निजी क्षेत्र की भागीदारी से भारत-रूस व्यापार का विकास तेज़ होगा

1 मार्च 2017 अजय कमलाकरन
भारत में रूस के निजी निवेशकों के काम-धन्धों का विकास या हिमालय हर्बल्स और माइक्रोमैक्स जैसी कम्पनियों की रूस में सक्रियता इस बात का सबूत है कि दो देशों के बीच आपसी व्यापार सफलता के साथ तभी विकसित हो सकता है, जब निजी क्षेत्र को भी उसमें शामिल करके प्रोत्साहित किया जाए।
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स्मार्टफोन बनाने वाली भारतीय कम्पनी ’माइक्रोमैक्स’ के 5 बड़े ब्राण्ड रूसी मोबाइल टेलिफ़ोन उपभोकताओं के बीच धीरे-धीरे लोकप्रिय होते जा रहे हैं। स्रोत :Getty Images

भारत और रूस के बीच वार्षिक दुपक्षीय व्यापार आजकल क़रीब 7 अरब डॉलर के आसपास है। सन 2012 में हमारे दो देशों के बीच सर्वाधिक 11 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था, जबकि उसके बाद बीते सालों में हमारे आपसी व्यापार में कमी आई है। अपने दूसरे व्यापार सहयोगियों के साथ रूस इससे कई गुना ज़्यादा व्यापार करता है। मसलन चीन के साथ भी रूस ने 2014 में 100 अरब डॉलर का व्यापार किया था। पिछले वर्षों में चीन के साथ भी व्यापार में 30 प्रतिशत की कमी हुई है। उन दूसरे व्यापार सहयोगियों के साथ भी रूस का व्यापार कम हो गया है, जो रूस पर अमरीका द्वारा लगाए गए प्रतिबन्धों का समर्थन नहीं करते।  

कुछ तथाकथित विशेषज्ञों और सेवानिवृत्त कूटनीतिज्ञों ने रूस और भारत के बीच दुपक्षीय व्यापार घटने के लिए दो देशों की सरकारों को दोषी ठहराया है। उनका कहना है कि हमारे दो देशों की सरकारों की नीतियाँ ठीक नहीं है। लेकिन यह बात भी ग़लत है। दोनों देशों ने अनेक आर्थिक परियोजनाएँ बनाकर और उनमें सरकारी कम्पनियों व निजी कम्पनियों को शामिल करके आपसी व्यापार का विकास करने की कोशिश की है। लेकिन उन कोशिशों के परिणाम बहुत अच्छे नहीं निकले हैं।

हालाँकि दो देशों के बीच सफल हुए सौदे भी कम नहीं हैं। उदाहरण के लिए, रोसनेफ़्त और एस्सार कम्पनियों के बीच हुए सौदे को ही लें। इस सौदे की बदौलत भारत में इतनी बड़ी राशि का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किया गया, जितना बड़ा विदेशी निवेश भारत के इतिहास में इससे पहले कभी नहीं किया गया था। लेकिन भारत में शुरू की गई कुछ परियोजनाएँ ऐसी भी रही हैं, जो बदकिस्मती से असफल रही हैं। जैसे, रूस की सबसे बड़ी ट्रक निर्माता कम्पनी ’कमाज़’ ने भारत की ’वेक्ट्रा मोटर्स’ कम्पनी के साथ मिलकर रूसी ट्रकों की जुड़ाई करने का एक कारख़ाना लगाया था, लेकिन वह कारख़ाना नहीं चल पाया। अब ख़बर मिली है कि रूस की ’कमाज़’ ट्रक कम्पनी गुजरात के ’एएमडब्ल्यू मोटर्स’ के साथ इस कारखाने को चलाने के लिए साझेदारी कर रही है।

’कमाज़’ के करीबी सूत्रों का कहना है कि ’कमाज़’  अब ’महिन्द्रा मोटर्स’ के साथ भी एक परियोजना पर काम करने की योजना बना रही है। ’कमाज़’ कम्पनी श्रमिक समस्या सहित भारत में तमाम तरह की दिक्कतों का सामना करने के बावजूद भारत में काम करने के लिए उत्सुक है। 

भारत की सरकारी तेल और गैस कम्पनी ’ओएनजीसी’ को भी रूस में कुछ सफलताएँ मिली हैं। सखालिन -1 परियोजना में तो वह पहले से काम कर ही रही थी, लेकिन ’इम्पीरियल एनर्जी’ नामक एक रूसी परियोजना में भी ’ओएनजीसी’ ने 2.9 अरब डॉलर का निवेश किया है। पश्चिमी साइबेरिया में चल रही इस तेल परियोजना में आजकल प्रतिदिन 20 हज़ार बैरल तेल का उत्पादन होता है। योजना यह है कि यहाँ तेल का उत्पादन बढ़ाकर प्रतिदिन 35 हज़ार से 80 हज़ार बैरल तक कर दिया जाए। 

