हमने यह रीति अपनाई, रूसी-हिन्दी भाई-भाई

13 अप्रैल को मस्कवा (मास्को) में आयोजित एक गोलमेज सम्मेलन में विशेषज्ञों ने कहा कि रूस और भारत के आपसी सम्बन्ध केवल राजनयिक स्तर पर ही मज़बूत नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों की जनता के बीच भी बड़ा गहरा जुड़ाव है। भारत और रूस की सभ्यताओं और संस्कृतियों के बीच काफ़ी कुछ समानता है, इसलिए दोनों देशों की जनता के बीच मैत्री की गहरी भावना पाई जाती है।
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रूस के लोग भारतीयों के साथ अपने 'भाई और बहन' जैसा ही व्यवहार करते हैं। स्रोत :Vitaly Karpov/RIA Novosti

रूसी राजकीय मानविकी विश्वविद्यालय ने मस्कवा (मास्को) में विगत 13 अप्रैल को एक गोलमेज़ सम्मेलन का आयोजन किया। इस अवसर पर रूस के एक अग्रणी शिक्षाविद ने कहा — रूस और भारत के आपसी रिश्ते सिर्फ़ सरकारों के स्तर पर ही नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों की जनता के बीच भी बड़ा मज़बूत और गहरा रिश्ता है। रूस के लोग भारतीयों के साथ अपने 'भाई और बहन' जैसा ही व्यवहार करते हैं।

रूसी विज्ञान अकादमी के प्राच्य अध्ययन संस्थान के निदेशक रस्तिस्लाफ़ रिबाकोफ़ ने रूस और भारत के बीच बुनियादी जुड़ावों पर व्याख्यान देते हुए यह टिप्पणी की।

रूस और भारत के बीच राजनयिक सम्बन्ध स्थापित होने की 70वीं जयन्ती के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में सरकारी अधिकारियों के साथ-साथ प्रख्यात विशेषज्ञों ने भी भाग लिया।

इस गोलमेज़ सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि रूस और भारत के आपसी रिश्ते केवल राजनयिक स्तर पर ही मज़बूत नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों की जनता के बीच भी बड़ा गहरा जुड़ाव है। भारत और रूस की सभ्यताओं और संस्कृतियों के बीच काफ़ी कुछ समानता है, जिसके कारण दोनों देशों के लोगों के बीच मैत्री की गहरी भावना पाई जाती है।

रस्तिस्लाफ़ रिबाकोफ़ ने कहा — भारत और रूस के आपसी रिश्ते एकदम शुरू से ही कुछ अलग तरह के और गर्मजोशी से भरपूर रहे हैं। पर दोनों देशों को एक साथ जोड़ने वाले कारण क्या थे? भारत एक पूँजीवादी देश था। भारत ने भले ही पंचवर्षीय योजना प्रणाली को अपना लिया था,  लेकिन उसके बावजूद उसके विकास की दिशा रूस के काफी अलग थी… विचारधारा के नज़रिए से देखें तो भारत और रूस के बीच कुछ भी समान नहीं था। लेकिन इसके बावजूद रूस और भारत की जनता के बीच एक विशेष लगाव रहा है। रूस के लोग भारतीयों को अपने भाई और बहन की तरह मानते रहे हैं। यह कैसा अजीब विरोधाभास है!

रस्तिस्लाफ़ रिबाकोफ़ ने आगे कहा —  हमारे इन दोनों देशों के लोग समान मूल्यों में विश्वास करते हैं। दोनों ही देशों के लोग सच्चाई को ही ताक़त का मूल आधार मानते हैं और भौतिक लक्ष्यों के ऊपर आध्यात्मिक लक्ष्यों को तरजीह देते हैं। हमारे दोनों ही देशों की जनता न्यायिक लक्ष्य को प्राप्त करने को लेकर 'बड़ी भावुक' रहती हैं।

70 वर्ष पुराने राजनयिक सम्बन्ध

मस्कवा स्थित भारतीय राजदूतावास के उपप्रमुख जी० बालसुब्रमण्यम ने अपने इस गोलमेज़ सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा — आज वास्तव में एक अद्भुत अवसर हमारे सामने उपस्थित है। 70 साल पहले 13 अप्रैल के ही दिन, भारत के आज़ाद होने से भी पहले दोनों देशों के बीच राजनयिक रिश्ते बने थे। उन्होंने भारत के विकास की आधारशिला रखने में सोवियत संघ की महत्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित किया। उल्लेखनीय है कि भारत के औद्योगिक विकास, शिक्षा व्यवस्था, रक्षा क्षेत्र और अन्तरिक्ष कार्यक्रम में सोवियत संघ का काफी बड़ा योगदान रहा है।

जी० बालसुब्रमण्यम ने कहा कि भारत और रूस के रिश्ते  'सहयोग के प्रतिमान' हैं। सन् 2000 में दोनों देश आपसी रणनीतिक सहयोग शुरू करने के सवाल पर औपचारिक रूप से सहमत हुए थे। फिर 2010 में हमने इसे और मज़बूत बनाते हुए विशिष्ट और विशेषाधिकार प्राप्त सहयोग का रूप दिया। जी० बालसुब्रमण्यम ने भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की 2015 की रूस यात्रा का उल्लेख किया। उनके अनुसार, इस यात्रा के दौरान रूस के राष्ट्रपति तथा सरकारी अधिकारियों ने तो प्रधानमन्त्री मोदी का स्वागत किया ही, लेकिन इसके साथ ही उन्हें रूस के आम लोगों से भी काफी स्नेह प्राप्त हुआ।

