सीरिया में तुर्की की सेना पर रूसी विमान की बमबारी

10 फ़रवरी 2017 अलेग येगोरफ़
विगत 9 फ़रवरी को उत्तरी सीरिया में रूसी वायुसेना के एक विमान ने ग़लती से वहाँ सक्रिय तुर्की सेना के एक दस्ते पर बमबारी कर दी, जिसमें तुर्की के तीन सैनिक मारे गए। लेकिन इसके बावजूद दो देशों के रिश्तों में कोई कड़वाहट दिखाई नहीं दी। आजकल रूस, तुर्की और सीरिया के सम्बन्ध बहुत अच्छे हैं और तीन सैनिकों की मौत के बाद भी उनपर कोई नकारात्मक असर नहीं हुआ।
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यह घटना आतंकवादी गिरोह ’इस्लामी राज्य’ (आईएस) के कब्ज़े वाले अल-बाब नगर में घटी। स्रोत :Reuters

9 फ़रवरी को ही तुर्की के सैन्य मुख्यालय ने यह जानकारी दी – रूसी वायुसेना के विमानों ने ग़लती से उस इमारत पर एक बम गिरा दिया, जिसमें तुर्की के सैनिक थे। यह घटना आतंकवादी गिरोह ’इस्लामी राज्य’ (आईएस) के कब्ज़े वाले अल-बाब नगर में घटी। उत्तरी सीरिया में अब ’इस्लामी राज्य’ (आईएस) का यह अकेला गढ़ बाक़ी रह गया है। 

जनवरी में रूस और तुर्की ने मिलकर अल-बाब में सक्रिय आतंकवादियों पर हमले किए थे। दोनों देशों के सैनिक मुख्यालय इस इलाके में की जाने वाली सैन्य-कार्रवाइयों को मिलकर संचालित कर रहे हैं। लेकिन इस बार दोनों देशों के मुख्यालयों के बीच समन्वय ठीक से नहीं हो पाया और तुर्की सैनिक रूसी बमबारी के शिकार हो गए।

इस हमले में तीन सैनिक मारे गए और 11 घायल हो गए। रूसी अख़बार ’कमेरसान्त’ ने रूसी रक्षा मन्त्रालय के हवाले से लिखा है – वायुसेना के विमानों ने हमले पर रवाना होने से पहले ही बमवर्षा के लक्ष्य तय कर लिए थे। इस दुर्घटना का कारण यह हो सकता है कि तुर्की की थलसेना के सैनिक बिना पूर्व सूचना दिए ही उस इमारत में घुस गए होंगे।

संयमित प्रतिक्रिया

रूस और तुर्की के बीच इससे पहले 24 नवम्बर 2015 को भी ऐसी ही एक घटना घटी थी, जिसमें दो रूसी नागरिक मारे गए थे। तब तुर्की की वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने रूस के बमवर्षक विमान एसयू-24 को मार गिराया था। तुर्की का कहना था कि रूसी विमान ने मानो तुर्की की सीमा का उल्लंघन किया था। रूस ने इस घटना पर बड़ा कड़ा रुख अपनाया था। व्लदीमिर पूतिन ने रूसी विमान पर किए गए इस हमले को आतंकवादियों के साथियों द्वारा ’पीठ में चाकू घोंपना’ बताया था। इसके बाद रूस ने तुर्की पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगा दिए थे। फिर जून 2016 तक दो देशों के बीच रिश्ते बेहद ठण्डे बने रहे, जब तक कि तुर्की के राष्ट्रपति रजेप तैयप एरदोगान ने उस घटना के लिए माफ़ी नहीं माँग ली। 

लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। तुर्की के सैनिक मुख्यालय द्वारा इस घटना के बाद जारी की गई पहली ही सूचना में यह कहा गया था कि यह घटना ग़लती से हुई है और रूसी विमानों ने तो ’आईएस’ (इस्लामी राज्य) के ठिकानों पर बमवर्षा की थी। यह दुर्घटना होते ही व्लदीमिर पूतिन ने तुरन्त एरदोगान से फ़ोन पर बात करके अपना शोक जताया। तुर्की सैन्य मुख्यालय के सूत्रों ने समाचार समिति तास को बताया कि तुर्की रूस की इस प्रतिक्रिया से सन्तुष्ट है। सूत्रों ने बताया कि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए रूस और तुर्की एक विशेष आयोग बनाएँगे।