रूस के निजी पूंजी निवेशकों को भारत में चल रही ई-कॉमर्स की आँधी पसन्द आ रही है। वे कुछ अन्य क्षेत्रों की तरफ़ भी ध्यान दे रहे हैं। भारतीय कम्पनियाँ भी रूस के बाज़ारों में सेंध लगा रही हैं। स्मार्टफोन बनाने वाली भारतीय कम्पनी ’माइक्रोमैक्स’ के 5 बड़े ब्राण्ड रूसी मोबाइल टेलिफ़ोन उपभोकताओं के बीच धीरे-धीरे लोकप्रिय होते जा रहे हैं। ’हिमालय हर्बल’ जैसी आयुर्वेदिक दवाएँ और सौन्दर्य प्रसाधन बनाने वाली कुछ अन्य भारतीय कम्पनियाँ भी धीरे-धीरे रूसी बाज़ार में धँसती जा रही हैं। 

दिल्ली के अलावा अन्य सेक्टरों की तरफ़ भी ध्यान

पिछले कुछ वर्षों में मीडिया में इस तरह की जानकारियाँ छपती रही हैं कि रूस भारत में शुरू होने जा रही औद्योगिक गलियारों और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं से लेकर यात्री विमानों के निर्माण तक की परियोजनाओं में सहयोग करेगा। लेकिन यह सभी परियोजनाएँ अभी तक सिर्फ़ काग़ज़ों पर ही दिखाई दे रही हैं। इसका कारण यह है कि नौकरशाही और लालफ़ीताशाही इन परियोजनाओं की पूर्ति में बाधा डाल रही हैं। 

अब रूस और भारत के बीच दुपक्षीय व्यापार को बढ़ाने के लिए एक यही रास्ता बाक़ी बचा है कि दो देशों को निजी क्षेत्रों को भी आपसी व्यापार में शामिल करना चाहिए और व्यापार को सत्ता के गलियारों से दूर ले जाना चाहिए यानी दिल्ली के अलावा व्यापार के अन्य केन्द्रों की तरफ़ भी ध्यान देना चाहिए। 

दो देशों के व्यापारी और पर्यटक इस बात को लेकर भी झुंझलाहट प्रकट करते हैं कि मस्क्वा (मास्को) और मुम्बई के बीच कोई सीधी विमान सेवा नहीं है। इस बीच पश्चिमी भारत से रूस आने वाले और रूस से मुम्बई जाने वाले पर्यटकों और यात्रियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। खाड़ी देशों की एयरलाइनें इसका फ़ायदा उठा रही हैं और अच्छी कमाई कर रही हैं।

निश्चय ही अगर मस्क्वा और मुम्बई के बीच सीधी विमान सेवा होगी तो रूस और भारत के बीच दुपक्षीय व्यापार का विकास करने में भी उससे बड़ी सहायता मिलेगी। ’कम शासन अधिक सुविधाएँ’ जैसे चुनाव-पूर्व किए गए वायदों के बावजूद विश्व बैंक के अनुसार, व्यापार सुविधाओं  और सुगमता की दृष्टि से दुनिया  के देशों में भारत 130 वें नम्बर पर आता है। सिर्फ़ अपने उपक्रम के लिए बिजली कनेक्शन लेने की सुविधा के मामले में ही भारत 51 देशों की सूची में 26 वें स्थान पर है।

वहीं रूस में इस दृष्टि से काफ़ी सुधार हुआ है और 2016 में वह 36 वें नम्बर पर रहा, हालाँकि यह महसूस किया जा रहा है कि इस साल वह फिर 40 वें नम्बर पर पहुँच सकता है। यही कारण है कि भारत की अधिकाधिक निजी कम्पनियाँ दूसरे देशों के मुक़ाबले रूस में व्यापार का विकास करने में अधिक सफल हो रही हैं। 

निजी क्षेत्र की कम्पनियों का एक ही मकसद होता है — ज़्यादा से ज़्यादा लाभ कमाना। इसलिए वे उसी बाज़ार की तरफ़ रुख़ करती हैं, जहाँ बुनियादी ढाँचा मज़बूत होता है और जहाँ नौकरशाही की बाधाओं से बचकर आसानी से पैर जमाएँ जा सकते हैं। इसलिए रूस में भारतीय कम्पनियों की घुसपैठ बढ़ती जा रही है। आगामी जून में होने जा रहे साँक्त पितेरबुर्ग (सेण्ट पीटर्सबर्ग) आर्थिक फ़ोरम में भी भारत को अतिथि देश के रूप में निमन्त्रित किया गया है।

लेकिन दुपक्षीय व्यापार का विकास करने के लिए यह भी ज़रूरी है कि भारतीय बाज़ार में प्रवेश करने के लिए रूसी व्यवसायियों को वास्तविक प्रोत्साहन दिया जाए। 

रूस के पास ऐसी हाई टैक्नोलॉजी, सुरक्षा प्रणालियों, कृषि तकनीक और कृषि उपकरणों व दूसरी क़िस्म के तैयार मालों की कमी नहीं है, जिनको भारतीय बाज़ारों में आसानी से उतारा जा सकता है। अगर भारत की ’मेक इन इण्डिया’ की नीति के तहत ही रूसी कम्पनियों को प्राथमिकता दी जाए तो भी दोनों देशों को इससे बड़ा फ़ायदा होगा।  

दो देशों के निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग बढ़ाकर भी दो देशों के बीच आपसी व्यापार में काफ़ी वृद्धि की जा सकती है। इस बीच, कुछ सरकार समर्थित परियोजनाएँ भी अस्तित्व में आ जाएँगी।

अजय कमलाकरन  ’रूस-भारत संवाद’ के एशिया सम्बन्धी सलाहकार सम्पादक हैं। 

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