रूस, भारत और पाकिस्तान को मिलकर आतंकवाद से क्यों लड़ना चाहिए

आज की दुनिया में, जब वास्तव में शीत युद्ध को ख़त्म हुए भी 25 साल से अधिक समय बीत चुका है, आज भी सहज रूप से हम उसी द्वैतवादी ढंग से सोचते हैं कि दुनिया पहले की तरह दो ध्रुवों में बँटी हुई है, जबकि शीत-युद्ध की समाप्ती के साथ-साथ वे ध्रुव भी समाप्त हो गए थे। और दक्षिण एशिया के साथ रूस के रिश्ते की बात आने पर तो यह बात और भी प्रासंगिक हो उठती है।
राय
Modi Sharif
25 दिसम्बर 2015 में पाकिस्तान के प्रधान मन्त्री नवाज़ शरीफ़ और भारत के प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी की लाहौर में हुई मुलाकात के दौरान। स्रोत :EPA

उस पुरानी सोच का तरीका साफ़ था, जिसे सोवियत नेता इओसिफ़ स्तालिन ने एक फ़ार्मूले में इस तरह से पेश किया था — जो हमारे साथ नहीं है, वह हमारे ख़िलाफ़ है। इस सूत्र की तार्किक कसौटी यह थी — जो हमारे दुश्मनों के साथ रिश्ते रखता है, वह भी हमारा दुश्मन है। 

यह दो ध्रुवीय विश्व व्यवस्था 1990 में पूरी तरह से ध्वस्त हो गई। फिर ऐसा लग रहा था कि दुनिया में एक ध्रुवीय व्यवस्था इतिहास के अन्त तक चलती रहेगी। और पिछले 20 साल में इस व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आया। लेकिन आज स्थिति एकदम भिन्न है। आज न तो शीत-युद्ध का समय ही है और न ही वैश्विक मामलों में पूरी तरह से अमरीकी प्रभुत्व ही दिखाई दे रहा है। लेकिन फिर भी हम यह अनुभव करते हैं कि स्थितियों में बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं आया है। आज भी कुछ राजनीतिज्ञ और राजनीतिक विश्लेषक वैश्विक महत्व के सवालों का मूल्यांकन अपने ही नज़रिए से करते हैं। यह बात विशाल यूरेशिया और दक्षिण एशिया की राजनीति पर विशेष रूप से लागू होती है।

शीत युद्ध के समय सोवियत संघ और भारत के रिश्ते एक प्रसिद्ध नारे से अभिव्यक्त होते थे। वह नारा था — हिन्दी-रूसी भाई-भाई। तब भारत सोवियत गुट  में शामिल नहीं था। तब वह गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का नेता हुआ करता था।  और दुनिया में सक्रिय दोनों ही गुटों से बराबर की दूरी बनाकर रखता था। उस समय ही सोवियत संघ और भारत ने एक-दूसरे को अपने सच्चे दोस्तों के रूप में पाया था। पीछे मुड़कर देखें तो ऐसा लग सकता है कि तब इन दो देशों के बीच दो सगे भाइयों जैसे रिश्ते बन गए थे। इन दो भाइयों में से एक बड़ा था। शायद ऐसा ही कुछ था। लेकिन आज भारत को यह बात शायद भली नहीं लगेगी। फिर सोवियत संघ का पतन हो गया। लेकिन इसके बाद भी ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता कि रूस भारत के साथ समय की कसौटी पर खरी उतरी अपनी दोस्ती की भावना को छोड़ रहा है।

जहाँ तक  पाकिस्तान का सवाल है तो मामला इतना आसान नहीं है। शीत युद्ध के ज़माने में पाकिस्तान अमेरिका का एक विश्वसनीय सहयोगी था, और इस तरह वह दक्षिणी एशिया में सोवियत नीतियों का एक कड़ा प्रतिद्वन्द्वी था। हालाँकि  सोवियत संघ और पाकिस्तान के बीच कभी सीधा सैन्य टकराव नहीं हुआ, लेकिन दोनों देशों के बीच प्रॉक्सी युद्ध तो कई बार हुआ। 1971 में  बांग्लादेश की लड़ाई और पिछली सदी के नौवें दशक में अफ़गानिस्तान में हुई लड़ाइयाँ इसके स्पष्ट उदाहरण हैं। 
लेकिन समय गुज़रता जा रहा है और आज का पाकिस्तान अब वह देश नहीं रह गया है, जैसा वह पिछली सदी के आठवें और नौवें दशक में था। अमेरिका के साथ उसके रिश्ते अब ख़राब हो चुके है। आज उसे अमेरिका की तुलना में चीन का सहयोगी माना जाता है। हालाँकि इससे भारत को शायद ही बहुत ज़्यादा फ़र्क पड़ा है। चीन तो भारत के लिए 30-40 साल पहले के अमरीका से भी ज़्यादा कड़वा है। 

