सीरियाई संकट के समाधान पर अस्ताना में बैठक हुई

25 जनवरी 2017 अलेग येगोरफ़
23-24 जनवरी को कज़ाख़स्तान की राजधानी अस्ताना में सीरियाई संकट का समाधान करने से जुड़े सवाल पर हुई बैठक में सीरियाई सरकार और सीरियाई विपक्ष के प्रतिनिधियों के अलावा रूस, ईरान और तुर्की के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे। इस बैठक में समस्या का कोई समाधान नहीं निकल पाया, लेकिन युद्धविराम को आगे जारी रखने पर सहमति सामने आई। विश्लेषकों का कहना है कि वर्तमान दौर में इस बातचीत से किसी बड़े परिणाम की आशा करना बेकार होगा। लेकिन रूस के लिए तो यही बात बड़ा महत्व रखती है कि वह सीरिया की सरकार और सीरियाई विपक्ष के प्रतिनिधियों को वार्ता की मेज़ तक ले आया है।
Syrian negotiations in Astana
अस्ताना में सीरियाई सरकार और सीरियाई विद्रोहियों के बीच दो दिवसीय वार्ता हुई। स्रोत :ZUMA Press/Global Look Press

अस्ताना में इस दो दिवसीय बातचीत के बाद सीरिया की सरकार के प्रतिनिधियों ने और सीरियाई विपक्ष के प्रतिनिधियों ने किसी संयुक्त विज्ञप्ति पर हस्ताक्षर नहीं किए। इस अस्ताना वार्ता के आयोजकों की भूमिका निभाने वाले तीन मध्यस्थ देशों रूस, तुर्की और ईरान ने ही वार्ता के बाद विज्ञप्ति जारी करके वार्ता के परिणामों की जानकारी दी।

मस्क्वा (मास्को), अंकारा और तेहरान ने ऐलान किया कि आतंकवादियों को सीरियाई विपक्ष से अलग करके देखा जाएगा और एक ऐसी त्रिपक्षीय व्यवस्था बनाई जाएगी, जो सीरियाई सेना और सीरियाई विद्रोही गुटों के बीच विगत 30 दिसम्बर को घोषित किए गए युद्धविराम पर नियन्त्रण रखेगी।

कूटनीति और उससे जुड़े हंगामे

दोनों पक्षों के बीच वार्ता बहुत सक्रियतापूर्वक चली। हालाँकि सीरिया सरकार के प्रतिनिधियों और सीरियाई विद्रोहियों के प्रतिनिधियों के बीच सीधी बातचीत शुरू नहीं हो पाई। दोनों पक्षों ने मध्यस्थ देशों के प्रतिनिधियों के माध्यम से ही एक-दूसरे से अपनी-अपनी बात कही।

सँयुक्त राष्ट्रसंघ में सीरिया के प्रतिनिधि और अस्ताना वार्ता में भाग लेने वाले सीरियाई सरकार के प्रतिनिधिमण्डल के नेता बशर अल-जाफ़री ने विद्रोहियों को आतंकवादी बताया और इसके विरोध में वे उस होटल को छोड़कर चले गए, जहाँ बातचीत हो रही थी। विद्रोहियों ने भी पलटकर वैसा ही जवाब दिया। उन्होंने वार्ता के बाद जारी की गई अन्तिम विज्ञप्ति के पाठ को लेकर अपना असन्तोष व्यक्त किया और कहा कि उसमें उनके उस नकारात्मक नज़रिए को अभिव्यक्त नहीं किया गया है, जो उन्होंने सीरिया में घटी घटनाओं में ईरान की भूमिका को लेकर व्यक्त किया है।

रूसी नज़रिया नरम दिखाई दिया

रूस के एशिया अध्ययन केन्द्र के अरब देशों के विशेषज्ञ व्लदीमिर अहमेदफ़ ने कहा कि वार्ता में सीरिया की सरकार और ईरान ने जो नज़रिया अपना रखा था, उससे रूस का नज़रिया अलग था। व्लदीमिर अहमेदफ़ ने कहा — पहले हम भी बशर असद और ईरान के साथ मिलकर सभी विद्रोहियों को आतंकवादी बताया करते थे। अब हम उनके साथ बातचीत कर रहे हैं।

वार्ता के बाद हुए पत्रकार सम्मेलन में बोलते हुए विद्रोहियों के प्रतिनिधिमण्डल के नेता मुहम्मद अल्लूश ने कहा — रूस अब सीधे-सीधे असद का समर्थक होने की जगह, मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। रूस अब युद्ध में सीधे भूमिका निभाने वाले एक पक्ष की जगह एक ऐसे गारण्टीकर्ता की भूमिका में सामने आ रहा है, जो ईरान और सीरिया पर अपना प्रभाव रखता है। मुहम्मद अल्लूश ने आशा प्रकट की कि रूस आगे भी सीरियाई संकट के समाधान के लिए सकारात्मक भूमिका निभाता रहेगा।

