क्या नया शीतयुद्ध शुरू हो चुका है?

शीतयुद्ध के दौर में और आज की दुनिया में समानता यह है कि भूराजनैतिक तनाव दुनिया के विभिन्न इलाकों में स्थानीय लड़ाइयों के रूप में उभरकर सामने आ रहा है। लेकिन इन लड़ाइयों को रोकने में सफल होने के लिए यह ज़रूरी होगा कि रूस और पश्चिमी देश शीतयुद्ध के नियमों को भूल जाएँ।
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सोवियत संघ का एक शीतयुद्ध कालीन व्यंग्य-चित्र। स्रोत :Getty Images

राजनीतिज्ञों और सैन्य उच्चाधिकारियों के भाषण अधिक से अधिक उग्र होते जा रहे हैं, सैन्य अवधारणाओं की भाषा और रूप कठोर होते जा रहे हैं... ऐसा लगता है कि जैसे शीतयुद्ध के लक्षण फिर से सामने आने लगे हैं। 

पहले भी कई बार नए शीतयुद्ध के बारे में चेतावनी दे चुके सोवियत संघ के आख़िरी नेता मिख़ाइल गरबाचोफ़ ने हमें एक बार फिर से सावधान किया है। रूस के राजनीतिक विश्लेषक फ़्योदर लुक्यानफ़ ने शीतयुद्ध की आज की छवि पर टिप्पणी करते हुए लिखा है  — शीतयुद्ध... शीतयुद्ध सुनते-सुनते कान पक गए हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि हमें ’भेड़िया आया... भेड़िया आया’ कहकर शीतयुद्ध से डराया जा रहा है। लेकिन आज की स्थिति को देखकर कहा जा सकता है कि सोवियत संघ के अन्तिम राष्ट्रपति की बातों में सच्चाई है।

रूस और अमरीका के प्रतिनिधियों के बयानों में आजकल वास्तव में संयम कम से कम होता जा रहा है। इन देशों के नेता भी यह कह रहे हैं कि आपसी विश्वास ख़त्म हो गया है। हालाँकि विश्लेषक आज भी शीतयुद्ध के ज़माने में और आज के ज़माने में एक जैसी समानताएँ ढूँढ़ रहे हैं, लेकिन बहुत से लोगों का कहना है कि आज शीतयुद्ध के समय के मुकाबले कहीं ज़्यादा अस्थिरता दिखाई दे रही है।

नया शीतयुद्ध? 

शीतयुद्ध के दौर में और आज की दुनिया में मुख्य समानता यह है कि भूराजनैतिक तनाव उक्रईना और सीरिया जैसे दुनिया के विभिन्न इलाकों में स्थानीय लड़ाइयों के रूप में उभरकर सामने आ रहे हैं। 

लेकिन रूस और अमरीका के बीच बढ़ते अविश्वास की इस स्थिति में भी विश्लेषक नए शीतयुद्ध की शुरूआत के बारे में इसलिए गम्भीरता से कुछ नहीं कह पा रहे हैं क्योंकि दो देशों के बीच कोई वैचारिक टकराव दिखाई नहीं दे रहा है। 

प्राग के अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध संस्थान के प्रमुख विशेषज्ञ मार्क गैलिओट्टी ने रूस-भारत संवाद से कहा — शीतयुद्ध के ज़माने में और आज की स्थिति में सबसे बड़ा फ़र्क तो यह है कि तब दुनिया दो हिस्सों में बँटी हुई थी और दोनों हिस्से एक-दूसरे से बहुत दूर-दूर थे, जबकि आज दुनिया को देखने का हमारा नज़रिया एक जैसा है, हमारा जीवन दर्शन, हमारी विचारधाराएँ एक ही हैं। 
उन्होंने कहा — आज नए शीतयुद्ध की शुरूआत का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। हालाँकि ऐसे बहुत से लक्षण दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें देखकर जल्दबाज़ी में हम यह मान सकते हैं कि फिर से वैश्विक टकराव शुरू होने जा रहा है। 

अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों में शीतयुद्ध का अध्ययन करने वाले एक अध्येता प्रोफ़ेसर बरीस स्त्रेमलिन ने रूस-भारत संवाद से कहा  — पुराने ज़माने को नए ज़माने से अलग करने वाला सिर्फ़ एक यही लक्षण नहीं है। रूस और अमरीका आज भी दुनिया की सबसे बड़ी परमाणु महाशक्तियाँ हैं। लेकिन पिछले तीन दशकों में सैन्य ताक़त की भूमिका कम होती चली गई है।

