भारतीय छात्र रूस के मेडिकल कॉलेजों में दाखिला क्यों लेते हैं

18 अप्रैल 2017 यूलिया स्कोपिच
भारत के बहुत से छात्र हर साल रूस के मेडिकल कॉलेजों में इसलिए प्रवेश लेते हैं क्योंकि रूस में न केवल पढ़ाई बहुत अच्छी है, बल्कि बहुत सस्ती भी है। रूस-भारत संवाद ने रूस में पढ़ने वाले और पढ़ाई ख़त्म कर चुके कुछ भारतीय छात्रों से बातचीत की और यह पता लगाया कि वे कैसे इतनी जल्दी रूसी भाषा सीख लेते हैं और जब वे भारत लौटेंगे तो उनका भविष्य क्या होगा।
 Indian students
रूस के व्लदीवस्तोक नगर में स्थित रूसी सुदूर पूर्व संघीय विश्वविद्यालय में भारतीय छात्र। स्रोत :Vitaliy Ankov/RIA Novosti

रूस के हायर स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स द्वारा 2015-2016 शिक्षा सत्र में किए गए एक अध्ययन के अनुसार, रूस में कुल 2 लाख 37 हज़ार विदेशी छात्र उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए आए हुए थे, यानी रूस के कुल छात्रों में 5 प्रतिशत छात्र विदेशी थे। इन विदेशी छात्रों में भारतीय छात्रों सहित ज़्यादातर छात्र रूस के मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे थे।

रूस के मेडिकल कॉलेज सोवियत संघ से अलग हुए देशों के अलावा चीन, भारत, वियतनाम और बहुत से दूसरे देशों में बहुत लोकप्रिय हैं। इसका कारण यह है कि रूस में पढ़ाई  न केवल बहुत अच्छी है, बल्कि बहुत सस्ती भी है। 

रूसी मेडिकल कॉलेजों की एक ख़ासियत यह भी है कि उनमें पढ़ने वाले विदेशी छात्र विभिन्न वैज्ञानिक अनुसन्धानों और शोधों में भाग ले सकते हैं और अस्पतालों में प्रशिक्षण के दौरान रोगियों से सीधे मिलकर उनकी जाँच-पड़ताल कर सकते हैं। हाँ, इसके लिए यह ज़रूरी है कि रूसी भाषा का उनका ज्ञान बहुत अच्छा हो। इसलिए रूस में मेडिकल की पढ़ाई के साथ-साथ रूसी भाषा सिखाने की तरफ़ भी बड़ा ध्यान दिया जाता है। 

रूस में मेडिकल की शिक्षा प्राप्त करने के बाद भारत में डॉक्टरी की प्रैक्टिस शुरू करने से पहले रूस में पढ़ने वाले सभी छात्रों को अपनी योग्यता की पुष्टि करने के लिए एक ’एग्जिट’ परीक्षा देनी पड़ती है। जो डॉक्टर इस परीक्षा में सफल होते हैं, उन्हें भारत में इण्टर्नशिप करने की इजाज़त मिल जाती है। 

रूस-भारत संवाद ने रूस में पढ़ने वाले और पढ़ाई ख़त्म कर चुके कुछ भारतीय छात्रों से बातचीत की और यह पता लगाया कि वे कैसे इतनी जल्दी रूसी भाषा सीख लेते हैं और जब वे भारत लौटेंगे तो उनका भविष्य क्या होगा। 

लखनऊ के उदयचन्द्र निशाद, अल्ताय राजकीय मेडिकल विश्वविद्यालय में पहले साल के छात्र  

मुझे अभी मेडिकल की अपनी पढ़ाई शुरू किए हुए छह महिने भी नहीं हुए हैं, लेकिन मैं अभी से छात्र-गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगा हूँ। मैं दूसरे भारतीय छात्रों के साथ हॉस्टल में रहता हूँ। एक कमरे में हम तीन या चार छात्र रहते हैं। हमारे हॉस्टल में हर तरह की सुविधाएँ और आराम है। मेरे ग्रुप में मेरे साथ पढ़ने वाले सभी छात्र भारतीय हैं, लेकिन फिर भी यहाँ आते ही मेरे कुछ रूसी दोस्त बन गए हैं। अपने इन दोस्तों की वजह से ही मैं जल्दी ही रूस में रहने का आदी हो गया और उनके साथ रूसी भाषा बोलने और सीखने लगा। यूनिवर्सिटी में हमारी पढ़ाई अँग्रेज़ी में ही होती है, लेकिन हर रोज़ रूसी भाषा के भी अलग से पीरियड होते हैं।

यहाँ, बस, मुझे अभी एक ही दिक़्क़त हो रही है कि मैं रूसी खाना नहीं खा पाता हूँ। मुझे तेज़ मसाले वाला खाना पसन्द है और रूसी खान-पान में मसालों का इस्तेमाल बहुत कम होता है। इसलिए रूसी खाने में मुझे मसाले और अचार मिलाना पड़ता है, तभी मैं रूसी खाना खा पाता हूँ। लेकिन भारतीय खाने की तो बात ही कुछ और है। हमारी अल्ताय यूनिवर्सिटी 1954 में खुली थी और वह पश्चिमी साइबेरिया की जानी-मानी यूनिवर्सिटी है। हर साल यहाँ पढ़ने वाले विदेशी छात्रों की संख्या बढ़ती जा रही है। आजकल हमारी यूनिवर्सिटी में 14 देशों के 700 से ज़्यादा छात्र पढ़ते हैं।

मुम्बई के पवन कुमार अकेला, अरेनबूर्ग राजकीय मेडिकल विश्वविद्यालय के चौथे वर्ष के छात्र