गम्भीर कुपरिणाम सामने नहीं आए

मास्को के कर्नेगी केन्द्र की वेबसाइट के प्रमुख सम्पादक अलिक्सान्दर बाउनफ़ ने फ़ेसबुक पर लिखा – रूसी विमान के मार गिराए जाने के बाद रूस ने जिस तरह की प्रतिक्रिया जाहिर की थी, अब तुर्की उसका जवाब दे सकता था। लेकिन 2015 के मुक़ाबले आज सीरिया में कोई कार्रवाई करने की तुर्की के पास अलग से अपनी कोई ऐसी योजना नहीं है, जो रूसी योजना के विरुद्ध हो। आज ये दोनों देश मिलकर न सिर्फ़ ’आइएस’ पर हमले कर रहे हैं, बल्कि यह कोशिश भी कर रहे हैं कि सीरियाई गृह-युद्ध में आपस में लड़ रहे दोनों पक्ष शान्ति से बैठकर अपने विवाद सुलझा लें। इसीलिए आज रूस, तुर्की और ईरान मिलकर अस्ताना में हो रही शान्तिवार्ता के प्रायोजक बने हुए हैं।  

आधुनिक तुर्की अध्ययन केन्द्र के राजनीति विभाग के प्रमुख यूरी मवाशिफ़ ने रूस-भारत संवाद से कहा – रूस और तुर्की के बीच रिश्ते अब काफ़ी मज़बूत हो चुके हैं और दोनों देश उन स्थितियों में फ़र्क कर पाते हैं, कि कब जानबूझकर कुछ किया जा रहा है और कब ग़लती हो गई है। रूस और तुर्की ने सीरिया में अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी बाँट ली है और दोनों उसी ज़िम्मेदारी के आधार पर वहाँ काम कर रहे हैं। बाक़ी बातें ग़ैरज़रूरी हैं।

रूस के विश्व आर्थिक और अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध संस्थान के एक विश्लेषक वीक्तर नादेइन रऐवस्की का मानना है कि अब तुर्की और रूस के रिश्ते शायद ही कभी बहुत ज़्यादा ख़राब होंगे। रूस-भारत संवाद से उन्होंने कहा – दो देशों के रिश्ते गम्भीर रूप से तो अब ख़राब नहीं होंगे। लेकिन अब ज़मीनी सहयोग बढ़ाने की ज़रूरत है ताकि आगे इस तरह की घटनाओं से बचा जा सके। खेद है कि आज की दुनिया में होनेवाली लड़ाइयों में अक्सर ऐसा होता है कि अपने ही सहयोगी हमले का निशाना बन जाते हैं।

अल-बाब का फन्दा

विशेषज्ञों का कहना है कि अल-बाब को आईएस के आतंकवादियों से आज़ाद कराने में अब बहुत कठिनाई नहीं होगी क्योंकि उत्तर की तरफ़ से उस पर तुर्की की सेना और सीरियाई आज़ाद सेना के दस्ते हमला कर रहे हैं, जबकि दक्षिण की तरफ़ से रूसी वायुसेना के समर्थन से सीरिया की सरकारी सेना आतंकवादियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रही है। जबकि पहले सीरिया के राष्ट्रपति बशर असद बात की आलोचना किया करते थे कि तुर्की की सेना उनके देश की सीमाओं में घुस आई है और इसके परिणाम अच्छे नहीं होंगे।

रूस के पूर्वी देश अध्ययन संस्थान के पश्चिमी एशिया और मध्य एशिया शोध केन्द्र के तुर्की सम्बन्धी विशेषज्ञ इलशात सइतोफ़ ने रूस-भारत संवाद से कहा – वह मोर्चा जहाँ तुर्की की सेना सीरियाई आज़ाद सेना के साथ आईएस के आतंकवादियों से लोहा ले रही है और वह मोर्चा जहाँ सीरिया की सरकारी सेना आईएस से लड़ रही है – दोनों मोर्चे एक-दूसरे के करीब आ गए हैं और वास्तव में देखा जाए तो दोनों मोर्चे मिलकर एक ही मोर्चे में बदल गए हैं। इस स्थिति में ग़लतियाँ होने और अपने ही सहयोगियों को निशाना बनाने जैसी गड़बड़ियाँ होने की काफ़ी सम्भावना है। दूसरी तरफ़ न तो सीरिया यह चाहता है और न तुर्की ही यह चाहता है कि यह लड़ाई एक बड़ी लड़ाई में बदल जाए, इसलिए यदि ग़लती से कोई सहयोगी मारा भी जाता है तो आपस में कोई झगड़ा या मतभेद पैदा नहीं होगा।  

यूरी मवाशिफ़ भी सइतोफ़ की इस बात से सहमत हैं। उन्होंने कहा – हाँ, सीरियाई सेना और तुर्की सेना की क्षमता में बड़ा फ़र्क है। दोनों सेनाओं के बीच कोई तुलना नहीं की जा सकती है। लेकिन रूस का असद पर बहुत ज़्यादा असर है और वह उन्हें तुर्की की सेना के ख़िलाफ़ कोई भी कार्रवाई करने से रोक सकता है। दूसरी तरफ़ उन लोगों के बीच कभी भी टकराव हो सकता है, जिन्हें काबू में रखना मुश्किल होता है। इनमें वे स्वयंसेवक दस्ते और भाड़े के सिपाही आते हैं, जो दोनों तरफ़ से लड़ रहे हैं।

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