रूस को शुक्र ग्रह की, भला, क्या ज़रूरत है?

रूस में बनाई गई एक नई परियोजना ’वेनेरा-डी’ के अनुसार, सन् 2026 तक रूस इस निर्जीव ग्रह की ओर एक अन्तरिक्ष यान भेजेगा। सवाल यह उठता है कि आख़िर वैज्ञानिक इस बेजान ग्रह में क्या ढूँढ़ना चाहते हैं?
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नई ’वेनेरा-डी’ परियोजना में कोई ऐसी भौतिक घटना भी सामने आ सकती है, जिससे अभी तक मानवजाति पूरी तरह अनजान है। स्रोत :ESA

रूस का अन्तरिक्ष संगठन ’रोसकोसमोस’ अमरीकी अन्तरिक्ष एजेन्सी ’नासा’ के साथ ’वेनेरा-डी’ नामक एक नई परियोजना पर अमल करने के लिए बातचीत कर रहा है। इस परियोजना में ’डी’ का मतलब है — दीर्घकालीन। इस परियोजना के अनुसार एक ऐसा अन्तरिक्ष यान बनाया जाएगा, जो शुक्र ग्रह पर उतरने के बाद उसकी सतह पर कुछ दिन तक काम कर सकेगा।

अन्तरिक्षीय प्राकृतिक संसाधन

पिछली सदी के आठवें दशक में ही सोवियत संघ ने शुक्र ग्रह की तरफ़ ध्यान देना शुरू कर दिया था और वह शुक्र ग्रह का अनुसन्धान करने के लिए शुक्र ग्रह पर अन्तरिक्ष यान भेजने लगा था। अब सन् 2026 के लिए जिस अन्तरिक्ष अभियान की योजना बनाई गई है, वह दीर्घजीवी होगी और इस नज़रिए से अनूठी भी होगी। 

रूसी वैज्ञानिकों के अनुसार, यूरोप, अमरीका और चीन ने रूस की इस परियोजना में गहरी दिलचस्पी दिखाई है। शुक्र ग्रह के अनुसन्धान की इस परियोजना के अनुसार, शुक्र ग्रह पर वायुमण्डलीय निगरानी यान छोड़े जाएँगे और उसकी परिधि पर भी कुछ परिधीय यान चक्कर लगाएँगे।

त्सिआलकोवस्की रूसी अन्तरिक्ष अकादमी के सदस्य अकादमीशियन अलिक्सान्दर झिलिज़्निकोफ़ का मानना है कि इस तरह के अनुसन्धान दीर्घकालीन आर्थिक दृष्टि से फ़ायदेमन्द होते हैं। आजकल अपने प्राकृतिक खनिज संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए हम बार-बार यह सोचते हैं कि देर-सवेर ये सभी संसाधन ख़त्म होने लगेंगे। तब दूसरे ग्रहों पर जमा खनिज पदार्थ ही हमारे उद्योग-धन्धों के भविष्य के लिए उपयोगी होंगे।

शायद मंगल पर जाना सरल होगा?

हम जानते हैं कि मंगल ग्रह पर पानी की खोज की जा चुकी है। जबकि मंगल ग्रह के मुक़ाबले शुक्र ग्रह पर जीवन की कोई सम्भावना ही नहीं है। शुक्र ग्रह — एक निर्जीव रेगिस्तान है। शुक्र ग्रह का तापमान छाया में भी 467 डिग्री सेण्टीग्रेड है। शुक्र ग्रह पर हमेशा छाया ही बनी रहती है क्योंकि उस पर हमेशा बादलों की मोटी परत छाई रहती है। शुक्र ग्रह के वायुमण्डल में शुद्ध कार्बन डॉयऑक्साइड गैस फैली हुई है। यहाँ पर वायुमण्डलीय दबाव 93 अंक है। पृथ्वी पर समुद्र की अतल गहराइयों में भी इतना ही दबाव होता है। 

रूस की विज्ञान अकादमी के उपाध्यक्ष लेफ़ ज़िल्योनी बताते हैं कि शुक्र ग्रह की जलवायु का विकास इस तरह से हुआ कि अत्यधिक तापमान की वजह से शुक्र ग्रह के सारे समुद्र और महासागर सूख गए। इसके अलावा शुक्र ग्रह अपनी धुरी पर अन्य सभी ग्रहों की तरह नहीं घूमता, बल्कि वह अपनी धुरी पर उल्टा घूमता है।

