सीरिया में ’विशेष सुरक्षित क्षेत्र’ बनाने की रूस की योजना कैसी है?

पिछली 3 व 4 मई को अस्ताना में सीरिया के सिलसिले में चल रही बातचीत में रूस और उसके सहयोगी देशों ने सीरिया में ’विशेष सुरक्षित क्षेत्र’ या ’तनाव रहित सेफ़ ज़ोन्स’ बनाने का विचार पेश किया, जहाँ विदेशी शान्ति सेना को तैनात कर दिया जाएगा। अरब देशों सम्बन्धी विशेषज्ञों का मानना है कि इस योजना को लागू करने से सीरिया के विघटन का खतरा बढ़ जाएगा, लेकिन इसके अलावा सीरिया में गृहयुद्ध को रोकने का और कोई दूसरा उपाय नहीं है।
 Syria peace talks in Astana
पिछली 3 व 4 मई को कज़ाख़स्तान की राजधानी अस्ताना में सीरिया पर बातचीत का चौथा दौर हुआ। स्रोत :AFP

दिसम्बर 2016 के अन्त में रूस, तुर्की और ईरान की मध्यस्थता से सीरिया में जो युद्धविराम कराया गया था, बीते महीनों में उसे कई बार भंग किया गया है। हर हफ़्ते सीरिया की सरकारी सेना और सीरियाई विद्रोहियों के बीच गोलीबारी होने लगी है। विगत 4 अप्रैल को इद्लिब सूबे में किए गए रासायनिक हमले के बाद, जिसमें 89 व्यक्ति मारे गए थे, तनाव बहुत ज़्यादा बढ़ गया है। इस रासायनिक हमले के लिए सीरियाई सरकारी सेना और सीरियाई विद्रोही एक-दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं।

इन परिस्थितियों में पिछली 3 व 4 मई को कज़ाख़स्तान की राजधानी अस्ताना में सीरिया पर बातचीत का चौथा दौर हुआ, जिसमें सीरियाई मामलों में मध्यस्थता कर रहे रूस, तुर्की और ईरान ने सीरिया में परिस्थिति के नियमन के लिए एक बिल्कुल नई योजना पेश की। इस योजना के अनुसार सीरिया में चार ऐसे सुरक्षित क्षेत्र बनाए जाएँगे, जहाँ हथियारों का इस्तेमाल करने पर पूरी तरह से रोक लगी होगी।

इन सुरक्षित क्षेत्रों (सेफ़ ज़ोन्स) में नागरिक सुविधाओं और अन्य बुनियादी ढाँचे का फिर से पुनर्निर्माण किया जाएगा और वहाँ ऐसी परिस्थितियाँ बना दी जाएँगी कि मानवीय और चिकित्सा मदद उपलब्ध कराने वाले अन्तरराष्ट्रीय संगठन अपना काम कर सकें। इन सुरक्षित क्षेत्रों की सीमाओं की विशेष रूप से सुरक्षा की जाएगी ताकि इन इलाकों पर कोई हमले न हो सकें। इन इलाकों के ऊपर से उड़ान भरने और इनमें किसी भी तरह के हथियारों का इस्तेमाल करने पर रोक लगी होगी। 

नई योजना के विरोधी और समर्थक

4 मई को अस्ताना में रूस, तुर्की और ईरान ने सुरक्षित क्षेत्रों की स्थापना के सवाल पर एक सहमति समझौते पर हस्ताक्षर किए। बशर असद की सरकार के प्रतिनिधियों ने इस पहल का समर्थन किया है, जबकि सीरियाई विद्रोहियों ने इस पर तल्ख प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सीरिया से जुड़े किसी भी समझौते में ईरान की भूमिका का विरोध किया है और समझौते के गारण्टीकर्ता के रूप में उसकी भूमिका पर सवाल उठाए हैं। लेकिन जैसाकि रूस के राष्ट्रपति व्लदीमिर पूतिन ने बताया कि इस पहल के बारे में उन्होंने अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से बात की है और उन्होंने इस पहल का पूरी तरह से समर्थन किया है।

अरब देशों के रूसी विशेषज्ञ और रूस की विदेश मामलों सम्बन्धी परिषद के सदस्य सिर्गेय बलमासफ़ का मानना है कि न तो सीरिया की सरकार और न ही सीरियाई विद्रोही इस तरह की पहल को लागू करने पर सहमत होंगे और वे पूरी-पूरी कोशिश करेंगे कि यह पहल असफल हो जाए। रूस-भारत संवाद से बात करते हुए सिर्गेय बलमासफ़ ने कहा — विशेष सुरक्षित क्षेत्र बनाने के इस विचार पर पिछले कई सालों से चर्चा की जा रही है, लेकिन अभी तक सीरियाई संकट का समाधान करना संभव नहीं हुआ है। आज सीरिया की स्थिति ऐसी है कि कोई लिखित समझौता होने के बावजूद भी उसका उल्लंघन ज़रूर किया जाएगा। बलमासफ़ का कहना है कि सीरिया में चल रहे गृहयुद्ध में आज भी हालत ऐसी है कि दोनों पक्ष अपनी-अपनी जीत होने तक लड़ने के लिए तैयार हैं और वे एक-दूसरे से कोई समझौता नहीं करेंगे।  

