रूस-भारत रिश्तों की शुरूआत कैसे हुई थी?

13 अप्रैल को रूस और भारत अपने आपसी राजनयिक रिश्तों की शुरूआत होने की सत्तरवीं जयन्ती मनाएँगे। इस महत्वपूर्ण और गौरवशाली उपलब्धि के अवसर पर रूस-भारत संवाद ने यह तय किया है कि वह आपको यह बताए कि कैसे सोवियत संघ भारत को आज़ादी मिलने की संभावना पैदा होते ही उन कुछ देशों में से एक बन गया, जिन्होंने आज़ाद भारत को राजनयिक मान्यता देना ज़रूरी समझा था।
जवाहरलाल नेहरू और कृष्ण मेनन
पण्डित जवाहरलाल नेहरू और वेंगालिल कृष्णन कृष्ण मेनन संयुक्त राष्ट्र संघ की बैठक के दौरान। स्रोत :Global Look Press

भारत और रूस के बीच राजनयिक सम्बन्धों की कहानी दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के समय से शुरू होती है। उस समय भारत का स्वाधीनता संग्राम अपने अन्तिम चरण में था। जर्मन फ़ासीवाद के ऊपर मित्र राष्ट्रों की विजय में सोवियत संघ का काफी बड़ा योगदान होने के कारण अन्तरराष्ट्रीय परिस्थिति में भारी बदलाव आ गया था और वैश्विक मामलों में सोवियत संघ की भूमिका प्रमुख हो गई थी। इसी वजह से अँग्रेज़ी शासन से भारत की मुक्ति को भी गति मिली।

यही कारण है कि भारत ने सोवियत संघ के साथ अपने रिश्तों को हमेशा ही विशेष महत्व दिया है। 15 जून 1945 को भारत के पहले प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू जेल से छूटने के बाद दिल्ली के इम्पीरियल होटल में पत्रकारों के साथ बातचीत कर रहे थे। उन्होंने इधर-उधर देखकर पूछा कि क्या सोवियत संघ का कोई संवाददाता इस पत्रकार सम्मेलन में उपस्थित है। जब तास संवाद समिति के संवाददाता अलेग अरिस्तफ़ का नेहरू जी से परिचय कराया गया, तो उन्होंने अलेग अरिस्तफ़ को अनुरोधपूर्वक अपने साथ एक ही सोफ़े पर बैठा लिया।

नेहरू जी ने कहा — मुझे ख़ुशी है कि भारत के लिए ऐतिहासिक इस पल में सोवियत संघ का कोई पत्रकार भी हमारे बीच उपस्थित है। नेहरू जी की इस बात से यह पता चलता है कि अपनी विदेश नीति में नेहरू जी सोवियत संघ को कितना अधिक महत्व दे रहे थे। नेहरू जी को यह आशा थी कि तास के संवाददाता अलेग अरिस्तफ़ सोवियत सरकार तक उनके इस सन्देश को जरूर पहुँचा देंगे। नेहरू जी अच्छी तरह से यह जानते थे कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद सोवियत संघ एक विश्व महाशक्ति के रूप में उभरकर सामने आया है और उसके साथ राजनयिक सम्बन्ध स्थापित होने से अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के अन्य सदस्य देशों तक यह सन्देश जाएगा कि वे भी भारत की आज़ादी को मान्यता दें।

राजनयिक रिश्ते बनाने की कोशिश

सोवियत संघ से भारत को राजनयिक मान्यता दिलाने में भारत के अनुभवी राजनयिक के० पी० एस० मेनन (कुमार पद्मनाभ शिवशंकर मेनन) की भी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। उनके अनुसार — भारत को पूरी आज़ादी मिलने से पहले भारत में एक अन्तरिम सरकार बनाई गई। नेहरू जी ने इस अन्तरिम सरकार में शामिल होने के बाद जो शुरूआती क़दम उठाए, उनमें से एक था — सोवियत संघ के साथ राजनयिक सम्बन्ध स्थापित करने के तरीके खोजना। इस अन्तरिम सरकार ने तुरन्त ही विभिन्न देशों के साथ राजनयिक सम्बन्ध स्थापित करने की दिशा में प्रयास करने शुरू कर दिए थे। नेहरू जी ने अपने विश्वासपात्र सहयोगी वेंगालिल कृष्णन कृष्ण मेनन को पेरिस शान्ति सम्मेलन में भाग ले रहे सोवियत प्रतिनिधिमण्डल के प्रमुख से मिलने के लिए पेरिस भेज दिया।

