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सोने के लिए मौत से गले मिलना : उत्तरी रूस में खनिकों का जीवन किसी रूसी व्यक्ति की तरह रूसी जाड़े में मौज-मस्ती करें

रूसी सेना में काम करने वाले उत्तर ध्रुवीय जानवर

रूस के धुर उत्तरी प्रदेशों में रूसी सेना आवागमन के लिए ट्रकों, बख़्तरबन्द गाड़ियों या टैंकों का इस्तेमाल नहीं करती, बल्कि उसने भी आवागमन के वही साधन अपना लिए हैं, जिनका इस्तेमाल स्थानीय निवासी करते हैं। और ये साधन हैं — बारहसिंघों और कुत्तों द्वारा खींची जाने वाली स्लेजें या बर्फ़गाड़ियाँ।
  निकलाय लितोफ़किन, अनस्तसीया करगोदिना
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Russian Ministry of Defense

मस्क्वा (मास्को) से 1850 किलोमीटर दूर उत्तर में स्थित मूर्मन्स्क प्रदेश में लवोज़रा गाँव में बारहसिंघा पालन फ़ार्म में 80 वीं उत्तर ध्रुवीय मोटर चालित राइफल ब्रिगेड का प्रशिक्षण शिविर लगा था। इस प्रदेश में तापमान शून्य से 50 डिग्री से भी नीचे चला जाता है और बर्फ़ के इतने ऊँचे-ऊँचे टीले बन जाते हैं कि दूर क्षितिज भी दिखाई नहीं देता। इन परिस्थितियों में रूसी सेना ने नेनेत्स, सामी और कोमी नामक स्थानीय उत्तर ध्रुवीय जनजातियों के आवागमन के साधन अपना लिए हैं और बारहसिंघो और ख़ास्की कुत्तों द्वारा खींची जाने वाली स्लेजों या बर्फ़गाड़ियाँ का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। 2015 में रूस ने अपने उत्तरी नौसैनिक बेड़े में अपने पहले उत्तर ध्रुवीय सैन्य-दस्ते की स्थापना की, जो उत्तर ध्रुव के इलाके में भी सैन्य-कार्रवाइयाँ कर सकता है।
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Lev Fedoseyev/TASS

यह सैन्य-दस्ता 80 वीं उत्तर ध्रुवीय मोटर चालित राइफ़ल ब्रिगेड में बनाया गया है, जो मूर्मन्स्क प्रदेश के अलाकुर्ती के इलाके में तैनात है। दूसरा ऐसा ही सैन्य-दस्ता यमाल-नेनेत्स प्रदेश में तैनात करने की योजना बनाई जा रही है।
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मोटर चालित राइफ़ल ब्रिगेड और सैन्य टोही व गुप्तचर इस इलाके में आवागमन के लिए उत्तर ध्रुवीय जनजातियों की तरह बारहसिंघो और कुत्तों द्वारा खींची जाने वाली बर्फ़गाड़ियाँ का इस्तेमाल करते हैं।
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महान देशभक्तिपूर्ण युद्ध यानी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी घायलों को लाने-ले जाने तथा शत्रु के पिछवाड़े मालों की ढुलाई करने और सैन्य दस्तों को उतारने के लिए इन बर्फ़गाड़ियों का इस्तेमाल किया जाता था।
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Lev Fedoseyev/TASS

1942 में मूर्मन्स्क के अलाकुर्ती गाँव के निकट फ़ासीवादी पितसामा एयरफ़ील्ड के इलाके में ऐसी ही एक सफल कार्रवाई की गई थी।
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युद्ध की परिस्थितियों में पहाड़ी टीलों के इलाके में कुत्तों द्वारा खींची जाने वाली बर्फ़गाड़ियाँ सहज ही टीलों पर चढ़ और उतर जाती हैं और घायलों व विभिन्न क़िस्म के मालों की ढुलाई में सहायक होती हैं।
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Lev Fedoseyev/TASS

उत्तर ध्रुवीय ख़ास्की कुत्ते शिकारी कुत्ते होते हैं और वे अपना भोजन ख़ुद ही ढूँढ़ लेते हैं। वे आम तौर पर मैदानों में खोह बनाकर रहने वाले जंगली चूहों, घूसों, नन्हें पक्षियों और खरगोशों आदि का शिकार करके ख़ुद अपना पेट भर लेते हैं और सेना को उनके राशन की चिन्ता नहीं करनी पड़ती।
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Lev Fedoseyev/TASS

सेना के लिए इन कुत्तों का चुनाव उनके बचपन में ही कर लिया जाता है। तीन महीने के पिल्ले को ही यह दिखाया जाने लगता है कि बड़े कुत्ते कैसे काम कर रहे हैं। इन पिल्लों को उनकी पीठ पर कुछ वजन लादकर बर्फ़गाड़ियों के साथ-साथ दौड़ाया जाता है। यह वजन उनकी पीठ पर इसलिए बाँधा जाता है ताकि इस तरह लगातार भागने से उनकी रीढ़ की हड्डी टेढ़ी न हो जाए।
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इन कुत्तों के बीच भी अपना वरिष्ठता क्रम होता है। बर्फ़गाड़ी में सबसे आगे-आगे जुड़े दो कुत्ते सबसे अनुभवी होते हैं और उनके पीछे जुड़े कुत्ते बर्फ़गाड़ी को आगे की ओर खींचने में उनकी सहायता करते हैं, इसलिए वे सहायक कुत्ते कहलाते हैं।
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Lev Fedoseyev/TASS

अगर बर्फ़गाड़ी को हाँकने वाला व्यक्ति किसी कारण से घायल हो जाता है या गाड़ी हाँकने में असफल रहता है, तो भी कुत्ते अपने आप गाड़ी को निकट की किसी बस्ती तक पहुँचा देते हैं। अगर अचानक कहीं रुकना पड़ जाता है तो कुत्ते इस तरह से प्रशिक्षित होते हैं कि वे गाड़ी हाँकने वाले को चारों तरफ़ से घेर लेते हैं ताकि उसे गरमी मिलती रहे और वह सुरक्षित रहे।

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