पूतिन की दो दिवसीय जापान-यात्रा के परिणाम रूस के पक्ष में

रूस के राष्ट्रपति व्लदीमिर पूतिन की दो दिवसीय जापान-यात्रा और जापान के प्रधानमन्त्री सिन्द्ज़ो अबे से उनकी मुलाक़ात के परिणामों के बारे में रूस-भारत संवाद ने जिन विशेषज्ञों से बात की, लगभग सभी ने इस मुलाक़ात का अलग-अलग ढंग से मूल्यांकन किया। लेकिन सभी विशेषज्ञ इस बात पर सहमत थे कि दो देशों के बीच शान्ति सन्धि की दिशा में क़दम आगे बढ़ाए गए हैं।
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रूस के राष्ट्रपति व्लदीमिर पूतिन और जापान के प्रधानमन्त्री सिन्द्ज़ो अबे। स्रोत :AP
विशेषज्ञों के अनुसार, व्लदीमिर पूतिन और सिन्द्ज़ो अबे की इस मुलाक़ात का एक प्रमुख परिणाम तो यह रहा कि दक्षिणी कुरील द्वीप समूह पर सँयुक्त रूप से आर्थिक गतिविधियाँ शुरू करने के बारे में बातचीत शुरू हो गई और इसके लिए एक सँयुक्त निवेश कोष की स्थापना की गई है।
 
रूस के पूर्वी संघीय विश्वविद्यालय के विश्व अर्थव्यवस्था संकाय के प्रोफ़ेसर तगीर हुज़ियातफ़ ने रूस-भारत संवाद से बात करते हुए व्लदीमिर पूतिन की इस यात्रा के परिणामों को ’एक लम्बी छलांग’ बताया। उन्होंने कहा कि रूस और जापान आख़िरकार यह समझ गए हैं कि वे एक-दूसरे के महत्त्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी हो सकते हैं और नए ऊँचे स्तर पर एक-दूसरे के साथ सहयोग कर सकते हैं।
 
टेम्पल यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफ़ेसर जेम्स ब्राऊन ने रूस-भारत संवाद से कहा — कुल मिलाकर पूतिन की जापान यात्रा से जापान के मुक़ाबले रूस को ज़्यादा फ़ायदा हुआ है। उन्होंने कहा — रूस को ख़ुश होना चाहिए कि उक्रईना संकट शुरू होने के बाद पहली बार जी-7 में शामिल किसी देश ने अपने यहाँ रूस के राष्ट्रपति का स्वागत किया है।
 
मस्क्वा राजकीय अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध संस्थान के एशिया अध्ययन विभाग के प्रमुख दिमित्री स्त्रिल्त्सोफ़ का मानना है — हाँ, यह बात प्रतीकात्मक तो है ही कि उक्रईना संकट शुरू होने के बाद जी-7 के किसी देश में राष्ट्रपति पूतिन की यह पहली सरकारी यात्रा थी। इसका मतलब यह है कि इस यात्रा से जी-7 के देशों के बीच रूस विरोधी भावनाएँ कम होती दिखाई दे रही हैं।  
 

निवेश और समझौते

 
टेम्पल यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफ़ेसर जेम्स ब्राऊन ने कहा — हाँ, रूस और जापान के बीच कई बेहद अच्छे आर्थिक समझौते हुए हैं। ख़ासकर सँयुक्त निवेश कोष की स्थापना की घोषणा बड़ा महत्व रखती है। 
 
मस्क्वा राजकीय अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध संस्थान के एशिया अध्ययन विभाग के प्रमुख दिमित्री स्त्रिल्त्सोफ़ का मानना है — इस कोष से जापानी निवेशकों को उनकी पूँजी की  सुरक्षा की गारण्टी मिलेगी और इस क्षेत्र में रूसी-जापानी सहयोग आगे बढ़ेगा।
 
उन्होंने कहा — जापानी पूँजी निवेशकों को रूस में दिक़्क़तों का सामना करना पड़ता है क्योंकि रूस में निवेशकों के अधिकार तय नहीं हैं और पूँजी निवेश का माहौल भी ज़्यादातर अस्थिर बना रहता हैं। इससे हमारे आर्थिक सहयोग को भी प्रोत्साहन मिलेगा। 
 