लेफ़ ज़िल्योनी का मानना है कि नई ’वेनेरा-डी’ परियोजना में कोई ऐसी भौतिक घटना भी सामने आ सकती है, जिससे अभी तक मानवजाति पूरी तरह अनजान है। लेफ़ ज़िल्योनी ने कहा — 1970 से 1980 के बीच सोवियत वैज्ञानिकों ने शुक्र ग्रह के बारे में जो जानकारियाँ प्राप्त की थीं, उनका सारी दुनिया आज भी बड़ी सक्रियता के साथ इस्तेमाल कर रही है। शुक्र ग्रह के वायुमण्डल में शुक्र ग्रह से 50-55 किलोमीटर की ऊँचाई पर छोड़े गए गुब्बारों से तब सोवियत वैज्ञानिकों को जो जानकारियाँ मिली थीं, वे आज तक अनूठी मानी जाती हैं।

सोवियत ज़माने में शुक्र ग्रह का अनुसन्धान 

सोवियत वैज्ञानिकों ने अगस्त 1970 में पहला अन्तरिक्ष यान शुक्र ग्रह की ओर रवाना किया था। उसके बाद ’वेनेरा-7’ नामक पहला अन्तरग्रहीय अन्तरिक्ष यान सुरक्षित शुक्र ग्रह पर उतर गया था। इतिहास में यह शुक्र ग्रह पर मानव की पहली चढ़ाई थी। फिर 1975 में ’वेनेरा-9’ नामक दूसरे अन्तरिक्ष यान ने शुक्र ग्रह की पहली तस्वीरें पृथ्वी पर भेजीं। फिर 1982 में ’वेनेरा-13’ नामक अन्तरिक्ष यान ने शुक्र ग्रह की रंगीन तस्वीरें और ग्रह पर गूँजने वाली आवाज़ें रिकार्ड करके पृथ्वी पर भेजीं।

रूस की विज्ञान अकादमी के उपाध्यक्ष लेफ़ ज़िल्योनी ने कहा — रूस में इस नई परियोजना पर काम करने के लिए वैज्ञानिकों का कार्यकारी-दल बनाया जा चुका है, जो उन सोवियत वैज्ञानिकों के अनुभव को फिर से दोहराने के लिए तैयार है, जिन्होंने 1985 में शुक्र ग्रह पर ’वेगा-2’ नामक अन्तरिक्ष यान उतारा था। अब ’वेगा-2 के आधार पर ही शुक्र ग्रह की ओर भेजने के लिए ’वेनेरा-डी’ अन्तरिक्ष यान का निर्माण किया जाएगा। 

रूस इस उड़ान में किसका सहयोग लेगा?

त्सिआलकोवस्की रूसी अन्तरिक्ष अकादमी के सदस्य अकादमीशियन अलिक्सान्दर झिलिज़्निकोफ़ का मानना है  — इस अभियान में अमरीकी वैज्ञानिकों जैसे विदेशी सहयोगियों को शामिल करके रूस को भी काफ़ी फ़ायदा होगा। अगर सब कुछ ठीक-ठाक चलता रहा और सरकार की तरफ़ से वित्तीय समर्थन भी जारी रहा तो हमारे रूसी वैज्ञानिकों को नई क़िस्म का यह अन्तरिक्ष यान बनाने और शुक्र ग्रह के अनुसन्धान के लिए सभी तरह के उपकरण जुटाने में कम से कम दस साल का समय लग जाएगा। जबकि अमरीकी वैज्ञानिकों ने पिछले वर्षों में इस दिशा में बड़ी तेज़ी से प्रगति की है और वे ज़्यादा से ज़्यादा पाँच-छह साल में यह काम पूरा कर सकते हैं।

अकादमीशियन अलिक्सान्दर झिलिज़्निकोफ़ का कहना है कि रूसी अन्तरिक्ष संगठन रोसकोसमोस और अमरीकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा के बीच आपसी सहयोग काफ़ी लाभप्रद और प्रभावशाली रहेगा। उन्होंने कहा  — रूसी वैज्ञानिक इस अन्तरिक्ष यान द्वारा किए जाने वाले शोध कार्य से जुड़े शोध उपकरण बनाएँगे और अमरीका इस यान को बनाने के लिए नई क़िस्म की वे सामग्रियाँ उपलब्ध कराएगा, जो शुक्र ग्रह की भयानक रूप से गर्म जलवायु में यान को सुरक्षित बने रहकर वहाँ काम करने की सम्भावना देंगी। अमरीका में हाल ही में इस तरह की सामग्री खोजी गई है, जिस पर शुक्र ग्रह की भयानक गरमी का कोई असर नहीं होगा।

अमरीकी अन्तरिक्ष एजेन्सी नासा ने अभी तक प्रत्यक्ष रूप से इस बात की पुष्टि नहीं की है कि वह इस परियोजना में भाग लेगी। लेकिन नासा अन्तरिक्ष एजेन्सी ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि वह रोसकोसमोस के साथ इस अभियान में सहयोग करने के बारे में बातचीत कर रही है।

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