नेहरू जी ने अन्तरिम सरकार के औपचारिक प्रमुख अँग्रेज़ वायसराय को भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी थी। दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद हुए शान्ति सम्मेलन में भाग लेने के लिए सोवियत संघ के विदेशमन्त्री विचिस्लाफ़ मोलतफ़ पेरिस आए हुए थे। कृष्ण मेनन ने उनसे भेंट की और नेहरू जी का पत्र उन्हें दिया। उस पत्र में नेहरू जी ने सोवियत संघ के साथ राजनयिक सम्बन्ध स्थापित करने की इच्छा व्यक्त की थी। पत्र में लिखा था — हम सच्चे दिल से सोवियत संघ के साथ दोस्ती के रिश्ते बनाना चाहते हैं। हम आपके देश के साथ राजनयिकों तथा अन्य प्रतिनिधियों का आदान-प्रदान करना चाहते हैं। हमें आशा है कि भारत तथा रूस के बीच आपसी सहयोग से न केवल दोनों देशों को लाभ होगा, बल्कि इससे सारी दुनिया में शान्ति और प्रगति को भी बढ़ावा मिलेगा।

दोनों पक्षों ने कहा कि वे भारत और सोवियत संघ के बीच राजनयिक रिश्ते बनाने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं। और दोनों ही पक्षों ने इस सिलसिले में बातचीत को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया। सोवियत संघ की सरकार ने अक्टूबर 1946 के शुरू में नेहरू जी के पत्र का जवाब भेजा, जिसमें कहा गया था कि सोवियत संघ भी भारत के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बढ़ाने के लिए तैयार है।

के० पी० एस० मेनन उस समय सँयुक्त राष्ट्र महासभा में भारतीय प्रतिनिधिमण्डल के सदस्य के रूप में न्यूयार्क में मौजूद थे। सोवियत संघ के विदेशमन्त्री विचिस्लाफ़ मोलतफ़ भी उन दिनों वहीं पर थे। मेनन को यह निर्देश मिला कि वे दोनों देशों के बीच राजनयिक शिष्टमण्डलों के आदान-प्रदान के सिलसिले में विचिस्लाफ़ मोलतफ़ के साथ आगे बातचीत करें। नवम्बर 1946 में नेहरू जी ने भारतीय संविधान सभा में घोषणा की — विचिस्लाफ़ मोलतफ़ ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि सोवियत सरकार भारत के साथ राजनयिक शिष्टमण्डलों का आदान-प्रदान करना चाहती है।

अँग्रेज़ डरे हुए थे 

अँग्रेज़ सरकार भारत की अन्तरिम सरकार तथा सोवियत संघ के बीच राजनयिक सम्बन्ध स्थापित होने से डरी हुई थी। ऐसा न होने देने या कम से कम इस प्रक्रिया को अधिक से अधिक समय तक टालने के लिए अँग्रेज़ों ने हर सम्भव कोशिश की।

अभिलेखागारों में उपस्थित दस्तावेज़ इस बात की पुष्टि करते हैं कि कृष्ण मेनन और के० पी० एस० मेनन की गतिविधियों पर अंग्रेज़ों का गुप्तचर विभाग कड़ी निगरानी रखे हुए था। यहाँ तक कि पण्डित नेहरू के साथ हुए उनके पत्राचार में भी बाधा पहुँचाई जाती थी।

के० पी० एस० मेनन की प्रस्तावित मस्कवा (मास्को) यात्रा के सिलसिले में ब्रिटेन के विदेश मन्त्रालय ने मस्कवा स्थित अपने राजदूत को यह निर्देश भेजा कि वे भारत व रूस के बीच राजनयिक सम्बन्धों की स्थापना में रुकावट पैदा करने के लिए क़दम उठाएँ। इस गुप्त सन्देश में कहा गया था — भारत सरकार ऐसे संकेत दे रही है कि वह सोवियत संघ के साथ राजनयिक रिश्ते बनाना चाहती है। जब तक भारत की आन्तरिक स्थिति साफ नहीं हो जाती, तब तक हमें यही कोशिश करनी है कि भारत और रूस के बीच राजनयिक रिश्ते बनने की प्रक्रिया में ज़्यादा से ज़्यादा देरी हो।

रूस से राजनयिक रिश्ते बने

ऐसे अनेक आयोजन व कार्यक्रम रहे, जिनके कारण भारत और सोवियत संघ के बीच निकट सम्पर्क तथा फलप्रद सहयोग को बल मिला और आखिरकार अप्रैल 1947 में दो देशों के बीच राजनयिक रिश्ते बन गए। भारत तथा सोवियत संघ को और निकट लाने में संयुक्त राष्ट्र संघ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संयुक्त राष्ट्र के भीतर ज़्यादातर मुद्दों पर भारत और सोवियत संघ के बीच सार्थक सहयोग देखने को मिला। अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर भारतीय और सोवियत प्रतिनिधिमण्डलों की राय एक समान थी। इसके अलावा सोवियत प्रतिनिधिमण्डल ने बहस के दौरान भारत को तुरन्त आज़ादी देने पर भी ज़ोर दिया।