बाहर से शान्ति थोपने की कोशिश

लेकिन रूस के हायर स्कूल ऑफ़ इकोनोमिक्स के राजनीतिशास्त्र विभाग के वरिष्ठ विशेषज्ञ लिअनीद इसायिफ़ का मानना है कि यदि रूस, ईरान और तुर्की यानी तीनों मध्यस्थ देशों का भारी दबाव पड़ेगा और फ़ारस की खाड़ी के देश और अमरीका भी उनका समर्थन करेंगे तो ये बाहरी ताक़तें सीरिया की सरकार और सीरियाई विद्रोहियों को अपना फ़ैसला मानने के लिए मजबूर कर सकती हैं। रूस-भारत संवाद से बात करते हुए लिअनीद इसायिफ़ ने कहा — यह एक ऐसा सौदा है, जिसमें खेल के कुछ नियम विदेशी ताक़तें तय कर रही हैं। सीरियाइयों से तो उन नियमों के बारे में पूछा भी नहीं जाएगा। पिछले कई सालों से सीरियाई लोग चूँकि ख़ुद अपने स्तर पर कुछ भी तय नहीं कर पाए हैं, इसलिए अब उन्हें उन बातों पर सहमत होना ही पड़ेगा, जो दूसरे लोग तय कर रहे हैं। 

इस सहमति समझौते के अनुसार सीरिया में विदेशी सैन्य बलों की तैनाती की जा सकेगी, जो ’विशेष सुरक्षित क्षेत्रों’ की सीमाओं की सुरक्षा करेंगे। समझौते में इस बात का ज़िक्र नहीं किया गया है कि ये सैन्य बल किस देश के होंगे। लेकिन रूस के अभिनव विकास संस्थान के इस्लामी शोध केन्द्र के प्रमुख किरील सिम्योनफ़ ने सामाजिक राजनीतिक इण्टरनेट प्रकाशन ’स्वबोदनया प्रेस्सा’( यानी आज़ाद प्रेस) को इण्टरव्यू देते हुए कहा कि ये सैन्य दस्ते मलेशिया, इण्डोनेशिया, मोरक्को, अल्जीरिया, ट्यूनिशिया, लीबिया आदि तटस्थ देशों के हो सकते हैं। किरील सिम्योनफ़ का मानना है कि दोनों सीरियाई पक्षों को सुलह करने के लिए बाध्य करने वाले क़दम बड़े कठोर होने चाहिए और उनका पालन न सिर्फ़ सीरियाई विद्रोहियों को करना होगा, बल्कि सीरिया की सरकारी सेना को भी उनका सख़्ती से पालन करना होगा, सिर्फ़ तभी यह योजना सफल होगी।

क्या कोई दूसरा सीरिया भी है?

सीरिया में विभिन्न पक्षों के बीच ’विशेष सुरक्षित जोन कायम करने को लेकर हुआ समझौता विगत शुक्रवार आधी रात से लागू हो गया। इसे प्रभाव में लाने में हालाँकि अभी थोड़ा और समय लगेगा। इस समझौते से जुड़ी शर्तें और इसका ब्योरा तैयार करने में अभी करीब एक महीने का समय लगेगा। इसके बाद सुरक्षित इलाकों का रेखांकन किया जाएगा। लेकिन जैसे ही यह योजना लागू होगी, सीरिया का विभाजन हो जाएगा। सीरिया की सरकार सीरिया के कुछ इलाकों को नियन्त्रित करेगी और सीरियाई विद्रोहियों का नियन्त्रण सीरिया के अन्य इलाकों पर होगा। इन इलाकों के बीच में शान्ति सैनिक तैनात होंगे।

रूस-भारत संवाद से बात करते हुए सिर्गेय बलमासफ़ ने कहा — वास्तव में इसका मतलब यह होगा कि सीरिया का बँटवारा कर दिया जाएगा। वैसे भी पिछले कई सालों से सीरिया एकजुट देश नहीं है। बलमासफ़ का मानना है कि गृहयुद्ध में भाग लेने वाला कोई भी पक्ष आपस में साथ-साथ मिलकर रहने के लिए तैयार नहीं है। ये दोनों पक्ष जिनेवा और अस्थाना में होने वाली वार्ताओं में भाग लेने का तो बस, दिखावा ही करते हैं। लिअनीद इसायिफ़ भी बलमासफ़ की इस बात से सहमत हैं। उनका कहना है — सिर्फ़ ’गूगल मैप’ में, भूगोल की पढ़ाई में और सँयुक्त राष्ट्र में ही सीरिया को एक देश के रूप में देखा, पढ़ा और समझा जाता है, लेकिन सच्चाई तो यह है कि यह देश पहले ही टूट चुका है।   

उसी समय लिअनीद इसायिफ़ का मानना है कि सीरियाई सरकार का विरोध करने वाली ताक़तों को, चाहे वे विद्रोही हों या कुर्द, शायद ही यह आशा है कि वे अपने अलग-अलग देश बना लेंगी। इसका मतलब यह है कि सीरिया में बहुत ज़्यादा समस्याएँ हैं। पहले से ही यह मालूम है कि अलग होने के बाद भी ये देश आत्मनिर्भर नहीं बन सकेंगे। इस तरह इस बात की संभावना बनी रहेगी कि सीरिया फिर से कभी सुदूर भविष्य में एकजुट होकर एक देश के रूप में सामने आ सकता है।

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