रूस से भारत आने वाले प्रवासी पक्षी और उनकी सुरक्षा

5 फ़रवरी 2017 अजय कमलाकरन
बाघ संरक्षण को लेकर दुनिया भर में चल रहे प्रयासों में रूस और भारत की अग्रणी भूमिका रही है। मध्य एशियाई उड़न-पथ का उपयोग करने वाले प्रवासी पक्षियों के लिए भी मनुष्य खतरा बनता जा रहा है। उनके संरक्षण के लिए भी रूस तथा भारत को प्रयास करने चाहिए और संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए।
Siberian crane
बड़े दुर्भाग्य की बात है कि भरतपुर राष्ट्रीय उद्यान में पिछले 16 वर्षों से साइबेरियाई सारस नहीं दिखाई पड़ा। स्रोत :Shutterstock

विगत अक्टूबर माह के शुरू में, जब ख़बरोव्स्क शहर के आस-पास स्थित जंगल रंग-बिरंगे फूलों से लद जाते हैं। उसी समय अमूर बाज़ों के झुण्ड के झुण्ड साइबेरिया से मध्य एशिया होते हुए भारत और फिर वहाँ से आगे दक्षिण अफ्रीका तक की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। रूस के सुदूर पूर्वी अंचलों में पड़ने वाले भयानक जाड़े का मौसम इन छोटे और सुन्दर शिकारी पक्षियों के लिए असह्य होता है।

पिछले हज़ारों वर्षों से इन पक्षियों को रूस से बाहर जाने और फिर वापस लौटने के दौरान अपने उड़न-पथ में किसी बड़े अवरोध का सामना नहीं करना पड़ता था। किन्तु आधुनिक हथियारों के आने और पूर्वोत्तर भारत में नियमित रूप से होने वाले शरदकालीन शिकार के कारण प्रवासी पक्षियों की प्रजातियों के अस्तित्व के लिए भारी खतरा उत्पन्न हो गया है। 2012 में नगालैण्ड और मणिपुर में हज़ारों-लाखों की संख्या में इन प्रवासी पक्षियों का नृशंसतापूर्वक शिकार किया गया।

अक्सर ऐसा कम ही देखने में आता है कि किसी कुप्रथा को रोकने के लिए आम जनता और सरकारी तन्त्र एक साथ मिलकर काम करें। किन्तु इन राज्यों के जनजातीय समुदायों को इस सिलसिले में शिक्षित किया गया कि वे प्रवासी पक्षियों को न पकड़ें और न ही उनका शिकार करें। सौभाग्य से वे इसके लिए मान भी गए। इस जागरूकता अभियान का परिणाम यह निकला कि पक्षियों को पकड़ने वाले वे बहेलिए पक्षी प्रेमी बन गए। ये प्रवासी पक्षी इस क्षेत्र में स्थित एक झील में विश्राम करते हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान यह झील पर्यावरण पर्यटन के एक बड़े केन्द्र के रूप में उभर कर सामने आई है। 2015 में तो नगालैण्ड में प्रथम अमूर बाज नृत्योत्सव भी आयोजित किया गया।

अमूर बाज सहित 143 प्रजातियों के प्रवासी पक्षी रूस में प्रजनन करते हैं और जाड़े के मौसम में मध्य एशियाई उड़न-पथ का उपयोग कर गरम जलवायु वाले इलाकों की ओर उड़ जाते हैं। दिम्वाजेल सारस यानी कुरजाँ, पीला हैरियर यानी बाज, पूर्वी स्तेपी गरुड़ और हूपू सहित इनमें से 81 प्रजातियों के पक्षी भारत में प्रवास करते हैं। इनमें से अनेक प्रजातियों के पक्षी कई महीने तक अपना जाड़ा भारत में ही बिताते हैं और भारत के कोने-कोने में इन्हें देखा जा सकता है।

साइबेरियाई सारस की दुखद नियति

कभी बड़ी संख्या में लोग राजस्थान के भरतपुर राष्ट्रीय उद्यान में भव्य साइबेरियाई सारस यानी कुरजाँ को देखने के लिए जाया करते थे। लेकिन बड़े दुर्भाग्य की बात है कि भरतपुर राष्ट्रीय उद्यान में पिछले 16 वर्षों से साइबेरियाई सारस नहीं दिखाई पड़ा। पर्यावरणविदों का कहना है कि साइबेरियाई सारसों का जो झुण्ड भारत आया करता था, अब वह विलुप्त हो चुका है।