जी० बालसुब्रमण्यम ने 2016 के गोवा शिखर सम्मेलन के परिणामों की चर्चा की। इसी शिखर सम्मेलन में नरेन्द्र मोदी और व्लदीमिर पूतिन ने भारत और रूस के राजनयिक सम्बन्ध स्थापित होने की 70वीं जयन्ती के अवसर पर होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा तय की थी। रूस के साथ सहयोग करने वाली विभिन्न भारतीय संस्थाएँ इस ऐतिहासिक मैत्री का उत्सव मनाने के लिए विशिष्ट कार्यक्रमों का आयोजन कर रही हैं। रूस के अनेक शहरों में 'नमस्ते रूस' नामक एक विशाल सांस्कृतिक उत्सव का भी आयोजन किया जा रहा है।

रूस के विदेश मन्त्रालय के अधिकारी अलिक्सान्दर कज़लोफ़ ने कहा कि भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय स्तर पर तो आपसी गहरा सहयोग है ही, लेकिन इसके साथ ही साथ ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन तथा जी-20 जैसे अन्तरराष्ट्रीय संगठनों के भीतर भी इन दोनों देशों के बीच गहरा सहयोग देखने को मिलता है।

वोल्गाग्राद राजकीय विश्वविद्यालय के शोध-छात्र अलिक्सेय ज़खारफ़ के अनुसार, रूस और भारत के बीच आपसी रिश्ते शुरू से ही आपसी विश्वास पर आधारित रहे हैं। एक ओर उक्रईना संकट के समय भारत ने तटस्थ रुख अपनाया और रूस पर लगाए गए अन्तरराष्ट्रीय प्रतिबन्धों का समर्थन नहीं किया, तो वहीं दूसरी तरफ रूस भी सँयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता जैसी भारत की वैश्विक आकाँक्षाओं का समर्थन करता है।

ठण्डी शुरूआत

प्राच्य अध्ययन संस्थान के भारत अध्ययन केन्द्र की प्रमुख ततियाना शउमियान ने कहा — इन दोनों महान सभ्यताओं के बीच भले ही आज गहरी दोस्ती दिखाई दे रही है, किन्तु सोवियत संघ और भारत के आपसी राजनयिक सम्बन्ध शुरू-शुरू में परस्पर सन्देह और ग़लतफ़हमी से मुक्त नहीं थे। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन और विशेषकर कांग्रेस के प्रति सोवियत संघ के सर्वोच्च नेता  इओसिफ़ स्तालिन का रुख काफ़ी आलोचना से भरा था। कांग्रेस पर तो वे 'अंग्रेजों के साथ साँठ-गाँठ करने' तक का आरोप लगाया करते थे।

ततियाना शउमियान ने कहा — शुरूआती सोवियत विचारधारा के अनुसार, महात्मा गाँधी को 'गाँधीवाद के रूप में एक प्रतिक्रियावादी राजनीतिक सिद्धान्त का जनक' माना गया था। अँग्रेज़ों के साथ जवाहरलाल नेहरू के सहयोग और राष्ट्रमण्डल के भीतर भारत के बने रहने वाली बात भी सोवियत संघ के नेताओं को पूरी तरह पची नहीं थी।

हालाँकि 1955 में  जवाहरलाल नेहरू की सोवियत संघ की यात्रा के बाद भारत और सोवियत संघ के आपसी रिश्तों में जमी बर्फ़ धीरे-धीरे पिघलने लगी थी। सोवियत संघ के लोगों के बीच राजकपूर के बेहद लोकप्रिय होने का भी इसमें काफ़ी बड़ा हाथ रहा।

अलिक्सेय ज़खारफ़ ने कहा — आज अन्तरराष्ट्रीय शक्ति सन्तुलन पूरी तरह से बदल चुका है और भारत व रूस के आपसी रिश्तों को कुछ दूसरी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मीडिया द्वारा अविश्वास और सन्देह पैदा करने वाले मुद्दों को अक्सर हवा दिए जाने की इसमें सबसे बड़ी भूमिका है। अमरीका के साथ भारत के बढ़ते सहयोग पर रूस की चिन्ता और पाकिस्तान के साथ रूस के सम्बन्धों पर भारत की चिन्ता जैसे जटिल सवाल खड़े होते रहते हैं।

रूस और भारत अन्तरराष्ट्रीय परिदृश्य में ऐतिहासिक रूप से रणनीतिक व विशेषाधिकार प्राप्त सहयोगी रहे हैं। इसके बावजूद उनके बीच आपसी सहयोग को जिस तरह उतार-चढ़ाव से मुक्त और परस्पर लाभकारी होना चाहिए, वैसा अभी तक हो नहीं सका है। हमारा मानना है कि रूस और भारत के आपसी राजनयिक रिश्ते स्थापित होने की 70वीं जयन्ती भविष्य में इन दोनों महान सभ्यताओं की मैत्री के रास्ते में आने वाली चुनौतियों पर विचार करने का बिल्कुल ठीक मौक़ा है।

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