रूस और तालिबान के बीच दोस्ती असम्भव

रूस और तालिबान के बीच दूरी घटने की मीडिया में आई खबरें सच्चाई से कोसों दूर हैं। हालाँकि रूस ने तालिबान के साथ सम्पर्क सूत्र बनाए हैं, जिसका उद्देश्य अफ़ग़ानिस्तान के भीतर रूसी हितों की रक्षा करना है।
राय
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रूस के सर्वोच्च न्यायालय ने अफ़ग़ान तालिबान को आतंकवादी संगठनों की काली सूची में डाल दिया था। स्रोत :AP

रूस की सरकार का तालिबान के साथ दोस्ती करने का कोई इरादा नहीं है। 14 नवम्बर 2003 को रूस के सर्वोच्च न्यायालय ने अफ़ग़ान तालिबान को आतंकवादी संगठनों की काली सूची में डाल दिया था। इसके बाद से रूस और तालिबान के बीच कोई भी सहयोग कानून की नज़र में अपराध माना जाता है।

यदि तालिबान आतंकवादी गतिविधियाँ करना बन्द कर देगा, तो रूस का सर्वोच्च न्यायालय उसे काली सूची से बाहर निकाल देगा। लेकिन अभी तो तालिबान अफ़ग़ानिस्तान के भीतर नागरिक और सैन्य ठिकानों पर लगातार हमले कर रहा है।

आम तौर पर अपने इन हमलों में तालिबानी लड़ाके विदेशियों को निशाना बनाते हैं। इन विदेशियों में रूसी नागरिक भी शामिल होते हैं। रूसी खुफिया विभाग लगभग हर साल रूस में सक्रिय ऐसे संदिग्ध लोगों को गिरफ्तार करता है, जिनका तालिबान  से रिश्ते होते हैं। इसका मतलब यह है कि रूस में तालिबान को फ़िलहाल काली सूची से बाहर निकालने की बात करना बहुत जल्दबाजी करना होगा।

तालिबान के साथ सम्पर्क सूत्र

30 सितम्बर 2016 को आतंकवाद-रोधी अभियान के प्रभारी रूस के उप-विदेशमन्त्री जनरल अलेग सिरमोलतफ़ ने तालिबान के मामले में रूस के नज़रिए को साफ़ करते हुए कहा था — तालिबान का नाम सँयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबन्धित संगठनों की सूची में शामिल है। इसलिए तालिबान के साथ हमारा कोई सम्पर्क नहीं है। केवल मानवाधिकारों और बन्धकों से जुड़े मानवीय मुद्दों को सुलझाने के लिए हमने उनके साथ एक संचार सूत्र विकसित किया है। लेकिन इसके अलावा हमारा उनसे कोई सम्पर्क नहीं है।

2014 में तालिबान की क़ैद से रूस के विमान चालक पाविल पित्रेंका की रिहाई से यह बात सिद्ध हो गई कि रूस और तालिबान के बीच का यह संचार सूत्र काफी प्रभावशाली है।

पाविल पित्रेंका ने अपनी रिहाई के बाद अफ़ग़ानिस्तान डॉट रू नामक वेबसाइट को बताया — मैं इसलिए छूट पाया क्योंकि रूस ने अफ़ग़ानिस्तान में एक नया संचार सूत्र बनाया है। अब इस संचार सूत्र की सहायता से रूस तीसरे देशों की सहायता लिए बिना भी अफ़ग़ानिस्तान में होने वाली गतिविधियों पर असर डाल सकता है।

16 अगस्त 2016 को रूस, अफ़ग़ानिस्तान तथा पाकिस्तान द्वारा मिलकर की गई कोशिशों की बदौलत रूस के एक और पायलट सिर्गेय सिवस्त्यानफ़ की रिहाई कराई जा सकी। सिर्गेय सिवस्त्यानफ़ को सिर्फ़ नौ दिन पहले ही तालिबान ने क़ैद कर लिया था।

तालिबान के साथ 'दोस्ती'

अफ़ग़ानिस्तान में होने वाली कार्रवाइयों पर नज़र रखने वाले अनेक राजनेता, विशेषज्ञ और पत्रकार तालिबान के बारे में तरह-तरह के बयान देते रहते हैं।

हाल के दिनों में मीडिया में रूस और तालिबान को लेकर इस तरह की सुर्ख़ियाँ खूब देखने को मिल रही हैं — अफ़ग़ानिस्तान में रूस का नया सहयोगी, रूस का नया पसन्दीदा जिहादी गुट, अफ़ग़ान तालिबान के भीतर रूस के नए साथी इत्यादि। इन समाचारों को देखने पर तो यही लगता है कि तालिबान को लेकर रूस के रुख में भारी बदलाव आया है।

