चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो : अन्तरिक्ष में 55 बरस

इस साल रूसी अन्तरिक्ष-नाविक यूरी गगारिन की अन्तरिक्ष उड़ान को यानी अन्तरिक्ष में मानव की पहली उड़ान को 55 साल पूरे हो गए। रूस में लोग आज भी दूसरे सितारों पर पहुँचने का सपना देख रहे हैं और बहुत से लोग और ब्लॉगर तो इतने उत्साही हैं कि उन्होंने अपने उपग्रह भी बनाने शुरू कर दिए हैं।
Yuri Gagarin in a training center, 1960. Source: ITAR-TASS
12 अप्रैल 1961 को यूरी गगारिन की अन्तरिक्ष-उड़ान अन्तरिक्ष में सोवियत-संघ की प्रारम्भिक बड़ी उपलब्धियों में से एक थी। स्रोत : ITAR-TASS

एक पुराने रूसी पोस्टर पर एक उत्साही किशोर मुस्करा रहा है और उसके पीछे अन्तरिक्ष में सितारे चमक रहे हैं। पोस्टर पर लिखा है – सोवियत धरती अब ब्रह्माण्ड का एक किनारा बन गई है। किशोर के हाथ में अन्तरिक्ष में जाने और वहाँ से वापिस सोवियत संघ में लौटने के टिकट दिखाई दे रहे हैं।

सोवियत जनता की कई पीढ़ियाँ यही सोचते-सोचते बड़ी हुईं कि वे ब्रह्माण्ड पर अपनी विजय का इतिहास लिखेंगी। आइए, आज हम इस बात की चर्चा करें कि सितारों को जीत पाने का वह सपना कहाँ तक पहुँचा और आज रूस में अन्तरिक्ष उद्योग के विकास की क्या हालत है।

अन्तरिक्ष में शीत-युद्ध

12 अप्रैल 1961 को यूरी गगारिन की अन्तरिक्ष-उड़ान अन्तरिक्ष में सोवियत-संघ की प्रारम्भिक बड़ी उपलब्धियों में से एक थी। लेकिन जब तक सारी दुनिया दिल थाम के अन्तरिक्ष में मानव की पहली उड़ान के बारे में चर्चा कर रही थी, अमरीकी सरकार भारी चिन्ता में पड़ी हुई थी क्योंकि आर-7 नामक जिस वाहक-रॉकेट ने गगारिन के अन्तरिक्ष-यान ’वस्तोक-1’ को अन्तरिक्ष में पहुँचाया था, उस रॉकेट का निर्माण दरअसल अमरीका तक परमाणु बम पहुँचाने के लिए किया गया था।

स्रोत : RIA Novosti

वे शीत-युद्ध के दिन थे और अन्तरिक्ष वह जगह थी, जहाँ दोनों महाशक्तियाँ एक-दूसरे के विरुद्ध खुले आम ताल ठोंकने से बचकर भी एक-दूसरे को अपनी ताक़त और अपने पुट्ठों की मछलियाँ दिखा सकती थीं।

पिछली सदी के आठवें दशक के शुरू में सोवियत अधिकारी भी यह जानकारी पाकर बेहद चिन्तित हुए थे कि अमरीका ने अन्तरिक्ष में जाने-आने के लिए शटल अन्तरिक्षयान बना लिया है और वे भी सैन्य उद्देश्यों से पृथ्वी की परिधि का इस्तेमाल करने के लिए बेहद अच्छी क्वालिटी का ऐसा ही एक स्पेस-शटल बनाना चाहते थे। 

सोवियत संघ को डर था कि अमरीका अपने इस शटल अन्तरिक्षयान का उपयोग अन्तरिक्ष में एटम बम तैनात करने और अन्तरिक्ष में काम कर रहे सोवियत उपग्रहों को चुराने के लिए कर सकता है। अमरीका को इस तरह की हरकतें करने से रोकने के लिए सोवियत सरकार ने भी अपनी पूरी ताक़त ’एनेर्गिया-बुरान’ नामक शटल अन्तरिक्षयान का निर्माण करने में झोंक दी थी। अपनी इन योजनाओं पर अमल करने के लिए दोनों महाशक्तियाँ बेतहाशा पैसा खर्च कर रही थीं। अमरीका ने स्पेस-शटल बनाने के लिए क़रीब 2 खरब डॉलर खर्च किए थे और रूस ने ’बुरान’ के निर्माण पर 16-17 अरब डॉलर फूँक दिए थे। 

लेकिन सोवियत संघ में शुरू हुए पेरेस्त्रोइका यानी पुनर्गठन, सोवियत संघ के पतन और पिछली सदी के अन्तिम दशक में रूस में फैले आर्थिक संकट ने उन सारे प्रयासों पर पानी फेर दिया। रूस में आर्थिक कठिनाइयाँ इतनी ज़्यादा थीं कि मीर-2 अन्तरिक्ष-स्टेशन का निर्माण करने की परियोजना भी रोक दी गई थी। मीर-2 अन्तरिक्ष-स्टेशन को अन्तरिक्ष में काम कर रहे ’मीर’ नामक अन्तरिक्ष-स्टेशन की जगह लेनी थी। 