रूस-जापान शिखर-वार्ता के अन्त में 3 खरब येन (यानी 2 अरब 54 करोड़ डॉलर) के कुल 68 अनुबन्धों पर हस्ताक्षर किए गए, जिनमें सँयुक्त निवेश मंच का निर्माण करने, जापानी कम्पनी मित्सुई द्वारा रूसी कम्पनी ’आर-फ़ार्म’ की दस प्रतिशत हिस्सेदारी ख़रीदने तथा जापानी बैंक जे०बी०आई०सी० द्वारा रूसी गैस कम्पनी ’यामाल-एसपग’ को 20 करोड़ यूरो का ऋण देने से सम्बन्धित अनुबन्ध शामिल हैं।
 

उम्मीदें जो पूरी नहीं हुई

 
ऐसा लगता है कि जापान को इससे कहीं ज़्यादा उम्मीदें थीं। — प्रोफ़ेसर जेम्स ब्राऊन ने कहा।
 
उन्होंने कहा — शायद जापान निराश होगा कि सीमा-विवाद के मुद्दे पर कोई ख़ास सफलता हासिल नहीं हुई। उसे आशा थी कि कुरील द्वीप समूह का मिलकर आर्थिक विकास करने के समझौते से  द्वीपों से जुड़े अन्तिम समाधान की दिशा में भी कोई प्रगति होगी। हालाँकि वहाँ कई तरह की अनिश्चितताएँ हैं, लेकिन इन द्वीपों का मिलकर आगे विकास करने के लिए कोई कानूनी ढाँचा तो बनाया ही जा सकता है।   
 
दूसरी तरफ़ किसी को भी यह आशा नहीं थी कि व्लदीमिर पूतिन की इस जापान-यात्रा के दौरान रूस-जापान सीमा-विवाद का समाधान हो जाएगा और दो देशों के बीच शान्ति-सन्धि हो जाएगी।
 
रूस के पूर्वी संघीय विश्वविद्यालय के विश्व अर्थव्यवस्था संकाय के प्रोफ़ेसर तगीर हुज़ियातफ़ ने रूस-भारत संवाद से बात करते हुए कहा — कुछ लोग यह कहते हैं कि  यात्रा से कोई उत्तेजना या सनसनी पैदा नहीं हुई। अगर उत्तेजना या सनसनी का यह मतलब है कि दक्षिणी कुरील द्वीप समूह का सवाल हल हो जाए और रूस-जापान शान्ति-सन्धि हो जाए, तो शायद ही उनकी ये आशाएँ फलीभूत होतीं। 
 
मस्क्वा राजकीय अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध संस्थान के एशिया अध्ययन विभाग के प्रमुख दिमित्री स्त्रिल्त्सोफ़ का मानना है — हो सकता है कि मिलकर की जाने वाली आर्थिक गतिविधियों से दोनों पक्ष शान्ति-सन्धि करने के नज़दीक पहुँच जाएँ। पारस्परिक समझ बढ़ाने और जापान के साथ मैत्री और शान्ति की सन्धि पर हस्ताक्षर करने के लिए यह भी एक बड़ा क़दम हो सकता है।
 
चाहे कुछ भी हो, पहला क़दम उठा लिया गया है और इसमें न सिर्फ़ जापान की, बल्कि रूस की भी राजनीतिक इच्छाशक्ति की बड़ी भूमिका रही है।
 
प्रोफ़ेसर तगीर हुज़ियातफ़ ने कहा — दो देशों के राजनीतिक नेताओं को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए। जापान के प्रधानमन्त्री ने रूस के नज़दीक आने की पहल की और रूस के राष्ट्रपति ने उस पहल का उचित मूल्यांकन किया और ख़ुद भी उसकी तरफ़ क़दम बढ़ाए। इन दोनों नेताओं की राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना दुपक्षिय सम्बन्धों में इतनी ज़्यादा प्रगति सम्भव नहीं हो पाती।
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