ब्रिक्स, शंसस और लघु व्यापार रूस को आर्थिक मन्दी से बाहर निकालेंगे

रूसी अधिकारी यह योजना बना रहे हैं कि रूस के लघु व्यावसायियों और लघु उद्योगों के द्वारा उत्पादित मालों का ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (शंसस) के सदस्य देशों को निर्यात बढ़ाकर दोगुना कर दिया जाए।
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विगत 1 व 2 दिसम्बर को रूस के उफ़ा नगर में ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों के लघु उद्योगों का व्यावसायिक सम्मेलन हुआ। स्रोत :Andrey Starostin/ IA Bashinform

रूस में चल रही आर्थिक मन्दी की वजह से रूसी लघु उद्योगों और लघु व्यावसायियों द्वारा उत्पादित मालों की घरेलू माँग बहुत कम हो गई है, इसलिए रूस के लघु उद्योगों को अपना माल ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (शंसस) के सदस्य देशों के बाज़ारों में बेचने की कोशिश करनी चाहिए। रूस, भारत और चीन के अधिकारियों ने विगत 1 व 2 दिसम्बर को रूस के उफ़ा नगर में हुए एक व्यावसायिक सम्मेलन में यह बात कही। इस सम्मेलन में ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य देशों के लघु उद्योगपतियों और लघु व्यावसायियों ने भाग लिया।

सन् 2016 के शुरू में रूस के रष्ट्रपति व्लदीमिर पूतिन ने रूस की सरकार के सामने यह उद्देश्य रखा था कि रूस के सकल घरेलू उत्पाद में लघु व्यवसाय का हिस्सा 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत किया जाना चाहिए।

आइसक्रीम बनाम मन्दी

सितम्बर 2016 में जी-20 के सम्मेलन के दौरान जब रूस के राष्ट्रपति व्लदीमिर पूतिन ने चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग को रूस में बनी रूसी आइसक्रीम उपहार में दी तो चीन में रूसी आइसक्रीम की माँग इतनी ज़्यादा बढ़ गई कि वहाँ आइसक्रीम की बिक्री के सभी पुराने रिकार्ड टूट गए। रूस की सीमाकर विभाग के अनुसार, 2016 के पहले दस महीनों में चीन में रूसी आइसक्रीम की बिक्री बढ़कर पाँच गुना हो गई और 42 लाख डॉलर तक पहुँच गई है।

उफ़ा में हुए लघु उद्योगपतियों के सम्मेलन में बोलते हुए रूसी निर्यात केन्द्र के प्रतिनिधि अन्द्रेय झिगालफ़ ने कहा — चीनियों द्वारा रूसी आइसक्रीम की भरपूर ख़रीद यह दिखाती है कि रूसी लघु व्यावसायियों के उत्पादनों को विदेशों में आगे बढ़ाया जा सकता है। पहले सिर्फ़ रूस के ख़बरोवस्क प्रदेश से ही चीनी व्यापारी आइसक्रीम का आयात किया करते थे, लेकिन जी-20 के सम्मेलन के बाद  आधे यूरेशियाई भूभाग को पार करके रूस के केन्द्रीय हिस्सों से भी चीन को आइसक्रीम का निर्यात शुरू हो गया। आइसक्रीन के अलावा चीनी लोग रूसी चाकलेट ’अल्योन्का’ और रूस में बने आभूषणों को भी बेहद पसन्द करते हैं।

रूस के लघु व्यवसायी अपने उत्पादों का इसलिए निर्यात नहीं कर पाते हैं क्योंकि उनके उत्पादों को विदेश में कोई जानता ही नहीं है। उनके उत्पादों का विदेशों में प्रचार-प्रसार करने की कोई व्यवस्था नहीं है। जैसे व्लदीमिर पूतिन द्वारा रूसी आइसक्रीम का निजी तौर पर विज्ञापन करने के बाद भी ब्रिक्स के दूसरे देशों में रूसी आइसक्रीम का निर्यात और बिक्री शुरू नहीं हुई। उफ़ा के लघु व्यवसायियों के सम्मेलन में बोलते हुए मस्क्वा स्थित भारतीय दूतावास के आर्थिक विभाग के प्रमुख अमित तैलंग ने कहा — भारत में लोग स्वीडिश और इतालवी आइसक्रीम के बारे में तो जानते हैं क्योंकि वह भारत के कोने-कोने में मिलती है, लेकिन रूसी आइसक्रीम के बारे में कोई नहीं जानता क्योंकि रूसी आइसक्रीम पाँच सितारा रेस्टोरेण्टों में भी नहीं मिलती।