प्रतिस्पर्धा से सहयोग की ओर

जून -1992 में रूस और अमरीका ने अन्तरिक्ष में सहयोग और अनुसन्धान के बारे में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। रूसी अन्तरिक्ष संगठन ’रोसकोसमोस’ ने अमरीकी अन्तरिक्ष संगठन ’नासा’ के सामने अन्तरराष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन बनाने का प्रस्ताव रखा, जिसका निर्माण शुरू में अमरीका, कनाडा, जापान और यूरोपीय अन्तरिक्ष एजेन्सी मिलकर करना चाहते थे। 

अब पिछले अनेक वर्षों से सभी देशों के अन्तरिक्ष-यात्री रूसी अन्तरिक्षयान ’सोयूज’ में बैठकर ही अन्तरराष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन तक आते-जाते हैं। हालाँकि पिछले साल अमरीका की दो निजी कम्पनियों स्पेसएक्स और बोइंग को अमरीका की सरकार ने सन् 2017 के आख़िर तक एक नए अन्तरिक्ष-यान का निर्माण करने के लिए 6.8 अरब डॉलर का अनुदान दिया है। 

रूसी अन्तरिक्ष संगठन ’रोसकोसमोस’ के प्रमुख ईगर कमारोफ़ के अनुसार, सभी देशों के बीच आज अन्तरिक्ष में काम करने के सिलसिले में पूरी पारस्परिक समझ दिखाई दे रही है। उन्होंने कहा –  पृथ्वी पर आपसी रिश्तों में तनाव होने के बावजूद अन्तरराष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन पर स्थिति इसके एकदम विपरीत है। हम आपस में वैज्ञानिक उपकरणों और वैज्ञानिक अनुसन्धानों के परिणामों का लेन-देन करते हैं। नासा और यूरोपीय अन्तरिक्ष संगठन के साथ इस बात पर भी हमारी सहमति हो चुकी है कि अन्तरिक्ष में अपनी वैज्ञानिक गतिविधियों और अन्तरिक्ष यात्रियों को भेजने के कार्यक्रम का हम मिलकर विकास करेंगे।

चाँद पर पहले उपनिवेश

विगत मार्च महीने के अन्त में रूस की सरकार ने 2016 से 2025 तक नए अन्तरिक्ष कार्यक्रम की परियोजना का अनुमोदन कर दिया है। इस कार्यक्रम में अन्तरिक्ष में कार्यरत अन्तरराष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन के रूसी हिस्से के विकास को प्राथमिकता दी गई है। अन्तरराष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन का उपयोग भी अब 2024 तक किया जाएगा।

अन्तरराष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन के कर्मीदल के सदस्य। स्रोत : Bill Stafford/NASA

रूसी अन्तरिक्ष संगठन ’रोसकोसमोस’ के प्रमुख ईगर कमारोफ़ के अनुसार, रोसकोसमोस यूरोपीय अन्तरिक्ष एजेन्सी और नासा के साथ मंगल ग्रह से जुड़ी सँयुक्त अन्तरिक्ष परियोजनाओं पर काम करने के बारे में विचार-विमर्श कर रहा है। लेकिन अगले दस साल तक रूस का सारा ध्यान पृथ्वी की निकटवर्ती परिधि, अन्तरिक्षीय रेडियोधर्मियता तथा सूर्य की सक्रियता के अनुसन्धान की ओर केन्द्रित रहेगा। इसके अलावा वह सन् 2025 के बाद चन्द्रमा के अनुसन्धान की तैयारी भी कर रहा है। रोसकोसमोस की योजनाओं के अनुसार, सन् 2030 में रूसी लोग चन्द्रमा पर उतरना शुरू कर देंगे।  

ऐसा लगता है कि रूस की महत्वाकांक्षाएँ बहुत बड़ी हैं। लेकिन, ईगर कमारफ़ ने कहा – अगले दस साल के लिए बनाए गए रूस के अन्तरिक्ष कार्यक्रम में अतिभारी रॉकेट के निर्माण की योजना शामिल नहीं की गई है। हाँ, फ़िनिक्स नामक मध्यम वर्ग का एक रॉकेट 2025 तक बनाए जाने की योजना है, जो अतिभारी वर्ग के रॉकेट निर्माण की ओर उठाया गया पहला क़दम होगी। लेकिन आने वाले समय में इस रॉकेट का इस्तेमाल करने की कोई योजना नहीं बनाई गई है। इसलिए हमने सोचा कि हम अतिभारी रॉकेट को बनाकर क्या करेंगे? क्या सिर्फ़ इसलिए इसे बनाया जाए ताकि यह कहा जा सके कि दुनिया में हमने सबसे पहले ऐसा रॉकेट बना लिया है? इस तरह की बातों से तो हम बहुत पहले ही ऊपर उठ चुके हैं कि कौन पहले अन्तरिक्ष में पहुँचा और कौन पहले चाँद पर उतरा। अब हमें दूसरे काम करने हैं, जो इस तरह की किशोर मानसिकता से बिल्कुल अलग हैं। 