तो आज यह बात साफ़-साफ़ दिखाई पड़ रही है कि दुनिया में शक्ति-सन्तुलन बदलता जा रहा है। यह शक्ति-सन्तुलन सिर्फ़ मानसिकता बदलने से ही (या थोड़ा-बहुत मानसिकता बदलने के कारण भी) सामने नहीं आ रहा है।

रूस और भारत के बीच एक विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक सहयोग हो रहा है। लेकिन भारत के साथ अपने इस सहयोग की वजह से रूस चीन के साथ भी इसी तरह का सहयोग करने से पीछे नहीं हटा है। चीन आज भारत का भी मुख्य व्यापारिक साझेदार है। वहीं भारत ने अमेरिका के साथ भी रणनीतिक सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें रूसी-भारतीय सहयोग सम्बन्ध किसी तरह से आड़े नहीं आए हैं।

पाकिस्तानी समीकरण

जब भी रूसी-पाकिस्तानी रिश्तों की बात आती है तो ऐसा लगता है कि जैसे कोई परदा-सा हमारे भारतीय सहयोगियों की आँखों के आगे गिर जाता है और उनको कुछ भी दिखाई देना बन्द हो जाता है। 

जो बातें हम यहाँ पहले ही कह चुके हैं, उनको दोहराए बग़ैर ही मैं यहाँ कुछ सवालों की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ। हाँ, भारतीय-पाकिस्तानी रिश्तों की जटिलता को हम पूरी तरह से समझते हैं। इन रिश्तों से जुड़ा सबसे दर्दनाक मुद्दा कश्मीर का है और इस सवाल पर रूस का रुख नहीं बदला है। मास्को भारत की इस राय  का समर्थन करता है कि यह एक द्विपक्षीय मुद्दा है, जिसका अन्तरराष्ट्रीयकरण  नहीं करना चाहिए। रूस इस तथ्य से भी अच्छी तरह परिचित है कि पाकिस्तान दुनिया के आतंकवादी नेटवर्क का केन्द्र बना हुआ है जो न सिर्फ़ भारत के लिए, बल्कि  अफ़गानिस्तान, मध्य एशिया और रूस सहित पूरे यूरेशिया के लिए ख़तरा पैदा कर रहा है।

उसी समय इस महत्वपूर्ण बात की तरफ़ भी ध्यान देना चाहिए कि पाकिस्तान वैश्विक आतंकवाद का निशाना भी बना हुआ  है और लगातार यह कोशिश कर रहा है कि अपने क्षेत्र में सक्रिय आतंकवादी गुटों से छुटकारा पा सके।  इस नज़रिए से देखें तो पाकिस्तान को  सैन्य अभ्यास के लिए लड़ाकू हेलीकाप्टरों की बिक्री या रूसी पाकिस्तानी सँयुक्त सैन्याभ्यास हमारे उस साझा दुश्मन के विरुद्ध ही किए जा रहे हैं, जो न सिर्फ इन दोनों देशों के, बल्कि सारी मानवता के ही दुश्मन हैं।

निश्चित रूप से ऐसा हो सकता है कि रूसी-पाकिस्तानी सैन्य सहयोग के दायरे को बढ़ा चढ़ाकर पेश करने की कोशिश की जा रही हो। निश्चित रूप से, पाकिस्तान को चार हेलिकॉप्टरों की सप्लाई से इस इलाके में भारत के खिलाफ पाकिस्तान के पक्ष में सैन्य संतुलन कभी नहीं बदलेगा। लेकिन कुछ मीडिया संसाधनों के लिए इससे यह टिप्पणी करना आसान हो जाता है कि अब रूस पाकिस्तान को लड़ाकू जेट विमानों और विमानरोधी प्रणालियों की आपूर्ति भी कर्वेगा।  जबकि रूसी सेना ने  कश्मीर के विवादित क्षेत्र में पाकिस्तान के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास करने से इनकार कर दिया था। लेकिन कुछ मीडिया संसाधन इस तरह की  झूठी रिपोर्टिंग करने से बाज नहीं आए कि रूस ने कश्मीर पर पाकिस्तानी संप्रभुता को मान्यता  दे दी है।