अरेनबूर्ग में मैं एक सामान्य डॉक्टर बनने के लिए पढ़ाई कर रहा हूँ, लेकिन बाद में न्यूरोसर्जरी की पढ़ाई करूँगा। मेरी दिलचस्पी आदमी के दिमाग और न्यूरोलॉजी में ही है।

पिछले दो साल से मैं यहाँ स्टूडेण्ट साइंस सोसाइटी का सदस्य हूँ। मैं अक्सर अपनी यूनिवर्सिटी में होने वाली वैज्ञानिक कांफ़्रेंसों और अन्तरविश्वविद्यालयी प्रतियोगिताओं में भाग लेता हूँ। हमारी सोसाइटी के हेड ने पिछले साल मुझे ’2016 का प्रमुख छात्र’ नामक प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए प्रेरित किया था। मैंने अपने शोध के विषय में कांफ़्रेंस में एक लेख पढ़ा था, उसी के आधार पर मैंने प्रतियोगिता में भी भाग लिया और मैं ’विज्ञान’ वर्ग में विजयी रहा। 

हमारी अरेनबूर्ग यूनिवर्सिटी को बने 70 से ज़्यादा साल हो चुके हैं। आज हमारी यूनिवर्सिटी को रूस के प्रमुख मेडिकल कॉलेजों में से एक माना जाता है। हमारी यूनिवर्सिटी में हर तरह के प्रयोग करने तथा अस्पतालों में जाकर रोगियों से मिलने और उनकी जाँच करने की सभी सुविधाएँ हैं। हमारी लायब्रेरी भी बहुत बड़ी है। दुनिया भर की मेडिकल से जुड़ी पत्रिकाएँ हमें पढ़ने के लिए मिलती हैं। हमारी यूनिवर्सिटी में फ़ॉरेन स्टूडेण्ट फ़ैकेल्टी बनी हुई है, जिसमें प्रोफ़ेसर अँग्रेज़ी में विदेशी छात्रों को पढ़ाते हैं। सन् 2013 से इस यूनिवर्सिटी में भारतीय छात्र भी पढ़ सकते हैं।

नई दिल्ली के अमित सोनी, रूस के उत्तरी राजकीय मेडिकल विश्वविद्यालय के पुराने छात्र 

मुझे हमारे एक परिचित ने इस यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने की सलाह दी थी, जिन्होंने ख़ुद भी यहाँ पढ़ाई की थी। रूस पहुँचने के बाद मैं वहाँ का मौसम देखकर आश्चर्यचकित हुआ था। नई दिल्ली में कभी भी तापमान 10 डिग्री से कम नहीं होता। जब मैं अर्ख़ांगेल्स्क पहुँचा, उस समय वहाँ तापमान शून्य से 20 डिग्री कम था। तापमान कभी-कभी शून्य से 35 डिग्री तक कम हो जाता है। तो इस तरह पहली बार भयानक ठण्ड से मेरा सामना हुआ। इसके अलावा यहाँ गर्मियों में कुछ हफ़्ते ऐसे भी होते हैं जब रात-दिन सूरज आकाश में चमकता रहता है। मेरे कुछ दोस्तों को तो मेरी इस बात पर विश्वास ही नहीं हुआ था कि ऐसा भी हो सकता है कि कुछ हफ़्ते तक सिर्फ़ दिन ही दिन बना रहे और रात हो ही नहीं। तब मैंने उन्हें यहाँ की रात की तस्वीरें खींचकर भेजीं थीं।  

मैंने एक जनरल डॉक्टर के रूप में पढ़ाई की थी। फिर भारत लौटकर अपनी योग्यता के बारे में एग्जिट परीक्षा दी। हालाँकि यहाँ रूस में मैं एक अच्छा छात्र माना जाता था, लेकिन फिर भी भारत में मुझे तीन बार एग्जिट परीक्षा देनी पड़ी, तब कहीं जाकर मैं पास हुआ। अपनी पढ़ाई के दौरान ही मैं जानता था कि मैं यह एग्जिट परीक्षा देने के लिए पढ़ाई नहीं कर रहा हूँ, बल्कि लोगों की जान बचाने और उनका इलाज करने के लिए ही मुझे डॉक्टर बनना है।  

अब मुझे लगता है कि हमने पढ़ाई के दौरान प्रेक्टिस की तरफ़ कम ध्यान दिया था। भारत जाकर मुझे तब बड़ी परेशानी हुई, जब मुझे ऐसे-ऐसे रोगियों को देखना पड़ा, जो रोग रूस में होते ही नहीं हैं। उन रोगों का इलाज सीखने के लिए मैंने भारत के सर गंगाराम अस्पताल में साल भर की इण्टर्नशिप की।  

आजकल मैं दिल्ली के एक बहुत मशहूर बीएलके सुपर स्पैशिलिटी हॉस्पिटल में काम कर रहा हूँ। रूस में बने बहुत से रूसी दोस्तों के साथ मेरे अब भी सम्पर्क हैं, लेकिन फिर भी रूस की याद मुझे अक्सर बेचैन करती है। रूस मेरे दिल में हमेशा के लिए बस गया है। मैं अगले साल रूस में होने वाले फ़ुटबाल वर्ल्डकप को देखने के लिए वहाँ जाऊँगा।
 
रूस के अर्ख़ांगेल्सक शहर में  उत्तरी राजकीय मेडिकल विश्वविद्यालय की स्थापना 1932 में की गई थी। आजकल यह यूरोपीय उत्तरी रूस की मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में एक अग्रणी यूनिवर्सिटी है। इन दिनों वहाँ 530 विदेशी छात्र पढ़ रहे हैं। अभी तक क़रीब 450 भारतीय छात्र इस मेडिकल यूनिवर्सिटी में पढ़ चुके हैं।

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