उन्होंने कहा — दोनों पक्षों की ताक़त के स्तर की अब कोई तुलना ही नहीं रह गई है। अब तो ज़रूरी बात यह है कि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कई खिलाड़ी सामने आ चुके हैं और इतने सारे खिलाड़ियों को अमरीका और रूस प्रभावशाली ढंग से अनुशासित नहीं कर पा रहे हैं। 

दूसरे शब्दों में कहें तो आज अमरीका और रूस अन्तरराष्ट्रीय समस्याओं को दुपक्षीय स्तर पर, बिना दूसरे देशों की सहायता के प्रभावशाली ढंग से हल नहीं कर सकते हैं क्योंकि उनका वैश्विक और क्षेत्रीय प्रभाव अब पहले जैसा नहीं रह गया है। वह ज़माना अब बीत चुका है, जब आमने-सामने बात करके दुनिया के हर सवाल का प्रभावशाली जवाब खोज लिया जाता था। सोवियत संघ के पतन के साथ ही वह दौर ख़त्म हो गया है। आज संकटग्रस्त समस्याओं का समाधान करने के लिए बहुत से ऐसे देशों को भी बातचीत में शामिल करना पड़ता है, जो उन समस्याओं से जुड़े होते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आज इस प्रक्रिया से इतने ज़्यादा अनिश्चिय और अप्रत्याशित जोख़िम जुड़े हुए हैं कि लोग शीतयुद्ध के समय को ही अपनी तरह का एक आधार मान लेते हैं।

भविष्य में वापसी 

अमरीका के वाशिंगटन विश्वविद्यालय के रूसी संस्कृति और इतिहास संस्थान के निदेशक अन्तोन फ़िद्याशिन ने रूस-भारत संवाद से कहा — विडम्बना यह है कि आज जब पश्चिमी देश शीतयुद्ध का इस्तेमाल रूस की छवि बिगाड़ने और रूस को दुनिया के लिए एक ख़तरे के रूप में पेश करने के लिए कर रहे हैं, ख़ुद शीतयुद्ध की अवधारणा एक ऐसी भ्रामक अवधारणा बन चुकी है, जो लोगों की समझ के बाहर हो चुकी है और उससे दुनिया में गड़बड़ी और उलझाव ही पैदा होता है।  

— आज के समय में जब दुनिया में सभी के सिर पर आतंकवाद की तलवार लटकी हुई है, शीतयुद्ध की द्विध्रुवीय दुनिया का वह ज़माना ज़्यादा स्थिर दिखाई देता है क्योंकि तब दुश्मन को साफ़-साफ़ देखा और पहचाना जा सकता था और उससे राजनयिक स्तर पर बातचीत की जा सकती थी — फ़िद्याशिन ने कहा — आज संकट बहुत तेज़ी से बढ़ सकते हैं और वे बढ़कर कैसा रूप ले लेंगे, इसकी कोई सुनिश्चित सीमा भी नहीं है।  

प्रोफ़ेसर बरीस स्त्रेमलिन का मानना है कि शीतयुद्ध के दौर में हमलावर बयानबाज़ी के बावजूद अमरीका और सोवियत संघ में इस बात पर आपसी सहमति थी कि मिलकर दुनिया का संचालन कैसे करना है। आज रूस और अमरीका के बीच मुख्य तौर पर झगड़ा इस बात पर होता है कि दोनों देशों में से कोई भी यह नहीं जानता है कि इस दुनिया का संचालन कैसे किया जाए और इसी बात पर तनाव पैदा हो जाता है। 

रूस के राजनीतिक विश्लेषक फ़्योदर लुक्यानफ़ का कहना है कि आज की परिस्थिति में सबसे सामयिक सवाल यह है कि क्या पश्चिम और रूस के आज के नेताओं को भी क्यूबा मिसाइल संकट की तरह ही किसी ऐसे संकट की ज़रूरत पड़ेगी, जो संकट के दौरान संयम रखने और आपसी सहयोग करने की नई व्यवस्था बना सके। ऐसा लग रहा है कि जब तक विशेषज्ञ और विश्लेषक राजनीति में आपसी सहयोग की चर्चा कर रहे हैं, राजनीतिज्ञ शीतयुद्ध का अपना खेल जारी रखे हुए हैं।

 

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