एक नई विश्व व्यवस्था

हमें हमेशा यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि समय की कसौटी पर खरी उतरी रूसी-भारतीय दोस्ती एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था बनाए रखने की कोशिशों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ख़ुशी की बात तो यह है कि यह स्थिति बदल रही है। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने पद की शपथ लेने के बाद जो पहला भाषण दिया था, उसने स्पष्ट रूप से इस बदलाव को दिखाया है।

और यह बदलता हुआ वैश्विक वातावरण हमारी मानसिकता में बदलाव चाहता है। समय आ गया है, जब हमें बराबरी पर चल रहे खेल को जीत में बदलना है। रूस और अमरीका  के बीच अभी भी बहुत से मुद्दों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन एक बात साफ़ हो गई है कि दोनों देशों के लिए पूरी दुनिया में कोई भी एक देश उनका दुश्मन नहीं है। हाँ, दुनिया में एक ऐसा दुश्मन है, जो सभी के लिए चुनौती बना हुआ है, और वह दुश्मन है — वैश्विक आतंकवाद। इस साझा दुश्मन से लड़ने के लिए सभी ज़िम्मेदार देशों को कन्धे से कन्धा जोड़कर एक हो जाना चाहिए, चाहे उनके बीच आपसी दुपक्षीय मतभेद ही क्यों न हों। 

रूसी-पाकिस्तानी रिश्तों के विकास को भी इसी नज़र से देखना चाहिए। पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय खिलाड़ी है, जो शायद पूरे यूरेशिया और अफ़गानिस्तान के लिए महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति रखता है। इस दृष्टि से न तो हम उसकी उपेक्षा कर सकते हैं और न ही उसे अलग-थलग करके एक कोने में फेंक सकते हैं।  आज कोई भी देश वास्तव में पिछली सदी के सातवें, आठवें और नौवें दशक के उस ज़माने में वापिस लौटना नहीं चाहेगा, जब पाकिस्तान अफगानिस्तान में सक्रित आतंकवादी समूहों को समर्थन देता था और उनकी ताक़त बना हुआ था। इसलिए भारत को भी यह डर नहीं होना चाहिए कि  रूस आपसी हितों से जुड़े सवालों पर कभी पाकिस्तान  को भारत से ज़्यादा महत्व देगा और उसके साथ सहयोग करेगा। लेकिन पाकिस्तन के साथ भी सहयोग तो करना ही होगा क्योंकि अगर यह सहयोग बन्द कर दिया जाएगा  तो बहुत अधिक खतरनाक स्थिति पैदा हो जाएगी।

2017 का यह साल दुनिया के लिए बहुत सी उपयोगी संभावनाओं के द्वार खोल रहा है।  डोनाल्ड ट्रम्प की जीत और अमरीकी नजरिए में आने वाले परिवर्तन  दुनिया के लिए महत्वपूर्ण होंगे। सँयुक्त रूप से आतंकवाद के खिलाफ़  क़दम उठाना बेहद ज़रूरी है। लेकिन शायद इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत और पाकिस्तान दोनों आख़िरकार शंघाई सहयोग संगठन के सदस्य बन गए हैं, जिससे क्षेत्रीय मामलों में भी  दोनों देशों के नज़रियों में बदलाव आएगा और दोनों ही देशों की विजय होगी। बहुपक्षीय सहयोग ही वह एकमात्र तरीका है, जिससे दोनों देशों की आपसी दुपक्षीय समस्याएँ हल होंगी और दोनों  देश आपसी शत्रुता का रास्ता छोड़कर सहयोग का रास्ता अपनाएँगे।

हमें यह याद रखना चाहिए कि कभी अलज़ास का इलाका सदियों तक फ़्राँस और जर्मनी के बीच विवाद का कारण बना रहा था। लेकिन अब यूरोपीय एकजुटता के बाद यह समस्या जैसे कहीं ग़ायब हो गई है। अब अलज़ास की राजधानी  स्टार्सबर्ग पूरे यूरोप का सत्ता केन्द्र बनी हुई है। कश्मीर का भविष्य भी ऐसा ही क्यों नहीं हो सकता है?

बरीस वलख़ोन्स्की  रूसी सामरिक शोध संस्थान में मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया अध्ययन  केन्द्र के प्रमुख हैं। इस लेख में व्यक्त विचार उनके अपने निजी विचार हैं।

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