ब्रिक्स देशों में रूसी माल क्यों नहीं बिकते?

विश्वप्रसिद्ध लेखा-परीक्षा और करनीति सलाहकार (ऑडिट एन्ड टैक्स) कम्पनी केपीएमजी के अनुसार, रूस द्वारा किए जाने वाले कुल निर्यात में लघु उद्योगों और लघु व्यावसायिकों द्वारा  उत्पादित माल 1 प्रतिशत से भी कम होते हैं। जबकि भारत में यह 5 प्रतिशत से ज़्यादा और फ़्राँस या कनाडा में 3 प्रतिशत से ज़्यादा हैं। यह जानकारी केपीएमजी के रणनीति और कार्रवाई सलाहकार विभाग के निदेशक अलिक्सेय नज़ारफ़ ने दी। उन्होंने बताया कि अपने मालों का निर्यात करने की इच्छा रखने वाले लघु व्यवसायियों के सामने दिक़्क़त यह है कि दुनिया के बाज़ारों में वे अपने ग्राहक और सहयोगी कैसे ढूँढ़ें।

मस्क्वा स्थित भारतीय दूतावास के आर्थिक विभाग के प्रमुख अमित तैलंग ने बताया कि रूस में बनने वाला शहद का केक दुनिया में सबसे स्वादिष्ट होता है, जो दुनिया के बाज़ारों में ख़ूब बिकने वाली इतालवी पेस्ट्री तिरामिसू को भी मात दे सकता है। लेकिन रूसी शहद का केक कहीं मिलता ही नहीं, न किसी दुकान में वह मिलता है और न ही किसी रेस्टोरेण्ट में। अमित तैलेंग ने कहा — रूसी खाद्य-पदार्थ भारत में लोकप्रिय हों, इसके लिए सिर्फ़ भारतीय उपभोक्ताओं के बीच ही उनका प्रचार-प्रसार करने की ही ज़रूरत नहीं है, बल्कि यह भी ज़रूरी है कि रूसी व्यवसायी यह जानें कि भारत में क्या-क्या रूसी माल बिक सकते हैं और ख़ूब चल सकते हैं।

इस समस्या का समाधान करने के लिए चीनी उद्योगपति संघ के अध्यक्ष वान सू ई ने ब्रिक्स समूह के सदस्य देशों के एकीकरण सम्बन्धी कोर्स तैयार करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा —जब रूसी कम्पनियाँ हमारे बाज़ार में आती हैं, तो उनके सामने अक्सर प्रशासनिक दिक़्क़तें तथा नियम और कानूनों से जुड़ी दिक़्क़तें आती हैं। रूसी कम्पनियाँ हमारी परम्पराओं और रीति-रिवाजों को भी नहीं जानतीं क्योंकि वे हमारी संस्कृति से परिचित नहीं होतीं।

अमित तैलंग का कहना है कि इन बाधाओं को दूर करने के लिए एक बहुभाषी मंच बनाने की ज़रूरत है, जिसमें न सिर्फ़ स्थानीय नियमों और कानूनों की जानकारी दी जाए, बल्कि तात्कालिक जानकारियाँ भी तुरन्त मिल सकें। अमित तैलेंग ने कहा —जब तक ब्रिक्स देश इस तरह का कोई मंच नहीं बना लेंगे, मुझे इस बात में शक है कि हमारे देशों के बीच छोटे व्यापार का अच्छे ढंग से विकास हो सकेगा।

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