रूस को घेरने की नई अमरीकी एटमी कोशिश और उसका रूसी जवाब

मार्च 2017 के आख़िर में सामरिक अमरीकी कमान के प्रमुख अमरीकी वायुसैनिक जनरल जॉन हायटन ने अमरीकी सिनेट की रक्षा समिति को सम्बोधित करते हुए आधिकारिक रूप से इस बात की पुष्टि की कि अमरीकी रक्षा मन्त्रालय पेण्टागन अमरीकी एटम बमों का पूरी तरह से आधुनिकीकरण करना चाहता है। इस तरह की ख़बरें इस साल के शुरू से ही लगातार मीडिया में दिखाई दे रही थीं। अमरीका की इस योजना पर रूस की निगाह भी है। रूस के रक्षा मन्त्रालय ने हालाँकि किसी तरह का कोई ऐलान नहीं किया है, लेकिन यह साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है कि रूस नई परमाणु होड़ के लिए पूरी तरह से तैयार है।
nuclear-powered ballistic missile submarine
रूसी परमाणु पनडुब्बी ’यूरी दल्गारूकी’ में। स्रोत :Lev Fedoseyev/TASS

आपसी रोकथाम की इस नीति का मतलब यह है कि यदि एक देश दूसरे देश पर एटमी हमला करता है तो उसपर भी जवाबी हमला होगा। इस तरह वैश्विक टकराव की स्थिति में एटम बमों का इस्तेमाल करके किसी भी देश की जीत की कोई संभावना नहीं रहेगी। अमरीकी फ़ौजी अधिकारियों का मानना है कि एटम बम के होने की वजह से ही 1945 के बाद कोई विश्व-युद्ध नहीं हुआ।

लेकिन शीत-युद्ध ख़त्म होने से बहुत पहले ही दुनिया के एटमी क्लब के सदस्य देशों के एटमी बम भण्डारों में इतने सारे बम इकट्ठे हो चुके थे कि अगर एटमी लड़ाई शुरू हो जाती तो सारी मानवजाति के ही जीवित बचने की कोई संभावना न होती।

किन इसके बावजूद रूस, अमरीका और चीन अपने एटम बमों की संख्या लगातार बढ़ा रहे हैं और उनका आधुनिकीकरण भी कर रहे हैं। मिसाइल प्रतिरोधी सुरक्षा प्रणालियाँ भी एटम बमों और मिसाइलों की संख्या में होने वाली लगातार बढ़ोतरी का कारण बनी हुई हैं क्योंकि इनकी वजह से यह गारण्टी मिलती है कि दुश्मन का पूरी तरह से ख़ात्मा कर दिया जाएगा। 

एटम बमों और उनको ले जाने वाले मिसाइलों की संख्या की दृष्टि से आज रूस अमरीका से पीछे चल रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ यह बात भी उल्लेखनीय है कि सैन्य क्षेत्र में कुछ नई रूसी उपलब्धियों से अमरीका आज तक अनजान है।

हथियारों की संख्या या उनकी मारक-क्षमता? 

सोवियत संघ के विघटन के बाद कई सालों तक इसमें कोई शक नहीं था कि एटम बमों की संख्या की दृष्टि से अमरीका रूस से आगे चल रहा था। परन्तु रूस और चीन ने धीरे-धीरे अपने बम भण्डारों का नवीनीकरण किया और वे मिसाइल परीक्षण भी करते रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि वाशिंगटन ने भी अपनी एटमी त्रयी के सबसे कमज़ोर पक्ष की तरफ़ ध्यान देना शुरू कर दिया। और उसका यह कमज़ोर पक्ष है — कूप आधारित ’मिनटमैन-3’ नामक वे मिसाइल, जिनका उत्पादन पिछली सदी के आठवें दशक में किया गया था।

अमरीकी रक्षा मन्त्रालय पेण्टागन को आशा है कि 2030 तक अमरीका कूप आधारित ऐसे 400 नए मिसाइलों का निर्माण करके उन्हें तैनात कर देगा, जो नई क़िस्म के एटम बमों से लैस होंगे। अमरीका के इस एटमी भण्डार के आधुनिकीकरण और उससे जुड़े बुनियादी ढाँचे के निर्माण पर कुल 63 अरब डॉलर का खर्च आएगा, जो आम अमरीकी करदाताओं को उठाना होगा।

लेकिन रूस हथियारबन्दी की इस होड़ से बचने की कोशिश कर रहा है। वह इन रणनीतिक हथियारों पर अमरीका की तरह ही बड़ी धनराशि खर्च करने के लिए तैयार नहीं है। शीत-युद्ध के ज़माने में हथियारबन्दी की इसी होड़ ने सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर डाला था। रूसी रणनीतिक मिसाइल सेना के एक उच्चाधिकारी ने रूस-भारत संवाद से बात करते हुए कहा — अपनी सैन्य अवधारणा में हमने अपने हथियारों की मारक-क्षमता पर ज़ोर दिया है।