‘बम्बई प्राकृतिक इतिहास सोसाइटी’ के तत्कालीन निदेशक असद रहमानी ने 2015 में ‘डेकन हेराल्ड’ नामक अँग्रेज़ी समाचारपत्र को बताया था — साइबेरिया की ओब दलदलों में प्रजनन करने वाले जो सारस भारत आया करते थे, दुर्भाग्य से अब वे विलुप्त हो चुके हैं। अब तो उन्हें वापस लाने का सिर्फ़ एक ही तरीका है कि फिर से उनकी संख्या को बढ़ाया जाए और उसके बाद उन्हें भारत तक के प्रवास पथ के सम्बन्ध में प्रशिक्षित किया जाए।

उन्होंने कहा कि मध्य एशिया, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान से होकर भारत आने वाले प्रवासी पक्षियों का अफ़ग़ानिस्तान की अब्दे इस्तादा झील में शिकार किया जाता था।

रूस और भारत के पास निश्चित रूप से इतने संसाधन और विशेषज्ञ उपलब्ध हैं कि वे साइबेरियाई सारस को प्रवास पथ सिखाने का प्रयास कर सकते हैं। यदि साइबेरियाई सारस फिर से भारत तक आने लगें, तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। हालाँकि अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान जैसे देशों में अरब देशों से आने वाले धनपशु इन प्रवासी पक्षियों का शौकिया तौर पर शिकार करते हैं। इसलिए अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान को इस काम में सहभागी बनाए बिना कुछ होने वाला नहीं है।

मुम्बई की पर्यावरणविद श्रुति देसाई ‘बम्बई प्राकृतिक इतिहास सोसाइटी’ सहित अनेक गैर-सरकारी संगठनों के लिए स्वयंसेवा करती हैं। उन्होंने बताया — इस मामले में रूस और प्रत्येक दक्षिण एशियाई तथा मध्य एशियाई देश को मिलकर काम करने की ज़रूरत है। जब तक पर्यावरण पर्यटन और पक्षी दर्शन से प्राप्त होने वाली आय आखेट पर्यटन से होने वाली आमदनी से अधिक नहीं हो जाती, तब तक मध्य एशियाई उड़न-पथ का उपयोग करने वाले प्रवासी पक्षियों की नई से नई प्रजातियों के सामने शिकार के कारण विलुप्त होने का खतरा मँडराता ही रहेगा।

श्रुति देसाई ने बताया कि इन प्रवासी पक्षियों के प्राकृतिक निवासस्थलों का नष्ट हो जाना भी एक बड़ा खतरा है और उनके संरक्षण की ज़िम्मेदारी दक्षिण एशियाई देशों की सरकारों की ही है।

बाघ संरक्षण

भारत में बाघ को बचाने के लिए मिलजुलकर किए गए संगठित प्रयासों और बड़े पैमाने पर चलाए गए जागरूकता अभियान का परिणाम यह हुआ कि भारत में बाघ न सिर्फ विलुप्त होने से बच गए, बल्कि उनकी संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई।  वैश्विक बाघ पुनर्वास कार्यक्रम में रूस और भारत का प्रमुख योगदान रहा है।

बाघ संरक्षण के मामले में भारत और रूस के बीच आपसी सहयोग पिछले दशक में और सुदृढ़ हुआ है और उसके ठोस परिणाम सामने आए हैं। हालाँकि मीडिया में इस सहयोग की बहुत ज़्यादा चर्चा नहीं हुई है। इन दिनों एक वैश्विक बाघ मानचित्र यानी एटलस बनाने की योजना पर काम चल रहा है।

प्रवासी पक्षियों को बचाने के लिए भी भारत और रूस को कुछ इसी तरह की पहल करनी होगी और राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी क्योंकि प्रवासी पक्षियों के विलुप्त होने का खतरा साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। पशु-पक्षियों को हालाँकि हमारी इस धरती पर मनुष्य जितने अधिकार नहीं मिले हुए हैं, लेकिन इस सृष्टि में उन्हें अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने का अधिकार तो मिलना ही चाहिए। हम जानते हैं कि भारत और रूस, दोनों देशों की संस्कृतियाँ ऐसी हैं कि उनमें प्रकृति के लिए भारी प्रेम और आदर का भाव समाहित है, इसलिए इस साझी प्राकृतिक विरासत के संरक्षण का गुरुतर दायित्व भी इन दोनों देशों के कन्धों पर आता है।

अजय कमलाकरन ’रूस-भारत संवाद’ के एशिया सम्बन्धी सलाहकार सम्पादक हैं। 

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