कुछ लोगों का मानना है कि रूस ने तालिबान को हथियारों तथा साजो-सामान की सप्लाई शुरू कर दी है और रूस तालिबान को टैंकों, गाड़ियों व अन्य हथियारों की मरम्मत में भी सहयोग दे रहा है।

ये ख़बरें पूरी तरह से ग़लत 

अफ़ग़ानिस्तान में तैनात अमरीकी व नाटो सेना के कमाण्डर जनरल जॉन निकल्सन ने रूस पर यह आरोप लगाया था कि रूस तालिबान को हथियारों की सप्लाई कर रहा है। लेकिन पिछली 10 फ़रवरी को रूस के विदेश मन्त्रालय ने इन आरोपों को पूरी तरह से खारिज कर दिया।

विगत 2 जनवरी को ताजिकिस्तान की सीमा सुरक्षा एजेन्सी के प्रवक्ता मुहम्मदजान उलूग़खोज़ाएफ़ ने भी इन आरोपों को 'बिल्कुल निराधार' बताया था।

रूस की तालिबान नीति

अफ़ग़ानिस्तान, और विशेष रूप से तालिबान को लेकर रूस के नज़रिए में बदलाव आने का कारण यह है कि हालिया वर्षों में रूस अफ़ग़ानिस्तान पर अधिक ध्यान देने लगा है, जबकि अफ़ग़ानिस्तान के पुराने सहयोगी देश अब उसकी ओर उतना ध्यान नहीं दे रहे हैं।

जब अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी नेतृत्व में नाटो ने आतंकवाद विरोधी अभियान शुरू किया था, तभी रूस ने यह तय कर लिया था कि वह अफ़ग़ानिस्तान में अपनी भूमिका को सिर्फ नाटो के साथ सहयोग करने तक ही सीमित रखेगा। किन्तु जब अमरीका ने अफ़ग़ानिस्तान में अपनी सैन्य उपस्थिति को सीमित करने का निर्णय किया, तो रूसी नेताओं को महसूस हुआ कि अमरीका तथा उसके सहयोगी देशों के पास अफ़ग़ान धरती पर आतंकवाद और नशीली दवाओं की तस्करी को रोकने की समुचित क्षमता नहीं है। इसके बाद रूस ने अमरीका व नाटो के अभियान में सहयोगी की भूमिका तक ही अपने को सीमित न रखकर अफ़ग़ानिस्तान के प्रति अपनी स्वतन्त्र नीति अपनाने का फ़ैसला किया।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि रूस को अफ़ग़ानिस्तान के भीतर तालिबान तथा अन्य हथियारबन्द गुटों के साथ सम्पर्क रखने के लिए किसी सूत्र की ज़रूरत है। तालिबान की क़ैद से रूसी विमान चालकों की रिहाई से यह बात साफ़ है कि इस संचार सूत्र का मुख्य काम रूसी नागरिकों की सहायता करना है।

जहाँ तक तालिबान के साथ रूस के साझा हितों और बातचीत का प्रश्न है, तो इसकी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं दिखती क्योंकि तालिबान अफ़ग़ानिस्तान तथा पड़ोसी देशों के भीतर आतंकवादी गतिविधियाँ और नशीली दवाओं का उत्पादन व तस्करी बन्द करने के लिए तैयार नहीं है।

यदि रूस और अमरीका के बीच आपसी सम्बन्धों में सुधार होता है, तो इस बात की सबसे अधिक सम्भावना है कि रूस तालिबान के साथ संचार सूत्र को तो बनाए रखेगा, लेकिन तालिबान के साथ साझा हितों के मामले को और आगे नहीं बढ़ाएगा। वहीं दूसरी ओर यदि अमरीका और रूस के आपसी सम्बन्ध और ख़राब होते हैं, तो रूस शायद अफगानिस्तान को लेकर अमरीकी नीतियों के हर अंग को चुनौती देने का प्रयास करेगा और इस उद्देश्य के लिए रूस तालिबान से सम्बन्धित भरपूर बयानबाजी का भी उपयोग करेगा।

प्योतर तपिचकानफ़  मास्को के कार्नेगी केन्द्र में परमाणु अप्रसार कार्यक्रम में सहयोगी और रूसी विज्ञान अकादमी के विश्व अर्थव्यवस्था व अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध संस्थान के अन्तरराष्ट्रीय सुरक्षा केन्द्र में वरिष्ठ विशेषज्ञ हैं।

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