पिछली सदी के नौवें दशक के अन्त में सोवियत संघ के विघटन के बाद बीते दो दशकों ने हमें कम खर्च में अधिक प्रभावशाली ढंग से काम करना सिखा दिया है। एटमी रोकथाम की नीति में सबसे ज़्यादा ज़रूरी यह है कि जवाबी हमला अनिवार्य रूप से किया जाए ताकि दुश्मन को भी भारी नुक़सान उठाना पड़े। इसके लिए बड़ी संख्या में मिसाइल बनाकर उन्हें महंगे मिसाइल-कूपों में तैनात करना ज़रूरी नहीं है। ज़रूरी तो यह है कि आपके मिसाइल मोबाइल हों और वे दुश्मन की नज़रों से ओझल रहें।

रूसी सेना के पूर्व कर्नल वीक्तर कुज़्नित्सोफ़ का मानना है कि रूसी परमाणु त्रयी को ज़्यादा से ज़्यादा मारक और असरदायक बनाने के लिए ही रूस की सरकार ने हाल ही में ’परमाणु रेलगाड़ियाँ’ बनाने की परियोजना पर फिर से काम शुरू कर दिया है। ये रेलगाड़ियाँ दिखने में आम मालगाड़ी की तरह ही होंगी, लेकिन इन पर परमाणु बमों से लैस मिसाइल लदे होंगे। चीन और अमरीका के पास इस तरह के मिसाइल नहीं हैं। स्थाई तौर पर तैनात मिसाइलों के बारे में देर-सवेर दुश्मन को जानकारियाँ मिल ही जाती हैं, लेकिन रेलगाड़ी पर लदे इन ’बरगूज़िन’ मिसाइलों के बारे में दुश्मन यह जानकारी नहीं पा सकेगा कि वे कब कहाँ पर स्थित हैं क्योंकि ये मिसाइल तो मोबाइल मिसाइल होंगे और एक जगह से दूसरी जगह पर आते-जाते रहेंगे।

इसके अलावा एटमी रोकथाम की नीति के अन्तर्गत रूस स्थाई तौर पर मिसाइलों की तैनाती करने की जगह मिसाइलों से लैस पनडुब्बियों के निर्माण पर ज़्यादा ज़ोर दे रहा है। इन पनडुब्बियों से दुश्मन के जनसंख्या बहुल औद्योगिक तटवर्ती नगरों को कभी भी निशाना बनाया जा सकता है। ये क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइल चूँकि लक्ष्य से बहुत कम दूरी पर रहकर लक्ष्य को निशाना बनाएँगे, इसलिए बीच में ही उन्हें पकड़कर उन्हें नष्ट कर देने की संभावना भी बिल्कुल नहीं होगी।

अमरीका के मुकाबले रूस के औद्योगिक नगर ऐसे इलाकों में बसे हुए हैं, जहाँ तक पनडुब्बियों से छोड़े गए मिसाइल नहीं पहुँच सकते हैं। इसलिए अमरीका को या तो अपने मिसाइलों को ऐसी जगहों पर स्थापित करना होगा कि वे दुश्मन के लक्ष्यों को निशाना बना सकें या फिर इतनी बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइल छोड़ने होंगे कि उनमें से कुछ मिसाइल ऐसे हों, जो रास्ते में ही न पकड़े जा सकें और लक्ष्य तक पहुँचकर उसे नष्ट कर सकें। 

होड़ में जीत नहीं होगी

रूसी रणनीतिक मिसाइल सेना के उच्चाधिकारी ने रूस-भारत संवाद से बात करते हुए कहा — रूस ने प्रभावशाली एटमी रोकथाम की नीति पर अमल करने के लिए ऐसी नई सैन्य तक्नोलौजियों के विकास का रास्ता चुना है, जो रूस को हथियारबन्दी की नई महँगी होड़ में शामिल होने से बचाएँगी। मोबाइल एटमी मिसाइलों और पनडुब्बी बेड़े का विकास करके रूस का रक्षा मन्त्रालय किसी भी हालत में दुश्मन पर जवाबी हमला करने की अपनी संभावना को बनाए रखेगा।

लेकिन वीक्तर कुज़्नित्सोफ़ का कहना है कि अन्तरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए मुख्य खतरा अमरीका और रूस की एटमी क्षमता में होने वाली वृद्धि से नहीं, बल्कि अमरीकी सरकार के नए सैन्य नज़रिए से पैदा हो रहा है। बराक ओबामा सरकार के दौरान ही अमरीका और उसके कुछ ’योद्धा’ सीमित एटमी युद्ध की रणनीति  बना रहे थे, जिसके अनुसार, पश्चिमी एशियाई संकटों में छोटे-छोटे एटम बमों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यह रणनीति खतरनाक हो सकती है क्योंकि अगर अमरीका छोटे एटमी बमों का इस्तेमाल करेगा तो दूसरे देश भी उसके जवाब में ऐसे ही हमले कर सकते हैं।

+
फ़ेसबुक पर पसंद करें