व्लदीमिर अहमेदफ़ ने कहा — रूस के साथ-साथ तुर्की भी अब अधिक उदार रवैया अपना रहा है, जबकि पहले वह पूरी तरह से विद्रोहियों का समर्थन कर रहा था। व्लदीमिर अहमेदफ़ ने कहा कि अभी हाल तक तुर्की यह चाहता था कि बशर असद सीरिया के राष्ट्रपति पद से हट जाएँ। लेकिन अब उसने यह माँग करनी बन्द कर दी है। अहमेदफ़ के अनुसार रूस और तुर्की मिलकर ईरान को इस बात के लिए मनाने में सफल हो गए हैं कि वह अपने कट्टर नज़रिए में बदलाव लाए। इसी वजह से इन तीन मध्यस्थों का गुट वार्ता में ठीक ढंग से काम कर रहा है।

आतंकवादियों के ख़िलाफ़ विपक्ष 

अभिनव विकास संस्थान के पश्चिमी एशिया अध्ययन केन्द्र के प्रमुख अन्तोन मरदासफ़ ने रूस-भारत संवाद से कहा — अस्ताना में किसी नए समझौते या शान्ति समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए गए। लेकिन इसकी तो शुरू में ही कोई सम्भावना नहीं थी। इस मुलाक़ात का उद्देश्य तो बस, इतना ही था कि दो पक्षों के बीच शुरू हुए युद्धविराम को आगे भी सुरक्षित रखा जाए।

अन्तोन मरदासफ़ ने कहा — इस बातचीत में भाग लेने वाले विद्रोही गुटों और सरकारी सेना के बीच हुए युद्धविराम से लड़ाई बन्द हो गई और कुछ इलाके विपक्ष के ही नियन्त्रण में बने रहे। इस तरह विपक्ष को यह सम्भावना दी गई है कि वह ’इस्लामी राज्य’ (इरा) और ’जेभट अन-नुसरा’ के आतंकवादियों से ख़ुद ही निपट लें। पहले सीरियाई विद्रोहियों और ’जेभट अन-नुसरा’ के आतंकवादियों को अलग-अलग कर पाना बहुत कठिन दिखाई दे रहा था और इस कारण से समस्या पैदा हो रही थी। ’जेभट अन-नुसरा’ ने हाल ही में अपना नाम बदलकर ’जेभट फ़तेह अश-शाम’ रख लिया है।

मरदासफ़ ने बताया — रूस और अमरीका की सहमति से पहले जो युद्धविराम लागू किए गए थे, उनसे अलग इस बार सचमुच आतंकवादियों और सीरियाई विपक्ष में दूरी दिखाई पड़ने लगी है। सचमुच अलग से सीरियाई आज़ाद सेना के ऐसे दस्ते सामने आ रहे हैं, जो ’जेभट अन-नुसरा’ के आतंकवादियों से लोहा ले रहे हैं। इसमें तुर्की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जो अमरीका के विपरीत सीरियाई विद्रोहियों पर काफ़ी असर रखता है।

जिनेवा वार्ता का इन्तज़ार

तीन मध्यस्थ देशों की सहायता से चल रही इस बातचीत में काफ़ी प्रगति होने के बावजूद सीरिया में पूरी तरह से शान्ति स्थापित होने में अभी बहुत देर है। सीरियाई विपक्ष चाहता है कि बशर असद राष्ट्रपति पद छोड़ दें, लेकिन बशर असद ख़ुद को कानूनी रूप से चुना गया राष्ट्रपति बताते हुए अपना पद छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। रूस के हायर स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के अरब देशों सम्बन्धी विशेषज्ञ लिअनीद इसाएफ़ ने कहा — युद्धविराम होना एक अच्छी बात है। लेकिन अगर सीरियाई संकट का राजनीतिक समाधान नहीं होगा तो स्थिति फिर बिगड़ सकती है और फिर से सरकारी सेना और विद्रोहियों के बीच लड़ाई शुरू हो सकती है।  

लिअनीद इसाएफ़ ने कहा — सीरियाई संकट के दौरान पहले भी कई बार युद्धविराम हो चुके हैं और जिनेवा में संकट के समाधान पर बातचीत शुरू हो चुकी है। लेकिन ये युद्धविराम तभी तक चले, जब तक संकट के समाधान से सम्बन्धित बातचीत टूट नहीं गई। बातचीत टूटने के बाद लड़ाई फिर शुरू हो गई।

जिनेवा में अगली बातचीत आगामी 8 फ़रवरी को शुरू होगी, जहाँ सीरिया में शान्ति स्थापित करने के सवाल पर व्यापक ढंग से वार्ता की जाएगी। सीरियाई विद्रोहियों के प्रतिनिधि का कहना है कि जिनेवा बातचीत में अस्ताना में हुई सहमतियों को आगे बढ़ाया जाएगा और उनमें नई बातें जोड़कर उन्हें पूर्ण किया जाएगा।

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