रूस सीरिया में क्यों लड़ रहा है?

30 जनवरी 2017 अलेग येगोरफ़
वोद्का क्या है? पूतिन ही..... क्यों हैं? इण्टरनेट के सर्च इंजनों पर रूस को लेकर जो सवाल अक्सर पूछे जाते हैं, उनमें से कुछ सवालों के जवाब हम आपको दे रहे हैं। आज हम आपको बताएँगे कि रूस सीरिया में हो रही लड़ाई में क्यों भाग ले रहा है।
What Russia is doing in Syria
पश्चिमी देश रूस पर यह आरोप लगा रहे हैं कि रूस का मूल उद्देश्य बशर असद की सरकार को बचाना है। स्रोत :Varvara Grankova

30 सितम्बर 2015 से रूस सीरिया में सैन्य कार्रवाई कर रहा है। रूसी वायुसेना आतंकवादी गिरोह ’इस्लामी राज्य’ (इरा) और अन्य आतंकवादी गिरोहों व सीरिया के सरकारविरोधी विद्रोहियों के ख़िलाफ़ कार्रवाइयाँ कर रही है। पश्चिमी देश रूस पर यह आरोप लगा रहे हैं कि रूस का मूल उद्देश्य बशर असद की सरकार को बचाना है, इसलिए वह आतंकवादियों के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि सरकारविरोधी विद्रोहियों के ख़िलाफ़ कार्रवाइयाँ कर रहा है और रूसी सेना की कार्रवाइयों में सीरिया के आम नागरिक मारे जा रहे हैं।

रूसी अधिकारी इस तरह के आरोपों से इंकार कर रहे हैं और ज़ोर दे रहे हैं कि पश्चिमी गठबन्धन के मुक़ाबले सिर्फ़ रूस ही आतंकवादियों से प्रभावशाली ढंग से लोहा ले रहा है। लेकिन सवाल तो यह उठता है कि रूस और सीरिया की सीमाएँ आपस में नहीं मिलती हैं, फिर भी रूस ने पश्चिमी एशिया के इस देश में चल रही लड़ाई में हस्तक्षेप क्यों किया?

आतंकवादियों से घर के बाहर ही लड़ा जाए

30 सितम्बर 2015 को आतंकवादियों पर बमबारी शुरू करते हुए रूस के राष्ट्रपति व्लदीमिर पूतिन ने इस सवाल का औपचारिक जवाब दे दिया था। उन्होंने कहा था  कि सीरिया में युद्धरत ये हज़ारों इस्लामी आतंकवादी मध्य एशिया और उत्तरी कोहकाफ़ के रास्ते बाद में रूस में घुस आएँगे, इसलिए इनको रूस की सीमाओं से दूर ही रोका जाना चाहिए।

रूस के एशिया सम्बन्धी एक विशेषज्ञ व्लदीमिर अहमेदफ़ ने कहा कि इस तरह का ख़तरा रूस के सामने सचमुच खड़ा हुआ है और यह ख़तरा कभी भी वास्तविक रूप ले सकता है क्योंकि उत्तरी कोहकाफ़ में सक्रिय आतंकवादी गिरोह ’कोहकाफ़ की इमारत’ ने जून-2015 में ’इस्लामी राज्य’ (आईएस) के प्रति वफ़ादार रहने की शपथ ले ली है। रूस-भारत संवाद को उन्होंने बताया कि 2015 में रूस के कई हज़ार नागरिक आतंकवादी गिरोहों में शामिल हो चुके थे और सीरिया में चल रही आतंकवादी गतिविधियों में भाग ले रहे थे।  

इसके अलावा मध्य एशियाई देशों के बहुत से नागरिक भी आतंकवादियों की पंक्ति में शामिल हो चुके थे, जबकि इन देशों के साथ रूस में आवागमन की वीजा मुक्त प्रणाली लागू है। ये आतंकवादी रूस के प्रति बड़ी अमैत्रीपूर्ण भावनाएँ रखते हैं। 2015 के शरदकाल में ’इस्लामी राज्य’ (आईएस) ने इण्टरनेट में एक विडियो प्रसारित किया था, जिसे शीर्षक दिया गया था — जल्दी, बहुत जल्दी। इस विडियो में कोई आतंकवादी एकदम साफ़-सुथरे रूसी उच्चारण में यह वायदा कर रहा था कि जल्दी ही रूस में भी रूसी काफ़िरों के ख़ून की नदियाँ बहा दी जाएँगी।

प्रतिष्ठा का सवाल

पश्चिमी एशिया अध्ययन संस्थान के अध्यक्ष येव्गेनी सतानोवस्की ने सीरिया में रूसी सेना की कार्रवाई शुरू होने के एकदम बाद लिखा था — सीरियाई युद्ध में रूसी हस्तक्षेप का एक और कारण यह है कि रूस दुनिया की महाशक्ति होने की बात को सिद्ध कर देना चाहता है। वैश्विक राजनीति में वह अपने प्रभाव को जतलाना चाहता है। सोवियत सत्ता के पतन के बाद रूस का असर दुनिया पर से जैसे ख़त्म ही हो गया था। रूस अपने उस प्रभावशाली ’चेहरे’ को फिर से वापिस लौटाना चाहता है। पश्चिमी एशिया में उन्हीं देशों को मान-सम्मान दिया जाता है, जो ताक़तवर और प्रभावशाली हों।

सीरियाई संकट में रूस के हस्तक्षेप के बाद पश्चिमी देशों ने भी रूस को एक नई नज़र से देखना शुरू कर दिया। क्रीमिया में घटी घटनाओं के बाद उन्होंने रूस का बहिष्कार-सा कर दिया था। लेकिन सीरियाई संकट में रूस के उतरने के बाद उन्होंने रूस से फिर से बातचीत करनी शुरू कर दी। ’वैश्विक राजनीति में रूस’ नामक पत्रिका के प्रमुख सम्पादक और राजनीतिक विश्लेषक फ़्योदर लुक्यानफ़ ने रूस-भारत संवाद से इस बारे में चर्चा करते हुए कहा — निश्चय ही आज दुनिया के एक सबसे बड़े अन्तरराष्ट्रीय संकट में सक्रिय हिस्सेदारी से दुनिया भर में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर रूस का वजन तो बढ़ गया है। सीरिया में रूसी सैन्य कार्रवाई का एक मुख्य उद्देश्य पश्चिम के साथ बातचीत शुरू करने की कोशिश भी रहा, हालाँकि सिर्फ़ एक यही उद्देश्य नहीं था।

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