भारत के साथ राजनयिक सम्बन्ध स्थापित करने की औपचारिक प्रक्रिया को सोवियत सरकार ने अपनी ओर से सरल बनाने की भरपूर कोशिश की। दोनों पक्षों ने इस बात को लेकर सहमति दी कि दोनों देशों के बीच राजनयिक प्रतिनिधियों के आदान-प्रदान सम्बन्धी समझौते पर जल्दी से जल्दी अमल करने के लिए वे एक-साथ सार्वजनिक वक्तव्य जारी करेंगे। आख़िरकार 14 अप्रैल को दोनों देशों ने सँयुक्त विज्ञप्ति जारी करके औपचारिक रूप से राजनयिक सम्बन्ध स्थापित कर लिए।

इस विज्ञप्ति में कहा गया था — भारत और सोवियत संघ के बीच मौजूदा मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों के संरक्षण तथा उन्हें और मजबूत करने के लिए भारत सरकार और सोवियत संघ की सरकार ने राजनयिक शिष्टमण्डलों के आदान-प्रदान का निर्णय लिया है। दोनों देश एक दूसरे के देश में अपना-अपना दूतावास खोलेंगे। भारत को सोवियत संघ की ओर से राजनयिक मान्यता मिलने का बहुत अधिक महत्व था क्योंकि इस बात का मतलब यह था कि अगस्त 1947 में औपचारिक रूप से आज़ाद होने से पहले ही भारत की आज़ादी को सोवियत संघ ने मान्यता दे दी है। इस तरह आज़ाद भारत को राजनयिक मान्यता देने वाले सबसे पहले कुछ देशों में सोवियत संघ का नाम भी शामिल हो गया।

आज़ाद भारत का पहला दूतावास 

नेहरू जी ने इस बात पर जोर दिया कि भारत की आज़ादी की औपचारिक घोषणा होने से पहले ही मस्कवा में भारतीय दूतावास खुल जाना चाहिए। इस सिलसिले में वे अँग्रेज़ वायसराय की सहमति पाने में सफल रहे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि नेहरू जी ने सोवियत संघ में स्वतन्त्र भारत की प्रथम राजदूत के रूप में अपनी बहन व भारत की अनुभवी राजनयिक विजयलक्ष्मी पण्डित को भेजा था।

विजयलक्ष्मी पण्डित। स्रोत : Wikipediaविजयलक्ष्मी पण्डित। स्रोत : Wikipedia

जिन राजनयिकों को मस्कवा में भारतीय दूतावास स्थापित करने का काम सौंपा गया था, उनसे बात करते हुए नेहरू जी ने कहा था — आप एक मित्र देश में जा रहे हैं, जिससे हम लोगों को अँग्रेज़ों ने बलपूर्वक दूर रखा था। इस बीच हमारे बीच जो खालीपन आ गया है, हमें उसकी भी भरपाई करनी है। सोवियत संघ हमारा पड़ोसी देश है तथा हमारी अनेक बातें मिलती-जुलती हैं। इसलिए हमें सोवियत संघ के साथ अपने रिश्तों को मजबूत बनाना है। सोवियत संघ तथा हमारे हितों के बीच न तो कोई टकराव है और न ही कभी कोई टकराव होना चाहिए।

विजयलक्ष्मी पण्डित भारत की आज़ादी का ऐलान होने से एक हफ़्ते पहले यानी 9 अगस्त 1947 को मस्कवा पहुँचीं। उनका वहाँ पर जोरदार स्वागत हुआ। मस्कवा स्थित भारतीय दूतावास भारत की अन्तरिम सरकार का पहला राजनयिक दूतावास था। हालाँकि अमरीका और चीन में इससे पहले से ही भारतीय दूतावास काम कर रहे थे, लेकिन उनकी स्थापना अँग्रेज़ सरकार ने की थी और उन्हें ही बाद में आज़ाद भारत के दूतावास माना जाने लगा। मस्कवा में खुले नए दूतावास को ही वास्तव में आज़ाद भारत का पहला राजनयिक दूतावास होने का गौरव प्राप्त हुआ। राजनयिक सम्बन्ध स्थापित होने से इन दो महान सभ्यताओं व राष्ट्रों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों के इतिहास में निःसन्देह एक नए युग की शुरूआत हुई, जिससे आने वाले दशकों में उनके आपसी सहयोग की बदौलत नई ऐतिहासिक ऊँचाइओं तक जाने का रास्ता खुला।

यह लेख पहली बार 2011 में रूस-भारत संवाद की अँग्रेज़ी वेबसाइट पर प्रकाशित हुआ था।

इस लेख का सर्वाधिकार ’रस्सीस्कया गज़्येता’ के पास सुरक्षित है।

+
फ़ेसबुक पर पसंद करें