खतरे की आशंका के काम कर सकते हैं।

मिग-25 विमान ने जेट इंजन का उपयोग करने वाले विमानों के बीच सर्वाधिक ऊँचाई पर उड़ान भरने के कीर्तिमान सहित 29 विश्व कीर्तिमान बनाए हैं। 21 अगस्त 1977 को रूस के परीक्षक विमान चालक अलिक्सान्दर फ़िदोतफ़ ने पृथ्वी से 1 लाख 23 हजार 5 सौ 23 फुट की ऊँचाई तक उड़ान भरी थी।

अवसान

जब भारत ने उच्च स्पष्टता वाले ऐसे सुदूर संवेदी कृत्रिम उपग्रह अन्तरिक्ष में छोड़े, जो सेना के ट्रकों की नम्बर प्लेट तक पढ़ने में सक्षम थे, तो शत्रु के भूभाग के ऊपर टोही विमान उड़ाने की ज़रूरत ही नहीं रह गई। मिग-25आर विमान अब शीतयुद्ध हथियार की तरह लगने लगा है।

रूस से कलपुर्जों की सप्लाई की समस्या दूसरा कारण रही। भारतीय वायुसेना के अधिकारियों का कहना है कि रूस ने मिग-25 के कलपुर्जों का निर्माण करने वाले कारख़ानों को बन्द कर दिया था। यहाँ तक कि उन्होंने मिग-25 के ब्लूप्रिण्ट यानी मूल नक़्शों को भी नष्ट कर दिया था। (यह कोई लापरवाही का मामला नहीं था; अमरीका ने भी अपने अत्यधिक गोपनीय एसआर-71 भेदिया विमान की मूल योजना को नष्ट कर दिया था।) इस कारण भारतीय वायुसेना को भारत में निर्मित मिग-25 के कलपुर्जों पर निर्भर होने के लिए बाध्य होना पड़ा, लेकिन ऐसे उच्च कार्यप्रदर्शन वाले विमानों में इस बात के भी अपने सम्भावित खतरे थे।

ट्राईसोनिक्स स्क्वाड्रन के वे अद्भुत दिन भले ही बीत गए हैं, किन्तु हमें आशा है कि भारतीय वायुसेना इन शक्तिशाली मिग विमानों और उनके बहादुर विमान चालकों के द्वारा इस्लामाबाद व तिब्बत के ऊपर भरी गई दुस्साहसिक उड़ानों की कथाओं को एक न एक दिन ज़रूर सार्वजनिक करेगी।

न्यूज़ीलैण्ड में रहने वाले राकेश कृष्णन सिंह पत्रकार व विदेशी मामलों के विश्लेषक हैं।

इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।

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