रूसी अन्तरिक्ष यात्रियों का मानना है कि आज हमारे पास जो प्रौद्योगिकी है, उसकी सहायता से भी आज ही चाँद पर चढ़ाई की जा सकती है। अन्तरिक्ष-यात्री अलेग कनानेन्का ने कहा – पिछले दौर में मानवजाति ने नई सामग्रियों, नए ऊर्जा संसाधनों के आविष्कार के क्षेत्र में लम्बी छलांग लगाई है। मुझे लगता है कि आज हमारे पास जो तकनीक है, उससे हम चाँद पर आसानी से चढ़ाई कर सकते हैं। वैसे भी हमें ऐसा करने की ज़रूरत है क्योंकि पृथ्वी पर संसाधन धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं और वे देर-सवेर ख़त्म हो जाएँगे। तब मानवजाति को चन्द्रमा और मंगल का इस्तेमाल करना पड़ेगा।

दूर लगने वाले सितारे हमारे बहुत क़रीब हैं

पिछले समय में रूस में अनेक निजी अन्तरिक्ष कम्पनियाँ भी सामने आई हैं, जैसे ’दाउरिया एयरोस्पेस’ और ’स्पूतनिक्स’ नामक कम्पनियाँ छोटे अन्तरिक्ष यानों के निर्माण, उनकी जुड़ाई और उन्हें अन्तरिक्ष में भेजने के काम से जुड़ी हुई हैं। 

बहुत से ऐसे शौकीन लोग भी हैं, जो सितारों से जुड़ी अपनी अन्तरिक्ष योजनाओं के लिए सामूहिक सहयोग के आधार पर धन की तलाश कर रहे हैं।

सन् 2016 के शुरू में कुछ उत्साही ब्लॉगरों के एक दल ने चन्द्रमा की ओर अन्तरिक्षयान भेजने के लिए बूमस्टार्टर पर 29 हज़ार डॉलर इकट्ठे कर लिए। इस योजना का उद्देश्य चन्द्रमा पर उन जगहों की तस्वीरें खींचना है, जहाँ अमरीकी अपोलो यान और सोवियत स्वचालित चन्द्रगाड़ियाँ ’लूना’ और ’लूनाख़ोद’ उतरी थीं। 

इस साल रूस के इंजीनियरिंग विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक ’मयाक’ नाम का एक छोटा उपग्रह छोड़ने की योजना बना रहे हैं। यह उपग्रह भी इण्टरनेट पर इकट्ठे किए गए धन से बनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि अन्तरिक्ष मानवजाति के एकदम पास में ही स्थित है और उसे उपलब्ध है। इसके अलावा इसका उद्देश्य उस तकनीक का परीक्षण करना भी है, जो अन्तरिक्षीय कूड़े की समस्या का समाधान कर सकती है। 

विगत मार्च महीने के अन्त में ही रूसी अन्तरिक्ष संगठन रोसकोसमोस ने एक निजी कम्पनी कोस्मोकूर्स को यह इजाज़त दे दी है कि वह एक ऐसे शटल अन्तरिक्ष यान का निर्माण करे, जो पर्यटकों को अन्तरिक्ष में ले जा सके। कोस्मोकूर्स के महानिदेशक पाविल पूश्किन ने कहा – पर्यटकों को इसके लिए किसी भारी-भरकम ट्रेनिंग से नहीं गुज़रना होगा। उन्हें बस अपनी चिकित्सा जाँच करानी होगी कि उन्हें कोई ऐसी बीमारी तो नहीं है, जिसपर इस यात्रा का बुरा असर पड़ेगा तथा एक बन्द गोले में बैठकर घूमना होगा। इसके बाद हम पर्यटक से अन्तरिक्ष-यात्रा कराने का अनुबन्ध कर लेंगे। 

कोस्मोकूर्स कम्पनी सन् 2020 में ऐसे पहले पर्यटक-दल को अन्तरिक्ष की सैर कराना चाहती है। अन्तरिक्ष की सैर करने के लिए पर्यटक को बस दो-ढाई लाख डॉलर खर्च करने होंगे। अब अनेक वर्ष बीत जाने के बाद ऐसा लग रहा है कि सोवियत जनता का वह सपना पूरा होने जा रहा है, जब सितारे उसके क़रीब आ जाएँगे। यह और बात है कि हर आदमी की पहुँच उन सितारों तक फ़िलहाल नहीं होगी।

 

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